मोदी सुरक्षित, भाजपा जर्जर

दिल्ली नतीजों ने कुछ गलतफहमियां बना दी है। जैसे नरेंद्र मोदी का ग्राफ डाउन है। कांग्रेस खत्म है। सेकुलर आईडिया जीता है। केजरीवाल भारत माता के लाडले हो गए हैं। इन बातों का ज्यादा मतलब नहीं है। जान ले नरेंद्र मोदी आज भी लोकसभा चुनाव में महानायक है। बिहार, बंगाल, गुजरात में भाजपा हार भी जाए तब भी 2024 के लोकसभा चुनाव में उनको हिंदू वोट देगा बेशर्ते हनुमान भक्त अखिलेश- केजरीवाल, शिव भक्त ठाकरे-राहुल, कालीभक्त ममता का समग्र विपक्षी मोर्चा बन कर उसकी हिंदूओं में ब्रांडिग न हो जाए। बावजूद इसके मोदी के बाद अनिवार्यतः भाजपा का भविष्य हिंदू महासभा वाला होगा। कांग्रेस खत्म नहीं है, वह फिर जिंदा हो जाएगी मगर भाजपा अब तभी तक है जब तक नरेंद्र मोदी के चलते सत्ता है। ज्योंहि मोदी की सत्ता खत्म हुई भाजपा बालू महल जैसे ढही होगी। उस नाते मेरी इस बात पर गौर करें कि दिल्ली के चुनाव में कांग्रेस का सफाया नहीं हुआ है बल्कि भाजपा का सफाया हुआ है। भाजपा को मिले वोट बालू के ढेर की तरह हंै।

बालू का ढेर इसलिए कि संगठन ने चुनाव नहीं लड़ा, प्रदेश के नेताओं, उनके काम, उनके जनसंपर्क ने चुनाव नहीं लड़ा। चुनाव हिंदू बनाम मुस्लिम के चुनावी गृहयुद्ध पर, पैसे-संसाधनो के रिकार्ड तोड़ खर्च, 200-250 सांसदों के बूथवार बेइंतहा माइक्रो प्रबंधनो, बेइंतहा मीडिया प्रचार, मोदी-अमित शाह की पूरी प्रतिष्ठा पर लड़ा गया और भाजपा को मिला क्या? 70 में से 8 सीटे! तर्क है कि भाजपा को वोट तो मिले। पर ये वोट चुनावी गृहयुद्ध का ऊबाल है। बुलबुला है। इस बात को समझंे कि मोदी-शाह से पहले दिल्ली में भाजपा का स्थाई, ठोस वोट था। मतलब पंजाबी, बनिये, मध्यम वर्ग, सरकारी कमर्चारियों का ठोस आधार हुआ करता था लेकिन आज कर्मचारियों का नई दिल्ली इलाका हो या बनियो-व्यापारियों का चांदनी चौक या पंजाबियों का पश्चिमी दिल्ली सब तरफ भाजपा बालूई वोटो पर निर्भर है। मोदी-शाह की संगठनात्मक हवाबाजी के पंद्रह करोड़ भाजपा सदस्यों के आंकड़ो में दिल्ली में भाजपाई सदस्यों की संख्या कोई 75 लाख बताते हंै जबकि अभी चुनाव में भाजपा को कुल वोट 49 लाख मिले। वह भी हिंदू बनाम मुस्लिम के चुनावी गृहयुद्ध से!

सो भाजपा आज पूरी तरह नरेंद्र मोदी की ऊंगली पर टिका रेत का पहाड़ है। जैसे दिल्ली में दशा है वैसे झारखंड में है, महाराष्ट्र में, राजस्थान, महाराष्ट्र, छतीसगढ में है। मतलब हर उस राज्य में भाजपा बालू का ढेर है जहां सत्ता और नरेंद्र मोदी का चुंबक व गौंद है। सोचे, पांच साल बाद यदि केंद्र में मोदी की सरकार नहीं हुई। कोई खिचड़ी सरकार बन गई तो 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र में देवेंद्र फड़नवीस, दिल्ली में मनोज तिवारी या झारखंड में रघुवरदास या गुजरात में विजय रूपानी जैसे नेता क्या अपने-अपने प्रदेशों में भाजपा को जीतवाने वाले चेहरे होंगे? या भाजपा प्रदेश संगठनों के बूते चुनाव लड़ने की दशा में भी होगी?

सचमुच भाजपा का जर्जर होना हर तरह से है। केंद्र की सत्ता, और पैसों व चुनावी गृहयुद्ध की एप्रोच के अलावा भाजपा में कुछ नहीं बचा है। ऐसा पहले कभी नहीं था। जनसंघ, भाजपा में पहले चेहरे, चाल, चरित्र के साथ कार्यकर्ताओं को बांधने, उनके बीच की सामाजिकता और निस्वार्थ मेहनत की वह उर्जा हुआ करती थी कि सत्ता मिले या न मिले, पॉवर हो या न हो विचार की अपनी प्रतिबद्धता में सगंठन गुंथा हुआ होता था।

पता नहीं इस बात में कितनी सत्यता है मगर इस बार दिल्ली में जानने को मिला कि कथित माइक्रों प्रबंधन के बीच घरों में मतदाताओं को भाजपा की पर्चियां नहीं मिली। आप के कार्यकर्ता गलियों में घूमते-बांटते हुए थे लेकिन भाजपा के लोग नहीं थे। कारण शायद मोदी-शाह ने एप के जरिए या वोटर लिस्ट के जरिए व्हाटसअप आदि से जनसंपर्क का भरोसा बनाया हुआ होगा। ऐसे ही यह भी जानकारी है कि दिल्ली में जिस सगंठन मंत्री ने महिनो भारी मेहनत कर उम्मीदवारों के विकल्प बनाए थे, पार्टी की जिन सर्वे टीमों ने उम्मीदवारों को लेकर जो फीडबैक दी थी और प्रदेश के नेताओं की जो अपनी-अपनी लिस्ट थी उस सब पर केंद्रीय चुनाव समिति में विचार ही नहीं हुआ। आखिर में अचानक ऐसे टिकट बांटे गए कि संगठन मंत्री, प्रदेश नेताओं, भाजपा-संघ कार्यकर्ताओ को समझ ही नहीं आया कि ये कैसे उम्मीदवार हो गए! पार्टीजनों में सब तरफ भाव था डुब गए। पार्टी ने हार मान ली।

जब मुझे यह सब किसी ने बताया तो मेरा मानना था कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह के लिए जब हिंदू बनाम मुस्लिम का चुनावी गृहयुद्ध रामबाण नुस्खा है तो उम्मीदवार के चेहरों, या प्रदेश नेताओं को भरोसे में लेने, संगठन की फीडबैक का क्या मतलब! चुनाव हर्षवर्धन, विजय गोयल या मनोज तिवारी आदि जब नहीं ल़ड़ाने वाले और चंद्रगुप्त मोर्य व चाणक्य की ऊंगली पर ही मां भारती का जीवन-मरण है तो एक दिन शेर अमित शाह उठेंगे, गृहयुद्ध का बिगुल बजेगा और केजरीवाल शाहीन बाग की गोद में जा बैठेंगे। हिंदू उन्हे देशद्रोही मान लेंगे।

ऐसे ही महाराष्ट्र में, हरियाणा में, झारखंड में चुनाव लड़ा गया। आगे बिहार, बंगाल, यूपी में भी लड़ा जाएगा। 2019 का लोकसभा चुनाव भी ऐसे ही लड़ा गया तो उससे पहले के विधानसभा चुनाव भी ऐसे लड़े गए। तभी भाजपा संगठन और पार्टी अब ऑर्गनिक नहीं है। दिल्ली के भाजपा मुख्यालय में कोई जाए या प्रदेश अध्यक्षों के दफ्तर में कोई जाए तो न चेहरे समझ आएगे न कॉरपोरेट आफिस में राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं को मान-सम्मान, सामाजिकता मिलेगी। सर्वत्र सत्ता के अंहकार और पैसे के खेल पर बना बालू का पहाड़!

इसलिए दस साल, पंद्रहृ साल बाद जब भी मोदी-शाह की सत्ता जाएगी तो या तो भाजपा गृहयुद्ध लड़ती एक पार्टी होगी या इतनी निकम्मी, फेल, बदनाम पार्टी होगी कि हिंदू महासभा भी तब उससे अधिक जपुण्यता लिए हुए नजर आएगी!

हो सकता है मेरा सोचना गलत हो। बावजूद इसके दिल्ली चुनाव की बालू के ढेर वाली वोट संख्या पर भाजपा के चट्टानी संगठन होने की जरूर गलतफहमी न पाले।

2 thoughts on “मोदी सुरक्षित, भाजपा जर्जर

  1. …इस बात को समझें कि मोदी-शाह से पहले दिल्ली में भाजपा का स्थाई, ठोस वोट था। मतलब पंजाबी, बनिये, मध्यम वर्ग, सरकारी कमर्चारियों का ठोस आधार हुआ करता था…
    🙏बेहतरीन सर🙏

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