सब छोड़ो, कोरोना टेस्ट कराओ!

पता नहीं कैसे हुआ, क्यों हुआ, किसकी सलाह पर हुआ लेकिन यदि भारत कोरोना वायरस के संक्रमण में तीसरे-चौथे चरण में पहुंचा तो नंबर एक जिम्मेवार कारण टेस्ट के मामले में ऊंट के मुंह में जीरा वाली एप्रोच का होगा। 130 करोड की आबादी व फरवरी से विदेश से भारत लौटने वाले भारतीयो व विदेशियों की आवाजाही की हकीकत में यह फैसला बहुत पहले होना था कि संदिग्धों को बूझने के लिए प्रति दस लाख लोगों के पीछे कितने सौ या हजार लोगों का टेस्ट कराया जाए। कोरोना पर फटाफट उन्ही देशों (जैसे दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, हांगकांग, तुर्की) ने काबू पाया है जिसने अधिकाधिक टेस्ट कर वायरस प्रभावित इलाकों को चिंहित करके वहा कोरोन्टाइन प्रबंध किए। एक रपट के अनुसार भारत में 18 मार्च तक प्रतिदिन सिर्फ 90 टेस्ट हुए जबकि आठ हजार टेस्ट प्रतिदिन कर सकने की क्षमता थी। बावजूद 90 लोगो की ही टेस्टींग का क्या मतलब है, इसे किसी तरह नहीं समझा जा सकता है।

दरअसल हम इस तरह की बातों के विश्वास में रहे कि इंडियन कॉउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च ने आईसीयू में भर्ती श्वास रोग के मरीजों में 500 रेंडम टेस्ट किए और कोरोना वायरस का पोजिटिव केस नहीं मिला। दरअसल हुआ यह कि भारत का मार्च में भी पूरा फोकस वायरस प्रभावित देशों से आए लोगों की यात्रा हिस्ट्री को जानने पर लगा रहा। शायद एक वजह टेस्ट किट की कमी का भी रहा होगा। केंद्र सरकार ने बहुत बाद में जर्मनी से दस लाख टेस्ट किट आयात का आर्डर दिया। भारत में मार्च के पहले सप्ताह में केरल और महाराष्ट्र में कोरोना पोजिटिव के केस मालूम हो गए थे। उस नाते इनके क्षेत्र विशेष के पॉकेट में टेस्टिंग बड़ी संख्या में करवा कर फैलाव बूझा जाना चाहिए था। कही भी केस है तो अगल-बगल, पड़ोस में टेस्टिंग करके ही वायरस के फैलाव को जाना जा सकता है। तभी पिछले कई दिनो से विश्व स्वास्थ्य संगठन की सभी देशों को एक ही मुख्य सलाह है – ‘test, test, test, test.'”

वैश्विक डाटा के अनुसार बहरीन, दक्षिण कोरिया, हांगकांग, इटली, स्वीट्जरलैंड जैसे देशों में 9 मार्च तक प्रतिदस लाख की आबादी के पीछे 558 से ले कर 4,910 की संख्या में लोगों के टेस्ट हुए। सो वायरस को महामारी नहीं बनने देने में पहला काम टेस्ट का है। फिर जो कोरोना का संदिग्ध मिले उसके अगल-बगल के संपर्क को ट्रेस करने का होता है।

अपना मानना है कि हम भारतीय मिथक में जीते हंै। जैसे सरकार को समझ नहीं आया कि बिना टेस्ट के 130 करोड़ लोगों की दशा-दिशा का कैसे अनुमान लगाया जा सकेगा वैसे जनता, सिविल सोसायटी, संसद में भी इस नैरेटिव, बहस, दबाव की जरूरत नहीं बनी कि हर जिले, हर तहसील में टेस्ट और प्रति दस लाख आबादी के पीछे कम से कम पांच सौ टेस्ट का नेटवर्क-प्रबंध तो बने। इसकी बजाय सब इस भरोसे में है कि गर्मी शुरू होते ही वायरस मर जाएगा। शाकाहारी भारत में चीनी वायरस नहीं फैलेगा और गौमूत्र या गाय या देशी ईलाज से हम वायरस पर काबू पा लेंगे!

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