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चुनाव की जंग में सब जायज!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह इस बात पर अक्षरशः यकीन करने वाले नेता हैं कि मोहब्बत और जंग में सब जायज है। एक तो वे हर चुनाव जंग की तरह लड़ते हैं और उसमें कोई भी उपाय आजमाने से पीछे नहीं हटते हैं। कर्नाटक में भी ऐसा ही हुआ। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने प्रचार में हर मुद्दे और तिकड़म का इस्तेमाल किया। सबसे हैरानी की बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिन योजनाओं और फैसलों को अपने चार साल के शासन की उपलब्धि मानते हैं उनका जिक्र संभवतः किसी भी रैली में नहीं किया। 

प्रधानमंत्री मोदी का सबसे महत्वाकांक्षी फैसला नोटबंदी का था और दूसरा सबसे बड़ा फैसला जीएसटी का था। लेकिन उन्होंने इन दोनों मामलों का जिक्र नहीं किया। इनके नाम पर उन्होंने वोट नहीं मांगे। प्रधानमंत्री ने सुल्तानों की जयंती मनाने के नाम पर वोट मांगा। ध्यान रहे कर्नाटक सरकार टीपू सुल्तान की जयंती मनाती रही है, जिसका भाजपा के नेता विरोध करते रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने खुद ध्रुवीकरण के लिए इस मुद्दे को उठाया। 

उन्होंने राहुल गांधी पर निजी हमला किया। उनकी मां सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाया। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के कथित अपमान का मुद्दा उठाया। देश का गौरव रहे जनरल थिमैया और फील्ड मार्शल केएम करियप्पा के कथित अपमान का मुद्दा उठाया। हालांकि बाद में लोगों ने सबूत के साथ प्रधानमंत्री की कही बातों को गलत ठहराया। उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू पर हमला किया। जिस मुद्दे को उठा कर नेहरू को उन्होंने निशाना बनाया वह भी बाद में गलत ही साबित हुआ। वे कहते रहे कि कांग्रेस के पास मोदी, मोदी करने के सिवा कोई एजेंडा नहीं है और खुद हर रैली में कांग्रेस, कांग्रेस करते रहे!

कांग्रेस ने भी प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ी और न कोई तिकड़म छोड़ी। मुख्यमंत्री सिद्धरमैया बिल्कुल प्रादेशिक क्षत्रपों की तरह चुनाव लड़े हैं। उन्होंने कन्नड़ अस्मिता का मुद्दा उठाया, हिंदी विरोध को मुद्दा बनाया, प्रदेश के लिए अलग झंडा बनवा कर केंद्र के पास मंजूरी के लिए भेज और भाजपा के कोर वोटर रहे लिंगायत समुदाय को अलग धर्म की मान्यता देने का विवादित फैसला किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी कर्नाटक में उतनी ही मेहनत की, जितनी उन्होंने उत्तर प्रदेश में की थी। राहुल ने राज्य में कुल 20 रैलियां की और साथ ही 40 के करीब रोड शो और नुक्कड़ सभाएं कीं। राहुल ने इस दौरान करीब 55 किलोमीटर की यात्रा की। यूपी में भी उन्होंने 20 ही रैलियां की थीं। 

मतदाताओं को लुभाने के लिए कांग्रेस और भाजपा दोनों ने एक जैसे वादे किए और एक जैसा घोषणापत्र जारी किया। किसानों की कर्ज माफी से लेकर आम लोगों को मुफ्त के तोहफे बांटने का ऐलान दोनों तरफ से किया गया। तोड़ फोड़ और जातीय समीकरण बैठाने में भी किसी ने कोई कसर नहीं छोड़ी। भाजपा ने भगवाधारी योगी आदित्यनाथ के जरिए ध्रुवीकरण का प्रयास किया तो कांग्रेस ने कई इलाकों में अल्पसंख्यक मतदाताओं को लुभाने के लिए कई वादे किए। 

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