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घटनाक्रम बेकाबू, वक्त खराब

हरि शंकर व्यास

क्या गुजरात में टफ मुकाबले की नरेंद्र मोदी, अमित शाह ने कल्पना की थी? क्या नीरव मोदी एंड पार्टी की अरबों की लूट के स्केंडल के खुलने की मोदी- शाह ने कल्पना की हुई थी? क्या गोरखपुर- फूलपुर में उपचुनाव हारने की मोदी-शाह को कल्पना भी थी? क्या मोदी-शाह ने चौबीस घंटे राजनीति में खंपे रहने के बीच कभी यह ख्याल बनाया कि बिना शौर वाले भारत बंद में दलित गुस्सा ऐसे फूटेगा कि फारवर्ड बनाम दलित का मनौविज्ञान घर-घर वापिस ताजा हो जाएगा? क्या मोदी-शाह ने कठुआ- उन्नाव गैंर रेप पर हुए राष्ट्रीय हल्ले की कल्पना की होगी? क्या नरेंद्र मोदी ने सपने में भी सोचा होगा कि उनके स्वागत के बजाय तमिलनाड़ु काले झंडे लिए होगा और कार्यक्रम के आयोजन स्थल पर जाने लिए एयरपोर्ट से चोर रास्ते हेलिकॉप्टर के जरिए पहुंचना होगा?

जाहिर है नरेंद्र मोदी का वक्त खराब है। गुजरात चुनाव के बाद त्रिपुरा की एक जीत को छोड़ एक घटना ऐसी नहीं है जिससे नरेंद्र मोदी, उनकी सरकार और अमित शाह की वाहवाही हुई हो। यह संयोग भी अपनी जगह है जो अमित शाह की जुबान से येदियुरप्पा के लिए भ्रष्ट शब्द निकला या पूरे विपक्ष को कुत्ते, कुत्ती, बिल्ली, सांप, नेवले बताते हुए अपने अंहकार का चरम दिखला दिया। संसद का ठप्प होना, तेलगू देशम के चंद्रबाबू का कटुता के साथ एलायंस से बाहर निकलना और मीडिया को झूठा-फर्जी बता कर उसे और कसने का पैंतरा हो या विपक्ष के खिलाफ उपवास पर बैठने जैसी तमाम घटनाएं विनाश काले विपरित बुद्वी में हुए फैसले लगते है तो ग्रह-नक्षत्र खराब होने से घटनाओं के बेकाबू होने का प्रमाण भी।

अपनी पुरानी थीसिस है कि सरकारों का पतन एक पैटर्न लिए होता है। एक वक्त नरेंद्र मोदी उस पैटर्न को बदलते लगते थे। मतलब यह लगता था कि सियासी तौर पर मोदी-शाह ऐसी दूरदृष्टी वाले शातिर खिलाडी है कि उनके कलेंडर से घटनाएं बनेगी। घटनाओं से उनका कलेंडर नहीं बनेगा बल्कि वे अपने कलेंडर से घटनाओं को निकालते हुए लोगों को बांधे रखेगें। एक के बाद एक जुमले गढ़ कर विकास की एक के बाद एक झांकी बनाते हुए, मीडिया को कंट्रोल करते हुए मोदी अपना नैरेटिव लगातार बनाए रखेगें। मतलब संभव ही नहीं है जो अचानक हालात ऐसे बने कि सबकुछ अप्रत्याशित होता जाए। यानी नरेंद्र मोदी दिल्ली की सत्ता पर बैठ गए है तो गुजरात की तरह पंद्रह साल मजे से राजनीति करेंगे। न खराब वक्त आएगा और न अप्रत्याशित घटनाएं होगी और न बहस, हल्ला अनचाहे मसले लिए हुए होगा।

और जान ले नरेंद्र मोदी ने गुजरात के पैटर्न पर ही दिल्ली में पांच साल की घटनाओं का रोडमैप, नैरेटिव बना कर अपने को आगे बढ़ाया। अपना मानना है कि वह गडबडाया तो वजह नोटबंदी का मूर्खतापूर्ण फैसला था। नोटबंदी से अपने को समझ आया कि ये आए थे हिंदू मनोविश्व को झूमाते हुए और वैसे ही राज करेगें लेकिन हुआ उलटा और हिंदू को ही मारने लगे।। हिंदू को उल्लू बनाते हुए उसके लेन-देन, आर्थिक व्यवहार को सुधरवाने की तरफ नरेंद्र मोदी बढ़ गए। मतलब हिंदू कैसे पैसा बचाएं, कैसे पैसा खर्च करें और उसके लेन-देन को सुधारना है। उन्हे मतलब नहीं कि मदरसों को सुधारना है या धारा 370 को बदलना है या एक झटके में कॉमन सिविल कोड से सभी नागरिकों को एक सा बना देना है।

तभी न केवल आज रोडमैप, कलेंडर गडबडा गया है बल्कि गुजरात में ही लेने के देने पडे तो गौरखपुर, फूलपुर से लेकर अब वह सिलसिला चल पड़ा है जिसमें घटनाएं बेकाबू है तो राजनीति भी यह कयास बन गया है कि नरेंद्र मोदी 2019 में वापिस प्रधानमंत्री नहीं बनते। क्या नोटबंदी से पहले ऐसा सोचना भी मुमकिन था?

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