शाहीन बाग है मोड़

गृहयुद्ध जब होता है तो दोनों पक्ष लड़ाई के तेवर लिए होते है। उस नाते 2014 से ले कर दिसंबर 2019 में सीएए कानून पास होने व शाहीन बाग में उसके खिलाफ प्रदर्शन शुरू होने के वक्त से पहले की राजनीति अलग थी। उसमें मोदी-शाह के विरोधी और खासकर मुसलमान अबूझ, दुबका हुआ था। तीन तलाक, जम्मूकश्मीर से अनुच्छेद370 की समाप्ति, अयोध्या में मंदिर के फैसले से भी औसत मुस्लिम परिवार और घर में वैसी चिंता नहीं थी, जैसी नागरिकता संशोधन कानून में परिवर्तन के सीएए के फैसले से बनी।

निश्चित ही इस फैसले पर मुसलमानों को गुमराह किया गया। सत्य वचन है कि भारत के मुस्लिम नागरिकों की सेहत पर सीएए का कोई मतलब नहीं है। मगर असम में एनआरसी के मामले, सीएए में मुस्लिम को लेकर भेदभाव और आगे पूरे देश में एनआरसी की संभावना ने जो आंशका, डर बनाया तो शाहीन बाग पर धरना लोकतंत्र की सहज अभिव्यक्ति थी। हिसाब से खुद गृहमंत्री को धरने के बीच जा कर या सरकार की तरफ से कोई भी जा कर समझा सकता था कि उनकी नागरिकता पर न खतरा है न चिंता और नागरिकता को जांचने की एनआरसी आदि की जो भी प्रक्रिया होगी उसमें से हिंदू और मुसलमान समान रूप से गुजरेगा।

मगर मकसद जब चुनावी गृहयुद्ध और गृहयुद्ध वाली राजनीति है तो जितने शाहीन बाग होंगे उतने हर शहर में आमने-सामने के पाले बनेंगे। और विपक्ष, मोदी-शाह विरोधियों ने भी इसे आसान बनवाया। इन्होंने फिर गलती की जो सोचा कि सेकुलर राजनीति चमकाने का इससे बेहतर मौका नहीं है।

तभी अमित शाह ने धोबी पाट चला। दिल्ली में चुनाव पूरी तरह भाजपा के डूबने का था कि अचानक एक दिन अमित शाह ने करंट मारो का धोबी पाट चल अनुराग ठाकुर, सांसद प्रवेश वर्मा आदि के जरिए वह चुनावी गृहयुद्ध बना डाला कि भाजपा न केवल जिंदा हुई, बल्कि केजरीवाल, कांग्रेस सहित मुसलमान बुरी तरह हकबकाए हुए हैं कि यह क्या हो गया!

उस नाते दिल्ली का चुनाव निश्चित तौर पर आगे की राजनीति, हिंदू बनाम मुस्लिम के आर-पार वाले मूड में निर्णायक मोड़ बनेगा। चुनाव में इस पार का नतीजा आए या उस पार का, दिल्ली ही नहीं देश के दूसरे शहरो में भी कथित देशभक्तों, कथित देशद्रोहियों के मैदानों का विस्तार होगा!

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