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कुछ राज्यों में समय से पहले चुनाव

हरि शंकर व्यास

एक तरफ कांग्रेस लोकसभा के साथ कम से कम राज्यों के चुनाव कराने के पक्ष में है तो दूसरी ओर भाजपा चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा राज्यों के चुनाव लोकसभा के साथ हो जाएं। तभी यह माना जा रहा है कि अगले साल लोकसभा के साथ कम से कम चार ऐसे राज्यों के चुनाव होंगे, जिनकी विधानसभा का कार्यकाल पूरा नहीं हुआ होगा। महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा और बिहार के चुनाव लोकसभा के साथ हो सकते हैं। 

अगले साल अप्रैल-मई में लोकसभा के साथ ओड़िशा, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के चुनाव होने हैं। इनका चुनाव तय समय पर होगा। इन तीनों राज्यों में गैर भाजपा पार्टियों का शासन है और कांग्रेस अपनी पैठ बढ़ाने के लिए जीतोड़ मेहनत कर रही है। भाजपा के नेता मान रहे हैं कि इस बार लोकसभा के साथ चुनाव होने का फायदा भाजपा को होगा। पर बाकी जिन चार राज्यों के चुनाव की चर्चा है उनमें से तीन में भाजपा की सरकार है और चौथे राज्य बिहार में भाजपा अपनी सहयोगी जदयू के साथ सरकार में है। बिहार विधानसभा का कार्यकाल दिसंबर 2020 में पूरा होगा, जबकि बाकी तीनों राज्यों महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड का कार्यकाल इसी साल अक्टूबर से दिसंबर के बीच है। 

भाजपा के जानकार सूत्रों के मुताबिक पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को फीडबैक है कि राज्यों में मुख्यमंत्रियों के चेहरे पर चुनाव जीतना मुश्किल होगा। वैसे भी भाजपा के अपने शासन वाले राज्यों में उसका चुनावी रिकार्ड़ बहुत अच्छा नहीं है। गुजरात में भाजपा जैसे तैसे जीत पाई थी और गोवा में हार गई थी। इसलिए वह अपने शासन वाले राज्यों में अकेले चुनाव नहीं चाहती है। दूसरे, पार्टी के अंदर यह सोच है कि इन राज्यों में विपक्ष के पास नेता है, जो भाजपा के मुख्यमंत्रियों को टक्कर दे सकता है। इन तीनों राज्यों में विपक्ष बहुत मजबूत है और उसका गठबंधन भी बहुत मजबूत है।

महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी ने बसपा और स्वाभिमानी पक्ष के साथ तालमेल किया है। दूसरी और भाजपा का शिव सेना के साथ तालमेल टूटने की स्थिति में है। इसी तरह झारखंड में जेएमएम, कांग्रेस, राजद और जेवीएम के तालमेल पर सहमति बन रही है। हरियाणा में भी कांग्रेस के पास भूपेंद्र सिंह हुड्डा का मजबूत नेतृत्व है। इनके मुकाबले भाजपा के नेता कमजोर पड़ रहे हैं। पिछली बार इन तीनों राज्यों में मोदी लहर का असर रहा था। सो, इस बार भी भाजपा मोदी लहर पर ही लड़ना चाहती है। 

बिहार विधानसभा का कार्यकाल 2020 के आखिर तक है। पर कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समय से पहले चुनाव चाहते हैं। उनको अंदेशा है कि लोकसभा चुनाव में अगर भाजपा जीत गई तो विधानसभा में उनके साथ धोखा हो सकता है। तभी वे सीटों का बंटवारा एक साथ ही चाहते हैं। कहा जा रहा है कि वे लोकसभा और विधानसभा सीटों पर एक साथ फैसला इसलिए चाहते हैं ताकि उनको अगर लोकसभा की कम सीट मिले तो उसकी भरपाई विधानसभा सीटों से हो सके। इसलिए बिहार के बारे में यह संभावन जताई जा रही है कि अगले साल ही चुनाव हो जाएगा। अगर लोकसभा में बराबर सीटों का बंटवारा हुआ तो वहां चुनाव समय पर होंगे।

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