कोरोना महामारी और मिथक

कोरोना वायरस का संक्रमण अबूझ पहेली बनता जा रहा है। यह कैसे शुरू हुआ, कहां से आया, कौन जिम्मेदार है, कैसे फैलता है, कैसे रोका जा सकता है और कैसे खत्म किया जा सकता है इन सबको लेकर तरह तरह के मिथक फैले हैं। इसके बारे में एक मिथक टूटता है और दूसरा पैदा हो जाता है। जैसे भारत में इटली के दो मरीज ठीक हो गए तो यह मिथक फैला कि एचआईवी की दवा से इसका इलाज हो रहा है। पर एक हफ्ते के भीतर ही यह मिथक टूट गया। चीन में, जहां इसकी शुरुआत हुई थी वहां इस पर व्यापक शोध हुआ, जिसके बाद चीन ने पूरे दावे के साथ कहा कि एचआईवी की दवा से कोरोना वायरस का संक्रमण ठीक नहीं हो रहा है। सो, दुनिया फिर उसी चौराहे पर है कि यह कैसे ठीक होता है।

दुनिया के अनुभव से यह पता चला कि उम्रदराज लोगों पर यह ज्यादा असर कर रहा है। इस बीच 103 साल की एक महिला और 85 साल का एक संक्रमित व्यक्ति ठीक हो गया। अब उनका अध्ययन किया जा रहा है कि वे कैसे ठीक हुए। असल में उम्र से ज्यादा यह अहम है कि किसी व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता कैसी है। अगर शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता मजबूत है तो कोरोना वायरस क्या कोई भी बीमारी बहुत ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा सकती है। तभी रोग प्रतिरोधकर क्षमता को लेकर तरह तरह के प्रचार शुरू हो गए।

भारत में इस बीमारी का प्रसार कम है तो कहा जाने लगा कि यहां का खान-पान ऐसा है, जिसकी वजह से यहां के लोगों के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत है और इसी वजह से कोरोना वायरस नहीं फैल रहा है। खान-पान में क्या है, तो हम लहसुन, अदरख, हल्दी जैसी चीजें खाने में इस्तेमाल करते हैं, जिनमें बड़ा औषधीय गुण होता है। पर क्या दूसरे देश के लोग यह सब नहीं खाते हैं? हकीकत यह है कि चीन के सभी शाकाहारी और मांसाहारी खाने का सबसे मुख्य तत्व लहसुन और अदरख होते हैं। वहां बहुत ज्यादा मात्रा में इन दोनों का इस्तेमाल होता है। फिर भी यह बीमारी वहां सबसे पहले फैली और सबसे ज्यादा समय तक लोग मरते रहे। अब जाकर चीन ने इस पर काबू किया है। सो, खान-पान ठीक है पर कोई ऐसी चीज उसमें नहीं पहचानी गई है, जिससे इसका संक्रमण रूकता हो।

भारत में पहले दिन यह मिथक स्थापित किया गया कि गर्म पानी पीने से इसका संक्रमण ठीक होता है। यह भी कहा गया कि गर्म पानी से गरारे करने से वायरस मर जाता है। कुछ लोगों ने यह भी कहा कि हर दिन थोड़ा समय धूप में बिताने से भी यह बीमारी ठीक होती है। देश के स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबै ने यह बात बड़े अधिकारपूर्ण ढंग से पत्रकारों से कही कि 15 मिनट हर दिन धूप में बैठने से इसका वायरस मर जाता है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से हर दिन डॉक्टरेट की डिग्री हासिल कर रहे लोगों ने यह भी कहा कि जैसे तापमान बढ़ेगा वैसे ही यह वायरस मरने लगेगा। हकीकत यह है कि गर्म पानी पीना सेहत के लिए अच्छा होता है पर उससे यह वायरस नहीं मरता है। धूप सेंकना भी सेहत के लिए अच्छा है पर उससे भी कोरोना वायरस का अंत नहीं होता है। और न तापमान बढ़ने पर इसका अंत होता है। दुनिया के कई बेहद गर्म देशों में इसका कहर जारी है।

मास्क पहनने का मिथक अपनी जगह है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से लेकर अनेक स्वास्थ्य संगठनों ने लोगों से कहा कि स्वस्थ लोग मास्क नहीं पहनें, जो बीमार हैं या जो स्वास्थ्य सेवा में लगे हैं उनको मास्क पहनना चाहिए। यह भी बताया गया कि यह वायरस हवा से नहीं फैलता है, बल्कि किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से या उसकी इस्तेमाल की हुई किसी चीज को छूने से फैल सकता है और इसलिए कहा गया है कि मास्क न पहनें क्योंकि संभव है कि आप अपने संक्रमित हाथों से बार-बार मास्क छुएं और आपको उससे संक्रमण लग गए। पर लोग जबदस्ती मास्क पहन कर घूमते रहे और नतीजा यह हुआ कि मास्क की कमी हो गई, इसकी कालाबाजारी शुरू हो गई।

फिर चीन में एक अध्ययन के आधार पर यह आंकड़ा आया कि जिन लोगों का ब्लड ग्रुप ए है उनको इस बीमारी का ज्यादा खतरा है। पर यह आंकड़ा भी अलग अलग अलग देश में अलग ही होगा क्योंकि आनुवंशिकी और कुछ जलवायु की वजह से अलग अलग इलाकों में लोगों के ब्लड ग्रुप अलग होते हैं। जैसे भारत में आधे से कुछ कम लोगों का ब्लड ग्रुप बी पॉजिटिव है और अमेरिका में सबसे ज्यादा लोगों का ए और ओ है। लेकिन चीन के अध्ययन के आधार पर यह पैनिक हो गया कि ए ब्लड ग्रुप वालों को सावधान रहना चाहिए।

असल में भय उसी चीज से होता है, जिसके बारे में हम नहीं जानते हैं। और चूंकि अभी तक कोरोना वायरस के बारे में जानकारी कम है इसलिए इसका भय ज्यादा है। जैसे जैसे जानकारी बढ़ेगी और मिथकों का प्रचार घटेगा वैसे वैसे हालात ठीक होंगे। हां, एक प्रचार यह भी हुआ कि देश में पूरी तरह से लॉकडाउन होने वाला है या राशन की कमी पड़ने वाली है। तभी राजधानी दिल्ली सहित पूरे देश में लोग दुकानों, मॉल, शॉपिंग कांप्लेक्स में कतार लगा कर खड़े हो गए। यह स्थिति अमेरिका के कई सुपरस्टोर में भी देखने को मिली, जहां लोग कई कई महीनों का राशन खरीद कर इकट्ठा करने लगे। भारत में प्रधानमंत्री को अपील करनी पड़ी कि जरूरी चीजों की कमी नहीं होने दी जाएगी।

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