हम हैं सदी के सकंट में!

पहले विचार था कांग्रेस, ज्योतिरादित्य, भाजपा, मध्यप्रदेश याकि राजनीति पर गपशप का! लेकिन भूल जाना चाहिए राजनीति। फिजूल है भारत की राजनीति और भारत की सत्ता पर इस समय सोचना। समय कोरोना वायरस- कोविड-19 का है। आज यह खतरा भयावह है कि  कोरोना वायरस कही भारत की दशा-दिशा, भारत की मोदी सरकार, भारत की राजनीति को कुछ ऐसा न खा जाए कि आने वाली पीढियां सोचते हुए कंपकंपाए। भारत और भारत के हम लोग सदी के सबसे भयावह संकट में प्रवेश करने वाले हैं। सदी का क्या अर्थ है? तो अपनी थीसिस है कि सन् 1950 (याकि दूसरे विश्व युद्ध के बाद) से सन् 2050 के वक्त को, भूमंडलीकरण में दुनिया के एक गांव में बदलने के वक्त पर यदि बतौर सदी विचार करें तो इन सौ वर्षों का सर्वाधिक गंभीर संकट सचमुच कोरोना वायरस- कोविड-19 बन सकता है।

उस नाते 1947 से 2047 के आजाद भारत के सौ साल के बीच का सर्वाधिक गंभीर समय फिलहाल है। दुनिया के बाकि देश याकि चीन, अमेरिका, इटली, फ्रांस, जर्मनी, योरोपीय संघ, ब्रिटेन, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया आदि देशों की आर्थिकी, उनका स्वास्थ्य सेवा ढांचा, प्रशासन सब कोरोना वायरस से लड़ने की ताकत लिए हुए हैं जबकि इन सबके मुकाबले भारत आर्थिकी तौर चरमराया हुआ है, सामाजिक तौर पर बिखरा हुआ है और राजनैतिक तौर पर विग्रह व टकराव का मारा है। क्या नहीं?

तभी लंदन की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘द इकोनोमिस्ट’ के संपादकीय की इन लाईनों पर गौर करना चाहिए- डब्ल्यूएचओ द्वारा घोषित महामारी तेजी से फैल रही है। एपिडिमियोलोजिस्ट का मानना है कि इटली कोई स्पेन, फ्रांस, अमेरिका और ब्रिटेन सेएक-दो सप्ताह आगे है। कम कनेक्टेड देश जैसे मिस्र और भारत कुछ और पीछे है मगर ज्यादा भी नहीं।

यह लाईन आने वाले संकट का संकेत है। आज याकि शुक्रवार को इटली में कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा 1,016 है। 24 घंटे में आंकड़े में 23 प्रतिशत की बढ़ोतरी। वहां कुल मरीज 12,462 से बढ़ कर 15,113 हो गए है। मतलब छह करोड़ लोगों को ‘इटलीबंद’ में रखने के चार दिन बाद भी वायरस दम तोड़ने के बजाय लोगों को ज्यादा शिकार बना रहा है। दूसरी तरफ इटली से पीछे चल रहे जर्मनी, फ्रांस, स्पेन में वायरस मरीजों की संख्या दो-दो हजार से ऊपर चल रही है। ये देश इटली जैसी दशा प्राप्त होने की संभावनाएं लिए हुए हंै। फिलहाल योरोप 26,581 कोरोना मरीज व 1,152 मौत का आंकड़ा लिए हुए है।

सीधा अर्थ है कि वायरस जहां पहुंचा है वहा फैलता जरूर है। चीन, दक्षिण कोरिया, इटली में क्षेत्र विशेष में ज्योंहि वायरस पकड़ा गया उस इलाके को बंद कर लोगों को थौक में क्वॉरंटीन याकि छूतरहित ( हिंदी में क्वॉरंटीन का अर्थ संगरोधन बना हुआ है उससे बेहतर छूतरहित या वायरसरहित शब्द इस्तेमाल करना चाहिए) बना लोगों को वायरस से निजात दिलाई गई।  मगर ईरान में वह चौतरफा फैला है तो अमेरिका और भारत में भी चौतरफा वायरस पहुंच चुका है। भारत में केरल से लेकर कर्नाटक, महाराष्ट्र, दिल्ली, जयपुर, उत्तरप्रदेश सब तरफ कोरोना पीड़ित मरीज मिले हैं तभी यह सोचना चाहिए कि जब वायरस पसरेगा-फैलेगा तो भारत का कितना बड़ा इलाका और कितनी आबादी को वह घेरे हुए होगा?

हकीकत है कि चीन, दक्षिण कोरिया और उत्तरी इटली ने तानाशाही अंदाज में और वैश्विक प्रतिष्ठा वाली चिकित्सा व्यवस्था से वायरस पर दबिश बनाई। क्या भारत वैसा प्रबंधन लिए हुए है? कतई नहीं। तभी मैं खतरा बूझ रहा हूं कि कही यह वायरस आजाद भारत की पहली सदी के सर्वाधिक विकट संकट का कारक न बन जाए?

इसलिए वक्त न राजनीति का है, न आर्थिकी का है और न हिंदू बनाम मुस्लिम याकि सीएएस, एनपीए या एनआरसी का है। इस बात को नोट रखंे कि बाकि तमाम देश अपने खजाने में, अपने केंद्रीय बैंक में आपदा-विपदा से मुकाबले के लिए पैसा लिए हुए है। सभी की आर्थिकी मजबूत है, उनकी कंपनियां और बैंक मुनाफे में हंै, रिर्जव लिए हुए हंै, बिना ब्याज के पैसा बांट सकते हैं या खरबों डालर उड़ेल कर ठप्प काम-धंधे के बीच अपने उद्योगों को व लोगों को पैसा बांट सकते हैं जबकि भारत की सरकार, भारत की कंपनियों और बैंकों के क्या हाल है यह 2016 की नोटबंदी के बाद से वैश्विक पैमाने पर जगजाहिर है।उस नाते कोरोना वायरस अपने आपमें बड़ा संकट है तो उतना ही बड़ा संकट भारत की दशा, भारत की आर्थिकी और भारत के लोगों की बीमारी से लड़ सकने के इम्यून सिस्टम का भी है। कैसे वायरस को समय रहते मारा जा सकेगा?

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