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दलित वोट में भाजपा की मुश्किल बढ़ी!

उत्तर प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भाजपा की भारी भरकम जीत की एक व्याख्या भाजपा नेता इस रुप में करते हैं कि मायावती के दलित वोट टूट रहे हैं और वे भाजपा की ओर आ रहे हैं। लोकसभा चुनाव के पहले से ही भाजपा ने सबसे ज्यादा सेंधमारी बसपा के वोट में की। उनके लोग तोड़े गए और दलित वोटों में काम किया गया। 2017 के फरवरी, मार्च में हुए विधानसभा चुनाव से तीन, चार महीने पहले नोटबंदी हुई थी। वैसे तो इसका बहुत बड़ा आयाम है पर सामान्य राजनीतिक नजरिए से इसकी एक व्याख्या यह भी हुई थी कि बसपा की कमर तोड़ने के लिए नोटबंदी हुई है। बसपा के लोगों ने भी इसका प्रचार किया। चुनाव नतीजे सचमुच बसपा की कमर तोड़ने वाले थे। पार्टी 403 में 20 सीट यानी पांच फीसदी सीट भी नहीं जीत पाई। 

इसी तरह बिहार में भाजपा ने खुल कर दलित राजनीति की। रामविलास पासवान लोकसभा चुनाव के समय ही भाजपा के साथ आ गए थे और विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने जीतन राम मांझी को भी अपने गठबंधन में शामिल किया। हालांकि विधानसभा चुनाव में भाजपा का दांव सफल नहीं हुआ। पर यह हकीकत है कि लालू प्रसाद के यादव, मुस्लिम और नीतीश कुमार के कोईरी, कुर्मी गठबंधन का जवाब देने के लिए भाजपा ने दलित अपने साथ करने का प्रयास किया था। 

उत्तर प्रदेश और बिहार में अब भी भाजपा का फोकस दलित वोट पर है। इन दो के अलावा उत्तर, पूर्वी और मध्य भारत में भाजपा खुद को दलित और आदिवासी वोट का एकमात्र हकदार मानती है। पर अब यह समीकरण गड़बड़ा रहा है। एक के बाद एक घटनाओं से दलित चेतना प्रभावित हुई है। फिर से मनुवाद के विरोध का समय लौट आया दिख रहा है। कभी इसी मनुवाद का विरोध करके मायावती ने उत्तर प्रदेश में राजनीति जमाई थी। अब मायावती की बजाय मनुवाद का विरोध राहुल गांधी कर रहे हैं और जिग्नेश मेवाणी कर रहे हैं।

एक बार फिर मनुवाद का चर्चा में आना और दलितों पर होने वाले हर जुल्म, अत्याचार के लिए भाजपा और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को जिम्मेदार ठहराने की राजनीति अंततः किसका नुकसान करेगी और किसका फायदा करेगी, यह समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। इसका फायदा कम से कम उत्तर प्रदेश में अपने आप मायावती को होगा और नुकसान भाजपा का होगा। पर मुश्किल यह है कि इस हालात से निपटने के लिए भाजपा का कोई प्रयास अभी नहीं दिख रहा है। 

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