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यदि भाजपा कर्नाटक में हारी तो...

कतई नहीं सोचे इससे नरेंद्र मोदी या अमित शाह सुधरेगें, बदलेगें। नहीं, ये हार कर भी जीत का जश्न मनाएगें। कहेगें कि भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ा है और भाजपा येदियुरप्पा के कारण हारी। लोकसभा के चुनाव में देखिएगा, कर्नाटक में नरेंद्र मोदी को लोग फिर उतनी ही सीटे देगें जितनी 2014 में दी थी। मैंने पिछले सप्ताह लिखा था कि भाजपा यदि कर्नाटक में जीती तो.... अर्थ होगा विपक्ष समझ नहीं रहा कि नरेंद्र मोदी- अमित शाह सामान्य प्रतिद्विंदी नहीं है बल्कि ये असामान्य, असाधारण है। इनसे लड़ने का विपक्ष का पुराना राजनैतिक ढर्रा हार की गांरटी है। ऐसे ही आज मेरी थीसिस है कि भाजपा की हार मोदी-शाह को और क्रूर बनाएगी। उनमें 2019 के टारगेट में करो-मरों का जूनुन और बढ़ेगा। 

जरा गौर करें पिछले एक सप्ताह की घटनाओं पर। नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने कर्नाटक में जो किया वह यूपी विधानभा चुनाव का रीपिट था। मतलब सब चीजे याकि विकास जैसी बाते भाड़ में और हिंदू बनाम मुस्लिम के साथ आखिरी 48 घंटे में पैसो से, सोशल मीडिया मैसेज से, घर-घर जा कर माइक्रों लेवल पर लोगों को हिंदू के नाते सोचने को प्रेरित करने वाला प्रबंधन याकि वोट मशीन जस की तस यूपी जैसी थी!

हां, शुक्रवार को नरेंद्र मोदी का नेपाल जाना और जानकी मंदिर में दर्शन का फोटो शूट भी कर्नाटक के हिंदूओं को यह लाइव मैसेज था कि देखों नरेंद्र मोदी कैसे आस्थावान हिंदू हैं। याद करे यूपी चुनाव के आखिरी दिन वाराणसी के एक यादव संत आश्रम में मोदी का गेरूआ- रूद्राक्ष पहने, गाय को चारा खिलाते फोटो वाले शूट। वह भी तब टीवी चैनल पर लाइव था। और शुक्रवार को भी सुबह सभी टीवी चैनलों पर कर्नाटक के लोगों ने मोदी की पूजा करते हुए हिंदू मैसेजिंग देखी, समझी। प्रचार खत्म लेकिन मोदी का लाइव हिंदू प्रचार। चुनाव आयोग क्या खाक करेगा। ऐसे ही हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल का कर्नाटक को ध्यान में रख कर ही मास्टर स्ट्रोक नमाज पर बयान था। वह टीवी चैनलों पर सप्ताह भर नैरेटिव लिए हुए था। हिंदू यह सोच झनझना गया कि बात तो ठिक है। कोई गलतफहमी न रखें कि नेपाल यात्रा और वहां मंदिर के दर्शन और एक मुख्यमंत्री से नमाज का बयान बिना सोचे समझे याकि कर्नाटक की वजह से नहीं था। 

हां, नरेंद्र मोदी-अमित शाह कलेंडर में हर प्रोग्राम बनाते हुए उसमें चुनाव के वक्त की पहली प्राथमिकता का अनिवार्यत- ख्याल रखते है। नमाज का हल्ला, मोदी का मंदिर दर्शन, लंदन की यात्रा में भी लिंगायत शख्शियत के स्मारक पर माला अर्पण, कश्मीर में पत्थरबाज, सेना प्रमुख का बयान और टीवी चैनलों पर हिंदू बनाम मुस्लिम बहस की बहस के साथ जीत तय बताने वाले अमित शाह के इंटरव्यू याकि एक-एक बिंदु मोदी-शाह की चुनाव जीतने की पूर्व निर्धारित रणनीति का हिस्सा होते है। इनमें मतदान से पहले के 48 घंटे में सोशल मीडिया, आईटी के जरिए घर-परिवार- नौजवान में मैसेजों की बाढ़ और पैसे बहा देना और विपक्ष को खर्च में रोकने के लिए इनकम टैक्स जैसी छापामारी और टीवी चैनलों विपक्ष को बदमान कराने की बहस से उसे उलटे कार्नर करा देना यह सब मोदी-शाह के असाधारण प्रतिद्विंदी होने की बेसिक बते है। इनकी यह असाधारणता हर चुनाव के साथ बढ़ती जा रही है। 

हां, वोट का हिसाब, माहौल और जनता की तकलीफ की हकीकत में यदि कर्नाटक के चुनाव को तौले तो चुनाव में भाजपा साफ होनी चाहिए। भाजपा की वोट गणित में वहां कुछ भी तो नहीं है। हिसाब से दलित 17 प्रतिशत, मुसलमान 13 प्रतिशत, सिद्वारमैया के आठ प्रतिशत कुरबा और कर्नाटक में कांग्रेस के सभी जातियों में परंपरागत वोटों में से चौथाई वोट भी यदि घर से निकले तो कांग्रेस की मजे से जीत होनी चाहिए। ल़ॉजिक यह भी बना है कि देवगौडा की जनता दल एस को उसके पक्के मैसूर इलाके मे भी इस मुसलमान बिल्कुल वोट नहीं देगें। पहले मिलता रहा है। इस दफा भाजपा- जनता दल (एस) के चुनाव बाद एलायंस बन सकने और मोदी की देवगौडा के प्रति तारीफ से मुसलमान बिदक कर सौ टका कांग्रेस की तरफ जाना चाहिए। ऐसे ही मोदी-शाह के खिलाफ कट्टरता का तत्व दलितों में भी बन गया है। इससे भी कांग्रेस के मजे होने चाहिए। जनता दल (एस) की बिगडी हवा का अल कांग्रेस को फायदा मिलना चाहिए। 

बावजूद इसके पिछले एक सप्ताह में कर्नाटक से (खास कर तटीय कर्नाटक) से जो हल्ला सुनाई दे रहा है उसमें गणित गायब है और हिंदू होने की कैमेस्ट्री, मोदी-शाह के साम, दाम, दंड, भेद के प्रयोगों का असर अधिक दिख रहा है। पूरा विपक्ष, राहुल गांधी, सिद्वारमैया, कांग्रेस सबको आखिर में ही यह समझ आया होगा कि मोदी-शाह क्या अति कर दे रहे है। दस तरह के अलग-अलग ब्रहास्त्र निकाल इतना हमला कर दे रहे है कि विरोधी लड़ने, हमला करने के बजाय अपने बचाव में जुटे हुए है। कभी इनकम टैक्स के छापों से, कभी वोटर आईडी कार्ड पर हल्ला बोल से तो कभी ऐन वक्त अमित शाह के हर सीट पर संसाधनों की बाढ़ ला देने से।

अपना तर्क है कि मोदी-शाह जिस पिच पर चुनाव ले गए है, जनता दल (एस) को खत्म करा अपना ही मुख्य मुकाबला (यूपी समतुल्य) बना कांग्रेस के हाथ-पांव जैसे फुलवा दिए है वह जीत-हार से ज्यादा लोकसभा की रणनीति के नाते अधिक मतलब वाली बात है।

मतलब कर्नाटक में भाजपा की हार के बावजूद मोदी-शाह के हौसले बुंलद होंगे। जीते तब भी और हारे तब भी ये दोनों 15 मई के बाद विपक्ष पर और पिल पडेगें। अपना मानना है कि दिल्ली विधानसभा या बिहार विधानसभा में चुनाव हारने का मोदी-शाह का अनुभव और उन पर असर बनाम आज की स्थिति में बहुत फर्क आ गया है। वे दो हार सदमा थी। उससे बहुत कुछ मोदी-शाह ने सीखा। चुनाव लड़ने, जीतने के लिए खास तरह के प्रबंधों, नुस्खों, मैनपॉवर, मनी पॉवर, मसल पॉवर पर वोट बनाने की नई असेंबली लाईन गढ़ ली। एक तरह से उसकी कर्नाटक में घोर विपरित परिस्थितियों में भी टेस्टींग हो गई है। इसलिए मैं उलटा सोच रहा हूं कि कर्नाटक में यदि भाजपा हारी तो मोदी-शाह का निश्चय, संकल्प, तैयारी 2019 की ज्यादा और बढेगी। ये और अधिक खूंखार होंगे। यूपी चुनाव में जाटों को यदि भाजपा हारी तो  मुसलमानों के राज, श्मशान- कब्रिस्तान, गाय को चारा खिलाने की अंतरधारा यदि कर्नाटक चुनाव में मुसलमान का नमाज पढ़ना हिंदू में चर्चा का अप्रत्य़ाशित नुस्खा बनी है तो  सोचे लोकसभा चुनाव के वक्त क्या होगा? और मान ले कर्नाटक में भाजपा हारी तो लोकसभा चुनाव आते-आते हिंदूओं को उकसाने के लिए, उन्हे मूर्ख बनाने के लिए और क्या-क्या यूनिक आईडिया सोचे जाएगें!

इसलिए कर्नाटक का चुनाव निर्णायक है मगर उसकी हार-जीत से मोदी-शाह के 2019 में वापिस शपथ लेने के निश्चय, जुनून और तैयारियों व मनौविज्ञान पर रत्ती भर असर नहीं पड़ना है। इनका अगला पूरा साल भारत राष्ट्र-राज्य की मशीनरी, उसके साम,दाम दंड, भेद को जीतने के अपने यज्ञ में झौक देने का होगा। 

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