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कांग्रेस के साथ कैसे एलायंस

उत्तर और पूर्वी भारत के जिन राज्यों के बारे में ऊपर लिखा है उन राज्यों में कांग्रेस हाशिए की पार्टी है। पर इनके अलावा देश के अनेक राज्य हैं, जहां कांग्रेस मजबूत है या क्षेत्रीय पार्टियों के सामने एक चुनौती की तरह है। इन राज्यों में प्रादेशिक क्षत्रपों को इस बात का डर बना रहता है कि अगर उन्होंने कांग्रेस को ज्यादा तरजीह दी तो उनका अस्तित्व हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। ऐसे राज्यों में गठबंधन को लेकर कांग्रेस को ज्यादा चिंता है। 

मिसाल के तौर पर ओड़िशा का मामला है। ओड़िशा में कांग्रेस को हटाने के लिए बीजू जनता दल ने भाजपा के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था। पर पिछले करीब दो दशक में बीजद ने अपने को इतना मजबूत किया है कि उसे किसी पार्टी की जरूरत नहीं है। पिछले कुछ समय से भाजपा ने उसके सामने बड़ी चुनौती पेश की है पर बीजद अब भी इस भरोसे में है कि वह भाजपा की चुनौती को खुद ही निपटा लेगी। असल में बीजद की चिंता यह है कि अगर कांग्रेस को मौका दिया तो वह फिर प्रदेश में खड़ी हो जाएगी और तब कांग्रेस की चुनौती को रोक पाना उसके वश में नहीं होगा। इसलिए बीजद नेता किसी हाल में कांग्रेस से तालमेल के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं। 

यहीं स्थिति आंध्र प्रदेश में है। वहां मुख्य विपक्षी पार्टी जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस है। पिछले चुनाव में कांग्रेस खाता भी नहीं खोल पाई थी। लेकिन सत्तारूढ़ तेलुगू देशम पार्टी के नेताओं को कांग्रेस की ज्यादा चिंता है। उनको लग रहा है कि कांग्रेस को खड़ा किया गया तो वह बड़ी चुनौती बन जाएगी। जगन मोहन और भाजपा दोनों से लड़ना चंद्रबाबू नायडू के लिए आसान है पर कांग्रेस से लड़ना मुश्किल है। आखिर कांग्रेस ने ही उनका राज खत्म किया था और दस साल सत्ता से बाहर रखा था। इसलिए केंद्र की सरकार से अलग होने के बावजूद वे एनडीए छोड़ कर यूपीए के साथ जुड़ने के बारे में नहीं सोच रहे हैं। 

इसी तरह तरह की स्थिति आंध्र प्रदेश से अलग होकर बने नए राज्य तेलंगाना की है। पहले चुनाव में अलग तेलंगाना बनवाने का श्रेय तेलंगाना राष्ट्र समिति की नेता के चंद्रशेखर राव को मिल गया और लोकसभा व विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी को शानदार जीत मिली। पर अब तेलंगाना की स्थिति बदल रही है। तभी चंद्रशेखर राव ने देश भर की क्षेत्रीय पार्टियों से गैर कांग्रेस और गैर भाजपा मोर्चा बनाने की अपील की। उनको कांग्रेस की चिंता सता रही है। लोग कांग्रेस को अलग राज्य बनवाने का श्रेय दे सकते हैं और दूसरे दोनों पार्टियों का वोट बैंक भी एक जैसा है। अगर एक बार कांग्रेस तेलंगाना में मजबूत हुई तो टीआरएस का सफाया भी हो सकता है। तभी यह मुश्किल लग रहा है कि तेलंगाना में कोई महागठबंधन बन पाएगा। 

इन तीन राज्यों में लोकसभा की 63 सीटें हैं, जिनमें से सिर्फ चार सीट भाजपा के पास है। वह पिछली बार आंध्र प्रदेश में दो और तेलंगाना व ओड़िशा में एक एक सीट जीत पाई थी। तभी उसकी नजर इन तीन राज्यों पर है। इन तीन राज्यों को क्षत्रप नवीन पटनायक, चंद्रबाबू नायडू और के चंद्रशेखर राव भाजपा को रोक लेने के भरोसे में हैं। पर अगर गठबंधन नहीं बनता है और तीनों राज्यों में त्रिकोणात्मक या चार कोणीय मुकाबला होता है तो भाजपा को इसका बड़ा फायदा होगा। भाजपा इन राज्यों में लोगों के लिए अनजान पार्टी है, नरेंद्र मोदी के प्रति लोगों का आकर्षण है, ध्रुवीकरण की संभावना है और ऊपर से अमित शाह की रणनीति है।

दक्षिण के तीन और राज्यों में से कर्नाटक में भाजपा का सीधा मुकाबला कांग्रेस के साथ है। विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और जेडीएस दोनों अलग अलग लड़ रहे हैं और जेडीएस ने बसपा और लेफ्ट पार्टियों के साथ मिल कर एक गठबंधन बनाया है। इस त्रिकोणात्मक लड़ाई का सीधा फायदा भाजपा को होगा। यह उम्मीद की जा रही है कि विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस और जेडीएस एक साथ आ सकते हैं। कर्नाटक में लोकसभा की 28 सीटें हैं, जिनमें से 17 भाजपा ने जीती थी। कांग्रेस को नौ और जेडीएस को दो सीट मिली थी। अगर कांग्रेस और जेडीएस एक साथ आते हैं तो भाजपा को नुकसान होगा। 

ऊपर के चार राज्यों की तरह की स्थिति हरियाणा और दिल्ली की है। हरियाणा में कांग्रेस विरोधी पार्टी ओमप्रकाश चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल रही है और दिल्ली में कांग्रेस विरोध पर ही आम आदमी पार्टी आगे बढ़ी है। इन दोनों राज्यों में कांग्रेस के नेता इनेलो और आप से हाथ मिलाने के बारे में सोच भी नहीं रहे हैं। इन राज्यों की 17 में से 14 सीटें भाजपा ने जीती हैं और अगर त्रिकोणात्मक लड़ाई हुई तो भाजपा को फिर फायदा होगा।  

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