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केबिनेट, अधिकार, ताकत, अहंकार

हरि शंकर व्यास
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मई 2014 और 2 सिंतबर 2017 के केबिनेट गठन, केबिनेट फेरबदल में वक्त का फर्क मामूली है। इस दफा अरूण जेतली बिना रोल के थे। उन्होने अपना खेमां, अपने लोग बिना पेंदे के लोटे वाले बनाए तो ये इस वक्त में अपने-आप लुढ़क कर नरेंद्र मोदी, अमित शाह के हो गए। उस नाते प्रधानमंत्री ने इन्ही से अपनी ताकत दिखाई की जो राज्यसभा से है, जो कभी जनता के बीच चुनाव जीत राजनीति नहीं कर सकते है उनकी और पदोन्नति! संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री को हक है जो वे अपने अधिकार में चाहे जिसे मंत्री बनाए। यह पीएम की ताकत प्रर्दशन का जरिया है। मई 2014 में प्रधानमंत्री ने स्मृति ईरानी को सीधे मानव संसाधन मंत्री बना अपनी ताकत का यह मैसेज दिया था कि वे कुछ भी कर सकते हंै। जिसके पास डिग्री नहीं वह भी कुलपतियों का, पूरी शिक्षा को संभाल सकते हंै। उससे भाजपा की पुरानी नेत्रियों के साथ पार्टी, देश-दुनिया को मैसेज था कि वे असीम ताकत के मालिक हंै। 

ताकत, अधिकार का यह प्रदर्शन इस दफा निर्मला सीतारमण को रक्षा मंत्री बना कर दिखाया। चेहरे और पद में किससे क्या योग बनता है क्षेत्रिय संतुलन और जमीनी राजनीति का क्या तकाजा है, इन सब विचार की जरूरत इसलिए नहीं थी क्योंकि वे और अमित शाह दोनों मानते है कि जीताना उन्हे है, वे ही ग्रांडमास्टर हैं तो इधर-उधर की बातों की भला क्यों चिंता हो? तभी यह भी चिंता नहीं हुई कि उत्तर-पूर्व पर ध्यान दे। या वहां से किरण रीजिजू है जो पार्टी में पहचान, विचार, चेहरे, अनुभव के नाते इमेज लिए हुए है तो केबिनेट मंत्री बना देते है। आखिर एक तो उत्तर-पूर्व से केबिनेट स्तर का मंत्री होना चाहिए। या यह कि हरदीप पुरी, अल्फांसे पसंद आए है तो उनको उनके अनुभव के विदेश मंत्रालय या शहरी विकास मंत्रालय में बैठाए। मगर राजनियक हरदीप पुरी को शहरी आवास व शहरी आवास में रहे अफसर अल्फांसे को पर्यटन विभाग दिया गया। ध्यान रहे हरदीप पुरी भी अरूण जेतली के जरिए दरबार में पंहुचे थे। मगर वे पाकिस्तान के साथ ट्रेक टू कूटनीति, व अजित डोभाल के भरोसे से फिट हुए। इन तीन अफसरों का ऐसे फिट होना प्रमाण है कि जैसे लालू के दरबार में अलग-अलग जरियों से, इधर-उधर की खूबियों से ( जैसे कबाब खिलाने, छैनी खिलाने) लोग प्रभावित कर मंत्री बनते थे वैसा ही अब मोदी दरबार में होने लगा है। किसी को कुछ भी बना दो सब चलेगा, दौड़ेगा क्योंकि इन्हे नहीं दौड़ना। दोड़ना, दौड़ाना और 24 घंटे लगातार काम तो प्रधानमंत्री और उनके दफ्तर को करना है।     

सो एक ही काम करने वाला। एक ही सर्वज्ञ, एक ही अवतार, एक ही भगवान! फ्रेम में एक ही चेहरा। सो मसला अधिकार उपयोग, ताकत प्रदर्शन का है या अंहकार या आत्ममुग्धता का, इस सब पर सोचने की जरूरत ही नहीं है। जो है वह निराकार सवा सौ करोड़ लोगों का एक प्रतिनिधी चेहरा है। वह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी है। 

क्या आप फ्रेम में कोई दूसरा चेहरा देखते हैं?  

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