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भाजपा झूमेगी, विपक्ष बनेगा!

भाजपा फिर झूम रही है। यूपी के स्थानिय निकाय चुनावों से भाजपा के वापिस नगाड़े बजे! क्या आप नहीं मानेंगे कि मई 2014 से ले कर अब तक नगाड़ों की निरंतरता ने नरेंद्र मोदी-अमित शाह को लगाता झूमाया हुआ है जबकि विपक्ष याकि राहुल गांधी के लिए दो बूंद आंसू बहाने को कोई नहीं? लेकिन यदि ऐसा होता तो हर जीत पर नरेंद्र मोदी-अमित शाह फूल कर कुप्पा होते हुए क्यों बार-बार कहते कि देखों हम जीत गए! नोटबंदी से पहले कांग्रेस मुक्त भारत का नारा था। यूपी के चुनाव से विपक्ष के ताबूत पर कील ठूकी लगी थी लेकिन आठ महिने में फिर जताने की नौबत आ पडी कि यूपी में डंका बजा! आजाद भारत के 70 साल के इतिहास में पहली बार ऐसा है कि छप्पर फाड बहुमत, जनता से बार-बार जीत के बावजूद प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी को हर चुनाव से डंका बजवाना पड रहा कि जनता अभी भी उनके साथ! 

क्या सोनिया-मनमोहन सरकार के पहले पांच साल में ऐसा हुआ था? वाजपेयी और नरसिंहराव के वक्त भी ऐसे नहीं हुआ करता था तो राजीव, नेहरू-इंदिरा के 3-3 कार्यकाल में भी कभी नहीं हुआ कि जनता बार-बार जीताएं फिर भी नेहरू-इंदिरा शौर करें कि जीत का सिलसिला कायम है। मनमोहन सरकार के पहले पांच साल बिना सियासी-चुनावी फिक्र के थे। क्या वैसा मोदी सरकार के साथ उसके पहले पांच सालों में दिख रहा है? सो क्या 2019 तक भाजपा लगातार लड़ते-लड़ते हांफती हुई नहीं दिखाई देगी? 

अजब स्थिति है। मई 2014 से ले कर आज तक हिंदूओं में आंधी है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नित दिन चिंता में दिखते है कि कहीं राजनैतिक कीमत अदा करने की नौबत न आ जाए! हिंदू मई 2014 में भी दिवाने थे आज भी है। बावजूद इसके भाजपा में चिंता है कि राहुल गांधी को कहीं हिंदू नहीं माना जाने लगे! कही योगी आदित्यनाथ का भगवा फीका तो नहीं पड रहा! 

यह डर, यह चिंता,  असुरक्षा, लगातार चुनावी मोड में बना रहना कुल मिला कर राजकाज की बदौलत है। नोटबंदी, जीएसटी, बेरोजगारी, किसानी बदहाली, आर्थिक दुर्दशा, जमीनी भ्रष्टाचार क्योंकि हकीकत है इसलिए जनता में इसकी फील की काट के लिए चुनाव से जतलाना पड रहा है कि मोदी जो कर रहे है उस पर हिंदूओं का ठप्पा है। हिसाब से मई 2014 में हिंदुओं ने नरेंद्र मोदी को 2019 तक का जनादेश दिया था। बीच में यह प्रमाणित करने की जरूरत नहीं है कि जन समर्थन है या नहीं। वह तो है और रहेगा। फरवरी 2018 में जब यूपी के हिंदुओं ने मुसलमान की चिंता को अंर्तमन में गहराई से पैंठाया तो वह आठ महिने में खत्म होने से रहा! वह तो वैसे ही रहेगी जैसे डेढ दशक गुजरात के हिंदूओं में रहा। इसलिए स्थानिय निकायों या जनवरी के उपचुनावों में भाजपा के प्रति समर्थन बना रहना मतलब वाली बात नहीं है। मतलब वाली बात यदि है तो वह इस सबसे मई 2019 के लोकसभा चुनाव के पड़ते बीज है। 

ये बीज मायावती, अखिलेश, राहुल गांधी के मन के है। स्थानीय निकायों की जीत पर योगी आदित्यनाथ ने लोकसभा चुनाव में आगे 80 सीटे जीतने की जो गर्वोक्ति की है क्या वह इन तीनों नेताओं ने नहीं सुनी होगी? क्या ये अगला लोकसभा चुनाव वैसे ही संकल्प से नहीं लडेगें जैसे गुजरात में हार्दिक, अल्पेश, जिग्नेश मिल कर भाजपा को हराने का साझा लक्ष्य बना कर लड रहे है? मायावती, अखिलेश, राहुल तीनों मार्च 2019 को लोकसभा चुनाव की अधिसूचना तक अलग-अलग मरे पडे रहे और मोदी सरकार तीनों को औकात का अहसास कराते हुए मारती जाए तो अधिसूचना के बाद अचानक यदि ये तीनों इकठ्ठे हुए तो क्या होगा? और क्या निकाय चुनावों में हार से ऐसे इकठ्ठे होने का बीज नहीं पड़ा होगा? 

यह बात दूर की कौड़ी लग सकती है। लेकिन जान ले कि स्थानिय निकाय चुनावों के नतीजों से अखिलेश, मायावती, राहुल गांधी तीनों को मन ही मन सोचने को मजबूर किया होगा। मोदी सरकार ने राजनीति को क्योंकि सहज-सामान्य नहीं रहने दिया है। विपक्ष को मारने की मंशा क्योंकि घोषित है इसलिए यूपी के ये तीन चेहरे चुपचाप ऐन वक्त एक-दूसरे को कंधा न दे, यह नामुमकिन है। 

उस नाते विपक्ष के लिए यूपी 2019 तक पकता जाएगा। स्थानिय निकायों के चुनाव नतीजों से योगी आदित्यनाथ का यह अंहकार और बढ़ेगा कि उनसे रामराज्य बन रहा है। उनका राजपूतवाद मुखर बनेगा। ब्राह्यण, यादव, ओबीसी सब रोजर्मरा में सुन भी रहे है कि जिलों में योगी ने राजपूत डीएम-एसपी-अफसरों की कमान बनवा दी है। न अखिलेश जैसे ग्रांड विकास प्रोजेक्ट है और न मायावती जैसा भययुक्त प्रशासन। सो लोकसभा की 80 ही सीटों के लक्ष्य के आगे यदि बसपा-सपा-कांग्रेस एलायंस खडा हुआ तो गुजरात के पटेलों की तरह ब्राह्यण भी उठे हुए होगें तो दलित, ओबीसी भी वही हल्ला कर रहे होंगे जो जिग्नेश, अल्पेश अभी गुजरात में कर रहे है। 

पूछ सकते है मैं आज के गुजरात की भावी यूपी के नाते क्यों तुलना कर रहा हूं?  इसलिए कि योगी को गुजरात में भाजपा घूमा रही है। और योगी के दौरे की, सभाओं की जो तस्वीरे देखी है उनमें भीड़ का नदारत होना चौंकाने वाला है। हिंदुत्व की नंबर एक प्रयोगशाला में यदि लोग भगवा योगी के लिए नहीं उमड़ रहे है तो जमीनी सच्चाईयों में जब यूपी का हिंदू जातिवादी उठाव पाएंगा तो क्या होगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। 

सो विपक्ष के लिए भला हुआ जो यूपी के ताजा चुनावों में सपा या बसपा की आंधी नहीं थी। और राहुल गांधी के अमेठी न जीता सकने का हल्ला भी हुआ। यदि इसमें किसी एक की भी इन चुनावों में ताकत झलकती तो वह 2019 का अपने को शेर मानता। गलतफहमियों में आता। सो विपक्ष का भला मरे रहने में है और योगीजी, मोदीजी के झूमे रहने में है!

क्या नहीं?

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