भला ऐसे वोट कब मांगे गए?

दिल्ली चुनाव का प्रचार एक नई गिरावट का प्रतीक है। चुनाव ऐसे लड़ा जा रहा है, जैसे यह युद्ध हो, जिसमें एक तरफ एक खास पहचान वाले लोग हैं तो दूसरी ओर दूसरी पहचान वाले। एक तरफ देशभक्त हैं तो दूसरी ओर देशद्रोही। एक पार्टी कहे कि जो हमारी तरफ हैं वे देशभक्त हैं और जो हमारे विरोधी हैं, वे पाकिस्तान से मिले हुए हैं। भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी आमने सामने चुनाव लड़ रही हैं, इन दोनों का एजेंडा कुछ और ही दिख रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस है, जो मुख्य मुकाबले से बाहर है, पर उसी ने रोजगार और विकास, पर्यावरण, हरित क्षेत्र आदि की बात की है। पर उसकी बातों का कोई मतलब नहीं है क्योंकि वह मुकाबले में नहीं है।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी को अपनी सत्ता बचानी है इसलिए उसके लिए जरूरी है कि मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा जो बातें कह रही है उसका जवाब दे। यह जवाब देने के चक्कर में ही आम आदमी पार्टी ने अपने चुनाव घोषणापत्र में यह बात शामिल कर ली है कि वह स्कूलों में देशभक्ति का पाठ पढ़ाएगी। सोचें, क्या किसी को इस देश के बच्चों और दूसरे लोगों की देशभक्ति पर संदेह है? क्या अपने देश, इसके लोगों, यहां की हवा, पानी, नदियों, पहाड़ों के बारे में स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाता है? क्या देश के महापुरुषों के बारे में पहले से नहीं पढ़ाया जा रहा है, जो अलग से देशभक्ति पढ़ाई जाएगी? यह कितनी बेहूदा बात है कि भाजपा के नेता आप नेताओं की देशभक्ति पर सवाल उठा रहे हैं तो वह पार्टी अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए घोषणापत्र में कहे कि देशभक्ति को पाठ्यक्रम में साबित करेंगे! चुनाव लड़ा जा रहा है या जंग लड़ी जा रही है, जो देशभक्ति की परीक्षा देनी है।

यह भी कम दुखद नहीं है कि एक मुख्यमंत्री को यह साबित करने के लिए कि वह हिंदू विरोधी नहीं है, मंच से हनुमान चालीसा का पाठ करना पड़े। इसके बाद भगवा पहनने वाला एक मुख्यमंत्री कहे कि अभी तो अमुक जी ने हनुमान चालीसा पढ़ी है आगे तो तमुक भी हनुमान चालीसा पढ़ेंगे। सोचें, ऐसे ही कोई मुस्लिम नेता मंच से कुरान का पाठ करे तो प्रचार का क्या रुप हो जाएगा? बहरहाल, क्या चुनाव हनुमान चालीसा, रामायाण, महाभारत और गीता के पाठ से लड़ा जाएगा? इन सबका पाठ हर व्यक्ति का नितांत निजी मामला है। पर धीरे धीरे हर चुनाव को यह रूप दिया जा रहा है कि नेता को अपनी धार्मिकता और अपनी देशभक्ति दोनों साबित करनी पड़े। और देशभक्ति का पैमाना क्या है- शाहीन बाग! तभी खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह चुनाव बालाकोट एयर स्ट्राइक का समर्थन करने वालों और शाहीन बाग के साथ खड़े लोगों के बीच है। क्या यह स्पष्ट रूप से देश और समाज को दो खेमों में बांटने वाली बात नहीं है? क्या जिसने बालाकोट एयर स्ट्राइक का समर्थन किया था वह शाहीन बाग का समर्थक नहीं हो सकता है? आखिर कैसे यह सोच बनी कि बालाकोट और शाहीन बाग के समर्थक अलग अलग हैं? एक बार जब प्रधानमंत्री के स्तर से यह धारणा बना दी गई तो फिर हर नेता ने चुनाव को भारत-पाकिस्तान बनाना शुरू कर दिया।

वैसे पहले ही भाजपा के एक प्रत्याशी कपिल मिश्रा ने अपने प्रचार में कहा कि आठ फरवरी को दिल्ली में भारत और पाकिस्तान का मुकाबला होगा। चुनाव आयोग ने इसके लिए उनके ऊपर 48 घंटे तक प्रचार नहीं करने की पाबंदी लगाई। पाबंदी के बाद प्रचार में उतरे कपिल मिश्रा ने अपने बयान पर कोई खेद नहीं जताया। इसके बाद भाजपा के सांसद प्रवेश वर्मा ने प्रचार में दो बातें कहीं। उन्होंने पहले कहा कि भाजपा की सरकार बनी तो सरकारी जमीनों पर बनी सारी मस्जिदें तोड़ी जाएंगी। सोचें, चुनाव लड़ा जा रहा है या धर्मयुद्ध है, जिसमें दूसरे धर्म के पूजा स्थलों को तोड़ने के नाम पर वोट मांगे जाएंगे! जो सत्ता में होगा वह अपने से दूसरे धर्म वालों के धर्मस्थल तोड़ेगा तो फिर मुस्लिम शासकों के सैकड़ों साल पुराने कृत्यों को भी क्या इस आधार पर न्यायसंगत ठहराया जा सकता है कि वे लोग शासक थे!

एक केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने अपनी चुनावी सभा में आपत्तिजनक नारे लगवाए। उन्होंने आधा नारा लगाया कि ‘देश के गद्दारों को’ फिर बाकी जनता ने पूरा किया ‘गोली मारों सा… को’! जिस समय यह नारा लगाया गया उस समय एक दूसरे केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह भी मंच पर थे। अनुराग ठाकुर ने लोगों से यह भी कहा कि इतनी जोर से नारा लगाएं कि गिरिराज सिंह को सुनाई दे। ध्यान रहे यह नारा दिल्ली के चुनाव में भाजपा के प्रचार की थीम बन गया है। कपिल मिश्रा ने भी यह नारा लगाते हुए जुलूस निकाला था और दूसरे कई नेता यह नारा लगाते रहे हैं। सोचें, गद्दार कौन है? इस देश के किस नागरिक को गद्दार कहा जा रहा है और उसे गद्दार बताने का फैसला किस आधार पर, किसने किया है? क्या यह अपने ही देश के नागरिकों को गद्दार और देशभक्त बता कर वोट मांगने का विभाजनकारी तरीका नहीं है? भाजपा के नेता प्रचार में बार बार कह रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल और राहुल गांधी की बातें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की बातों जैसी होती हैं। कुल मिला कर चुनाव को भारत-पाकिस्तान की लड़ाई, गद्दार बनाम देशभक्त, वे बनाम हम का रूप दिया जा रहा है और गृह युद्ध की तरह लड़ा जा रहा है। पिछले कई चुनावों के बाद क्रमशः दिल्ली का चुनाव इस मुकाम तक पहुंचा है।

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