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एक सच पर झूठ का एवरेस्ट!

यों भारत की राजनीति का यही कायदा है। बावजूद इसके ध्यान नहीं पड़ता कि इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी की गलती के बाद उसे सही बताने के लिए बाद में अनुशासन पर्व मनाए हो। उसे सही बताने के लिए झूठ का पहाड़ बनाया था? या नेहरू ने कृष्ण मेनन को रक्षा मंत्री बनाने की गलती को सही बताने के लिए झूठ के लेप बनाए या हारने के बाद भी उन्हे मंत्री बनाए रखा।  झूठ और झूठे वायदे राजनीति में चलते है लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि एक सच को छुपाने के लिए झूठ का एवरेस्ट बना दिया हो। उस नाते प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी को सही ठहराने के लिए झूठ का जो रिकार्ड बनवाया है वह भी आजाद भारत के इतिहास की इंतहा है!  8 नवंबर 2017 को भारत सरकार ने एक सच को दबाने के लिए झूठ का जो एवरेस्ट खड़ा किया वह गिनिज बुक में दर्ज कराना चाहिए। सारे केंद्रीय मंत्री प्रदेश राजधानियों में कहते घूमे कि नोटबंदी सफल थी। मतलब मोदी ने जिन उद्देश्यों की घोषणा करते हुए नोटबंदी का ऐलान किया था वे प्राप्त हुए! 

तभी पता पडता है कि एक व्यक्ति सच को छुपाने, झुठलाने की कोशिश में बंधा होता है लेकिन संस्था या सरकार के स्तर का जब सच को दबाना होता है तो झूठ के पहाड बनते है। अंतहीन, सीमाविहिन होता है तब झूठ!  

सो 8 नवंबर 2016 के बाद 8 नवंबर 2017 का दिन (आगे 8 नवंबर 2018 की भी कल्पना करें) आजाद भारत के इतिहास में यादगार लिए रहेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार, अपने मंत्रियों, अपने तंत्र को इस कदर झूठ मे झौंका कि सरकार वेश्या बाजार में भी पहुंच गई। एक समझदार, सुधी मंत्री को भी यह झूठ बोलना पडा कि नोटबंदी ने औरतों के देह व्यापार को घटा दिया! सोचे, रविशंकर प्रसाद भारत के कानून मंत्री है इन्होने नोटबंदी को सही ठहराने के लिए ऐसे तर्क दिए कि सोचने को मजबूर होना पड़ा कि एक सच को झुठलाने के लिए भारत राष्ट्र-राज्य के तंत्र ने, मंत्रियों, अफसरों, प्रवक्ताओं, पार्टी ने, विज्ञापन विभाग सबने कितना दिमाग खंपाया यह जतलाने के लिए कि नोटबंदी ने वेश्यावृति के पाप को घटाया तो काला धन खत्म करा दिया। 

यह सब इस अंहकार की बदौलत है कि गलती हुई तो उसे माना कैसे जाए?  आखिर कैसे नरेंद्र मोदी माने कि नोटबंदी गलती थी? उससे जो सोचा था वह नहीं हुआ? 

छोटी सी एक बात!  इतना भर मानना कि हां, जो सोचा था वह नोटबंदी से नहीं सधा। गलती हुई! अब उस बात को वक्त व इतिहास पर छोड़ो। 

आप कह सकते है, मैं भी सोचता हूं कि नोटबंदी को फेल मानने का मेरा सच, क्या सच है? तो जवाब तो जन-जन का अनुभव, रिर्जव बैंक के आंकडे, आर्थिक घटनाक्रम, परिणामों से निकला हुआहै। इतना संभव है कि हम-आप सच की जिस तस्वीर को देख रहे है वह नरेंद्र मोदी को जस का तस न दिखाई दे। उसमें उन्हे आशा की किरणे फूटी दिख रही हो तब भी यह कह कर पल्ला झाडा जा सकता था कि आगे अच्छा होगा। इतिहास जज करेगा नोटबंदी का सच बरबादी थी या खुशहाली? मगर सरकार ने तो दो टूक शब्दों में, विज्ञापनों की बाढ़ से ऐलान कर दिया कि वाह नोटबंदी से कमाल हुआ। नकदी खत्म हुई तो रेड लाइट इलाके में, औरतों की वेश्यावृति खत्म हुई या यह कि निकम्मे-नाकाबिल लोगों की रोजगार से छंटनी हुई! 

क्या ऐसे उलजलूल झूठ पिछले 70 सालों में कभी सुनाई दिए? इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी की गलती को चुपचाप मानते हुए उस तारीख को गुमनामी में खोने दिया। उसे अनुशासन पर्व की तरह मनाने की नहीं सोची जैसे अभी नरेंद्र मोदी ने कालाधन विरोधी दिवस के रूप में मनाने में समय, साधन सब बरबाद किए।  

तभी अपना मानना है कि मोदी सरकार का पूरा कार्यकाल अब सिर्फ-सिर्फ मोदी के कहे को सही जतलाने की कोशिश में जाया होना है। मोदी सरकार उस अभूतपूर्व मोड में है जिसमें मकसद केवल भारत के प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता की स्थापना है। क्या अजब बात है। साढे तीन साल में सरकार इस मोड में पहुंच गई है कि नरेंद्र मोदी को यह प्रचारित करना पड रहा है कि उनकी सरकार झूठी नहीं है। उनका बोलना झूठ नहीं सच है। और यह काम सबकों झूठा बना कर मतलब रविशंकर प्रसाद से ले कर भारत के मीडिया, तंत्र सबको झूठा, अविश्वसनीय बनवा कर हो रहा है। आंख-कान-नाक के आगे के सहज-सामान्य अनुभव के छोटे-छोटे सच को दबाने के लिए फिजूल में झूठ के एवरेस्ट खडे कर दिए जा रहे है!  बिना यह समझे कि लोग जमीन पर रहते है न कि एवरेस्ट पर! लोग पेट, पैसे की आग के चलते मूर्खता में लंबे समय तक नहीं रह सकते। 

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