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पूर्वोत्तर में भाजपा को फायदा!

हरि शंकर व्यास
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भारतीय जनता पार्टी उन राज्यों की तलाश में थी, जहां वह अपनी सीटों की संख्या बढ़ा सकती है। इस लिहाज से पूर्वोत्तर के आठ राज्य उसके लिए सबसे ज्यादा मुफीद साबित हो रहे हैं। इन राज्यों में भाजपा ने जीतने वाला गठबंधन बनाया है। भाजपा के मुकाबले कांग्रेस पूरी तरह से फिसड्डी साबित हुई है। इसका एक कारण यह भी है कि आमतौर पर पूर्वोत्तर के राज्य और वहां के स्थानीय नेता व जनता सब केंद्र के शासन वाली पार्टी के साथ रहते हैं। 

पूर्वोत्तर के आठ राज्यों में लोकसभा की 25 सीटें हैं। इनमें से पिछली बार भाजपा को आठ सीटें मिली थीं, जिसमें से सात उसने असम में जीती थीं। असम की 14 में से सात सीटें उसको मिली थीं और बाकी सात राज्यों की 11 सीटों में से वह एक सीट जीत पाई थी। एक सीट उसकी सहयोगी एनपीपी के पास है और एक नए बने सहयोगी नेफ्यू रियो ने जीती थी। इस बार भाजपा ज्यादा सीटें जीतने की उम्मीद कर रही है। इसका कारण उसका गठबंधन है। 

भाजपा ने असम में असम गण परिषद और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ तालमेल किया है। मेघालय और मणिपुर में उसका तालमेल कोनरेड संगमा की पार्टी एनपीपी के साथ है। त्रिपुरा में उसने आईपीएफटी के साथ तालमेल करके चुनाव जीता है और सरकार बनाई है। नगालैंड में भाजपा ने नेफ्यू रियो की पार्टी एनडीपीपी के साथ तालमेल करके विधानसभा चुनाव में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। अरुणाचल में पेमा खांडू की पूरी पार्टी ही भाजपा में चली गई है। इस समय मिजोरम और सिक्किम को छोड़ कर सभी छह राज्यों में भाजपा या उसके सहयोगियों की सरकार है। 

विधानसभा चुनाव में जैसा रूझान दिखा है, उसे देख कर लग रहा है कि पूर्वोत्तर के आठ राज्यों की 25 सीटों में से अधिकतर सीट जीतने के लिए भाजपा पूरी ताकत लगाएगी और उसका गठबंधन इसमें सहायक बनेगा। उसके मुकाबले विपक्ष का कोई गठबंधन पूर्वोत्तर में नहीं दिख रहा है। कांग्रेस और बदरूद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ का असम में तालमेल हो, कांग्रेस और टीआर जेलियांग की पार्टी नगालैंड पीपुल्स फ्रंट का तालमेल नगालैंड में हो या त्रिपुरा में कांग्रेस और लेफ्ट साथ आएं तो कुछ मुकाबला हो सकता है।

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