कांग्रेस, राहुल नहीं समझ रहे!

अरविंद केजरीवाल और प्रशांत किशोर ने दिल्ली चुनाव में अपनी इस थीसिस पर मोहर लगाई है कि इस देश में राजनीति करनी है तो मुसलमानों से बच कर रहना होगा और बजरंग बली के भक्त बन कर जयश्री राम कहना होगा। मैं इस बात को 9/11 याकि इस्लाम पर पैदा वैश्विक चिंता के बाद से लिख रहा हूं! कांग्रेस, सेकुलर जमात और नेहरू के आईडिया ऑफ इंडिया में ही भारत की एकता-अखंडता मानने वाले बुद्धीजीवियों के आगे अपने बार, अनेक जुमलों से मैंने तर्क किया है। इसलिए अपने को बहुत अच्छा लगा जब दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे के दिन सेकुलर, प्रगतिशील बकौल हनुमान भक्त, भारत माता की जय, वंदे मातरम का जयकारे के साथ केजरीवाल को दिखलाते हुए भाजपा-अमित साहब की हार पर खुशी में बम-बम मूड टीवी स्क्रीन पर दर्शा रहे थे।

हो सकता है मैं गलत हंू मगर अपना मानना है कि अरविंद केजरीवाल के हनुमान भक्त चेहरे के पीछे प्रशांत किशोर की राय रही हो। प्रशांत किशोर को आब्जर्व करते हुए मैंने 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले नीतिश कुमार की मार्केटिंग, उनके ह़ॉर्डिग की कलर स्कीम, नीतीश के सुशासन की थीम, राजद-कांग्रेस से एलायंस की रणनीति पर मैंने तब भी लिखा और अब भी लिख रहा हूं कि लोगों की नब्ज (तभी 2014 से पहले हिंदू नब्ज को समझ नरेंद्र मोदी के लिए प्रशांत किशोर का काम था) पकड़ने में प्रशांत किशोर की एप्रोच ईमानदार पेशेवर की है। अरविंद केजरीवाल ने शाहीन बाग नहीं जा कर, हनुमान चालीसा, हनुमान मंदिर, मंगलवार, हनुमानजी की जय और उसके लगे रहो केजरीवाल जैसी जुमलेबाजी से अपने आपको जैसे बदला, उसमें केजरीवाल की दुश्मन को समझने, उस माफिक अपने को बदलने की तत्परता की हकीकत भी जाहिर होती है।

लाख टके का सवाल है कि क्या यह सब कांग्रेस, सोनिया गांधी, राहुल गांधी को समझ आया?दिल्ली में कांग्रेस का सफाया हुआ तो इसलिए क्योंकि मोदी-शाह का घोर विरोधी मुसलमान सौ टका हनुमानभक्त केजरीवाल का छाता पकड कर बैठ गया। प्रशांत किशोर ने 2017 में उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी का ठेका लिया था। याद करें उस वक्त को। राहुल गांधी का पहली बार कोई प्रोजेक्शन बना। खाट यात्रा, किसान की बात के साथ में राहुल गांधी की पोजिटिव इमेज बनने लगी। पर खुद राहुल, सोनिया गांधी और कांग्रेस के मठाधीश तैयार नहीं हुए कि यूपी में कांग्रेस ब्राह्यणों को ज्यादा टिकट दे। प्रियंका से प्रचार कराएं और राहुल अपने आपको हिंदू चेहरा, शिव भक्त चेहरा बनाए।

लेकिन किंतु, परंतु, और मुसलमानों के बिदकने जैसी चिंताओं में राहुल गांधी, सोनिया गांधी और कांग्रेस नेताओं ने आधी-अधूरी कोशिश की और नतीजा खराब निकला तो प्रशांत किशोर की छुट्टी और चर्चा चल पड़ी कि वह तो नरेंद्र मोदी के एजेंट! हिसाब से चार साल बाद आज सोचा जाए तो यूपी चुनाव से पहले जिस कायदे से राहुल गांधी की इमेज का अभियान चला वैसा न पहले कभी हुआ और न बाद में। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद तो राहुल गांधी, कांग्रेस इस कदर भटके हंै कि केजरीवाल की जीत से अपनी जीत मान रहे है। ठीक बात है कि मोदी-शाह का हारना कांग्रेस की पहली जरूरत है। और उसमें वह क्षेत्रिय पार्टियों को आगे कर उनसे भाजपा को पछाड़े तो 2024 या 2029 केलोकसभा चुनाव में भी वह सुरक्षित रहेगी। आखिर कोई क्षेत्रिय पार्टी, कभी लोकसभा की 70 सीटे नहीं जीत सकती। जबकि कांग्रेस 70-100 सीट जीत भी सकती है और फिर गैर-भाजपा सरकार बनाने की धुरी भी बनेगी।

बावजूद इसके कांग्रेस को या राहुल गांधी को केजरीवाल के हनुमान भक्त की तरह शिव भक्त बन बतौर शिवभक्त वह तो ब्रांडिग करनी होगी जिससे उत्तरप्रदेश, कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना, गुजरात आदि में मुसलमान भी शिव भक्त गांधी का छाता पकड़ माने कि राहुल गांधी को जीताया तो वे नरेंद्र मोदी, अमित शाह के अलावा किसी दूसरे को प्रधानमंत्री बनवा देंगे। मगर कांग्रेस की अंदरूनी खबर है कि राहुल गांधी अपने को पहले मुस्लिम -दलित हितगामी बना कर उत्तरप्रदेश, बिहार पर फोकस बनाने वाले है। कांग्रेस में कोई समझने को तैयार नहीं है कि मुसलमान -दलित से अकेले उत्तर भारत में चुनाव नहीं जीता सकता है बल्कि कांग्रेस को पहले शिव भक्त हिंदू और ब्राह्यण-फॉरवर्ड पार्टी बनना होगा तब अपने आप आजम खान और भीम सेना के चंद्रशेखर उनका जयकारा करते हुए मिलेंगे।

इसलिए कांग्रेस को अपनी मुफ्त की सलाह है कि वह प्रशांत किशोर और अरविंद केजरीवाल को पटाएं और जाने कि कैसे शिवभक्त राहुल की ब्रांडिग हो।

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