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पुराने समीकरण की फिराक में कांग्रेस 

कांग्रेस फिर अपना पुराना समीकरण बनाने की कोशिश में है। पुराना समीकरण मतलब वह फार्मूला, जो इंदिरा गांधी के समय बना था और जिस फार्मूले पर कांग्रेस दशकों तक निर्बाध राज किया। ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम का फार्मूला! सवाल है कि क्या फिर से यह फार्मूला जिंदा हो सकता है? क्या इन तीनों के बीच अब कुछ बुनियादी मतभेद नहीं हो गए हैं, जिनकी वजह से इनका साथ आना मुश्किल है? क्या अलग-अलग राज्यों में इन वोटों के अलग दावेदार नहीं खड़े हो गए हैं, जिनसे पार पाना कांग्रेस के लिए मुश्किल है?

ये सारे सवाल कांग्रेस नेताओं को समझ में आ रहे हैं। पर केंद्र की सत्ता से बाहर होने और उसके बाद लगातार राज्यों में हारती जा रही कांग्रेस अपने को बचाने के अंतिम प्रयास में लगी है। उसका अंतिम मुकाम ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम फार्मूले का है। गुजरात में अपने आप या किसी डिजाइन के तहत यह फार्मूला बना, जिसका कुछ लाभ कांग्रेस को मिला। 

राहुल गांधी ने गुजरात का शायद ही कोई मंदिर छोड़ा जहां वे नहीं गए। हर मंदिर में माथा टेका, पूजा अर्चना की, आरती में हिस्सा लिया यहां तक की मंडली में बैठ कर कीर्तन की। उनके पूर्वजों को यह सब करने की जरूरत नहीं पड़ती थी क्योंकि तब इन तीन समुदायों पर कांग्रेस का एकाधिकार होता था। अब चूंकि यह एकाधिकार टूटा है। अटल बिहारी वाजपेयी के समय से ब्राह्मणों ने भाजपा का रुख किया तो मुस्लिमों ने मुलायम सिंह, लालू प्रसाद में अपने मसीहा खोज लिया। दलितों की नेता मायावती हो गई। और इस तरह तीनों वोट कांग्रेस के हाथ से निकल गए। दक्षिण और पश्चिम के कुछ राज्यों में हालांकि कांग्रेस दूसरे समीकरणों से काम चलाती रही, पर देश का मध्य और उत्तरी हिस्सा पूरी तरह से उसके हाथ से निकल गया। 

अब फिर कांग्रेस इस फार्मूले को जिंदा कर रही है। तभी राहुल गांधी को जनेऊधारी हिंदू बताया गया। दिल्ली में पार्टी कार्यालय से लेकर सोशल मीडिया तक में राहुल को पंडित राहुल गांधी लिखने का चलन शुरू हुआ। इंदिरा और राजीव गांधी का जयगान भी शुरू किया गया। भाजपा जिस तरह से ब्राह्मण नेताओं की अनदेखी कर रही है, उससे भी कांग्रेस को यह मौका मिला है। भाजपा के शीर्ष पर पिछड़ा नेतृत्व है और पूरे उत्तर व मध्य भारत में उसने ठाकुर या पिछड़ा मुख्यमंत्री बनाया है। सो, कांग्रेस को उम्मीद है कि उसका ब्राह्मण वोट वापस उसके पास आ सकता है। 

दूसरा प्रयास दलित वोट के लिए हुआ है। देश के चार कोनों पर अलग अलग घटनाओं के जरिए इस फार्मूले को आजमाया गया है। हैदराबाद में रोहित वेमुला की खुदकुशी की घटना हो या उत्तर प्रदेश के सहारनपुर की और गुजरात के उना की घटना हो या महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव की, हर जगह दलित उभार की प्रतिनिधि घटनाओं को कांग्रेस ने राजनीतिक रूप देकर उसका फायदा लेने का प्रयास किया। गुजरात में उसको इसका फायदा मिला। दलित नेता जिग्नेश मेवाणी को कांग्रेस ने समर्थन दिया और बदले में मेवाणी ने दलितों के बीच कांग्रेस का प्रचार किया। महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक मेवाणी अब यह काम कांग्रेस के लिए कर रहे हैं।

इस फार्मूले का तीसरा पहलू मुस्लिम वोट का है। गुजरात में कांग्रेस ने इसे हासिल करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया क्योंकि उसे पता था कि मुसलमानों के पास कोई विकल्प नहीं है। वे झक्ख मार कर कांग्रेस को वोट देंगे। पर देश के दूसरे हिस्सों में यह स्थिति नहीं है। बिहार में लालू प्रसाद और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह मुस्लिम वोट के दावेदार हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और लेफ्ट दोनों मुस्लिम वोटों के दावेदार हैं। तभी कांग्रेस ने तीन तलाक के मसले पर पलटी मारी। लोकसभा में इसे पास होने दिया तो राज्यसभा में अड़ंगा डाल कर इसे रूकवा दिया। कांग्रेस ने यह मैसेज दिया कि मुसलमानों की सबसे बड़ी हितैषी वहीं है। 

यह सही है कि ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम तीनों में कुछ बुनियादी विरोधाभास हैं। हिंदूत्व की बात होने पर ब्राह्मण पूरी तरह से मुस्लिम के विरोध में खड़े होंगे। और दलित, ब्राह्मण की एकता बनाना भी आसान नहीं है। जैसा कि मेवाणी ने ऐलान किया है कि वे नौ जनवरी को रैली करेंगे और संविधान व मनुस्मृति दोनों लेकर प्रधानमंत्री से मिलने जाएंगे और पूछेंगे कि उनको कौन सा कबूल है। पर इन विरोधाभासों के बाद यह भी एक सचाई उभरी है कि देश में जहां भी दलित आंदोलन हो रहा है वहां मुसलमान उनके साथ खड़े हो रहे हैं। उमर खालिद हैदराबाद के रोहित वेमुला मामले में भी खड़ा था तो जिग्नेश के साथ भी खड़ा है। शुक्रवार को दिल्ली प्रेस क्लब में मेवाणी की प्रेस कांफ्रेंस में भी दोनों साथ थे। सो, पहले की तरह मजबूत नहीं तो कामचलाऊ फार्मूला फिर भी कांग्रेस का बन सकता है। 

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