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अस्थाना का यह क्या माजरा?

क्या‍ नरेंद्र मोदी, अमित शाह और अरूण जेतली में रिश्ते बदले हंै? इसके राजनैतिक संकेतों को फिलहाल अलग रखंे लेकिन एक प्रशासनिक घटना ने इस बाबत चौंकाया है। शुक्रवार को प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई में बतौर स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना की नियुक्ती को चुनौती देने वाली जो याचिका दायर की है वह अपने आपमें चौंकाने वाली है। दुनिया जानती है, आम चर्चा है कि राकेश अस्थाना का अर्थ नरेंद्र मोदी और अमित शाह का खास होना है। तब उनकी पदोन्नति का ऐसा झमेला क्यों बना कि सुप्रीम कोर्ट मामला पहुंच गया और आगे डायरेक्टर की नियुक्ती में अनिवार्यतः फच्चर पड़ेगा। संभव है प्रशांत भूषण की याचिका 2016 जैसे खारिज हो। इसलिए कि अभी अतिरिक्त निदेशक से विशेष निदेशक की तख्ती बदलने का सिर्फ मामला है लेकिन आगे तो उनकी निदेशक की नियुक्ती का काम होना है। तब अभी जिस बात पर डायरेक्टर ने उन्हे न बनाने का नोट दिया तो वह आगे क्या ज्यादा निर्णायक नही होगा?  

तभी राकेश अस्थाना के खिलाफ साजिश गहरी और सरकार के भीतर से है बावजूद कि वे नरेंद्र मोदी-अमित शाह के खास हंै। घटनाक्रम एक सप्ताह का है। 21 अक्टूबर को मुख्य सर्तकता आयुक्त याकि सीवीसी केवी चौधरी की अध्यक्षता में पांच सदस्यों की कमेटी विचार के लिए बैठी। दो साथी आयुक्त, गृह और कार्मिक सचिवों की इस बैठक के आगे सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा का दो पेज का वह नोट था जिसमें अस्थाना को विशेष सचिव न बनाने की दलील में ब्यौरा था। इसमें उल्लेख था कि अस्थाना का नाम उस 2011 की डायरी में उल्लेखित था जो सीबीआई को एक छापे में मिली और इसका सीबीआई की दायर एफआईआर में जिक्र भी है। यह एफआईआर इसी 30 अगस्त को दायर हुई थी। गुजरात की कंपनी स्टर्लिंग बायोटेक- संदेशारा ग्रुप कंपनियों से आयकर अधिकारियों के कथित तौर पर रिश्वत लेने पर वह एफआईआर है।

हिसाब से डायरेक्टर के यहां यह रूटिन में बना नोट भी हो सकता है। आखिर नोट नीचे से बनता हुआ ऊपर पहुंचता है तो तथ्य दर्ज होगें ही। मगर यह बात लीक हो, डायरेक्टर के दो पेज के नोट की खबर मीडिया में छपे और सीवीसी उसे डायरेक्टर वर्मा के ‘फ्रेंक नोट’ नाते प्रचारित करते हुए कहें कि हमने उसे देखा मगर सर्वानुमित से बनाने का फैसला किया तो इसे रायता फैलाना ही था। 

हिसाब से चुपचाप बैठक और नियुक्ती की घोषणा तक दुनिया को खबर नहीं लगनी थी कि राकेश अस्थाना हुए विशेष सचिव। पर न केवल बात लीक हुई बल्कि यह तक चला कि अस्थाना को न बनाने की सिफारिश की भी बात हुई। या यह कि डायरेक्टर ने पदोन्नति का विरोध किया। मतलब कुछ गड़बड़ है। 

सो भाई लोगों के कान खड़े हुए। पहले तो लीक फिर अरूण जेतली के भरोसेमंद रहे सीवीसी चौधरी का फैसले का खुलासा करते हुए खुलासा कर देना और प्रशांत भूषण का सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचना संकेत है कि राकेश अस्थाना का आगे का रास्ता न बने ऐसा चाहने वाले कम प्रभावशाली नहीं हंै। जो हो, सुप्रीम कोर्ट में अब फिर अस्थाना को ले कर विचार होगा। 

प्रशांत भूषण ने अपनी याचिका में कायदे से सरकार व प्रधानमंत्री की हड़बड़ी का जिक्र किया है। उन्होने कहा है- रविवार (22 अक्टूबर)  की शाम को कैबिनेट नियुक्ति कमेटी (प्रधानमंत्री- गृहमंत्री की सदस्यता वाली) होती हैं।  रविवार 22 तारीख को प्रधानमंत्री गुजरात में थे, लेकिन उसी दिन आदेश जारी कर दिया गया कि अस्थाना को प्रमोट किया गया। तब सीवीसी की मंजूरी क्या थी?  … 21 अक्टूबर की रात में प्रधानमंत्री कार्यालय से सीवीसी को आदेश जाता है जिसमें राकेश अस्थाना को एडिशनल डायरेक्टर से सीबीआई का स्पेशल डायरेक्टर (विशेष निदेशक) बनाने के लिए कहा गया। शनिवार को, छुट्टी के दिन सीवीसी के तीनों आयुक्त, सीबीआई डायरेक्टर, गृह सचिव और डीओपीटी सचिव की बैठक होती है।

इसमें सीबीआई डायरेक्टर का ‘फ्रेंक नोट’ विचार में होता है। ... मेरी जानकारी के मुताबिक सीबीआई डायरेक्टर की इस बात पर सीवीसी कमिश्नर और सचिवों वगैरह ने सहमति जताई कि इनका प्रमोशन नहीं किया जा सकता। इसके चलते मुख्य सीवीसी ने बैठक टालते हुए अगले हफ्ते बैठक बुलाने की बात कही।

यही नहीं प्रशांत भूषण ने अपनी याचिका में सभी दस्तावेज तलब कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट में कहा है। मतलब मोदी-शाह के खास राकेश अस्थाना फिर पड़ताल में होंगे और बदनामी के साथ डायरेक्टर पद का आगे का केस भी गड़बड़ाया। 

सोचें क्या यह मामूली साजिश है? क्या इससे सरकार के आला समीकरणों के संकेत नहीं मिलते?  

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