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जेटली बजट पूरा धोखा!

आजाद भारत के इतिहास में कभी किसी वित्त मंत्री ने जनता को इतना उल्लू नहीं बनाया जितना इस बार 2018-19 के बजट में किया। कितनी हैरानी वाली बात है कि एक लाख करोड़ रुपए या 60 हजार करोड़ रुपए जैसे खर्च की योजना की बात कर दुनिया की सबसे बडी हैल्थ प्रोटेक्ट स्कीम याकि मोदीकेयर की घोषणा हो और उसके लिए बजट में ऱखा जाए सिर्फ दो हजार करोड़ रुपए!

याद करें मनरेगा या किसानों की कर्ज माफी की मनमोहन सरकार की घोषणाओं को। तब 60 हजार या तीस हजार करोड़ रुपए का बजट में आबंटन हुआ था। मैं तब क्योंकि उसे अनुत्पादक खर्च मानता था तो हैरानी से तब उन आंकड़ों पर लिखा था कि सरकार इतना कितना लूटा दे रही है। मगर अब देखिए कि

और नाम मोदीकेयर है। आश्चर्य कि अगले दिन पता पड़ा कि यह मोदीकेयर तो प्रदेश सरकारों की साझेदारी में चलेगी! प्रदेश सरकारों को भी प्रीमियम राशि में पैसा देना होगा। सोचे मोदीकेयर के नाम की मार्केटिग तो क्या ममता बनर्जी, उनकी प्रदेश सरकार इसमें पैसा लगाएगी या केरल की लेफ्ट सरकार, कर्नाटक की कांग्रेस या तमिलनाडु की एआईएडीएम सरकार अपनी स्वास्थ्य बीमा योजनाओं को छोड़कर मोदीकेयर की वाहवाही बनवाएगे? और यदि ये प्रदेश इस योजना को नहीं मानते तो कैसे हुई दुनिया की अभी से सबसे बड़ी हैल्थकेयर योजना!     

बजट घोषणा के दिन लगा था कि केंद्र सरकार ने खुद बीड़ा उठाया है। देश के पचास करोड़ लोगों के लिए हर साल पांच लाख रुपए की कैशलेश चिकित्सा फ्री करने की दो टूक घोषणा है। इससे दस करोड़ परिवार साल में पांच लाख रुपए तक का ईलाज फ्री करा सकेंगे। गौर करें पांच लाख रुपए। यदि एक करोड़ परिवारों ने भी पहले साल लाइन में लग कर ईलाज करवाया तो पांच लाख रुपए के खर्च का हिसाब कितना बनेगा?  योजना और कैसलेश जुमला सुन अपना मानना था कि बीमा कंपनिया सरकार की तरफ से पैसा देने की सिर्फ एजेंट होगी। इसलिए कि कोई बीमा कंपनी पांच लाख रुपए तक के खर्च की सालाना सीमा में हजार, दो हजार या दस हजार के प्रीमियम पर भी पांच लाख रुपए की जोखिम नहीं ले सकती। अपना मानना है कि भारत में ईलाज का मसला ऐसा है कि हर कार्डधारी लाइन में लगेगा। यदि पचास करोड़ लोगों को मुफ्त ईलाज कराने का कार्ड मिला तो आने वाले साल में सब लोग अस्पतालों के आगे लाइन लगाएं इसलिए मिलेगे क्योंकि बीमारियां, मौसमी बीमारियां गरीब परिवारों की नियति है। सो बीमा कंपनियां कुछ हजार के प्रीमियम पर पांच लाख रुपए का ईलाज कराने की गारंटी नहीं लेगी। तभी अपनी सोच थी कि सरकार सीधे पूरे पेमेंट की गारंटी देते हुए बीमा कंपनियों का बतौर बिचौलिया इस्तेमाल करेगी। 

लेकिन अब पता पड़ा है कि प्रीमियम के जरिए दस करोड़ परिवारों का बीमा होगा। इसका मतलब प्राइवेट अस्पताल तब तक मरीज नहीं लेगें जब तक बीमा कंपनी से हरी झंडी न मिले। यह नहीं होना है कि मरीज कार्ड ले कर अस्पताल जाए, अस्पताल उसे तुरंत एडमिट करने को बाध्य हो और अस्पताल के बिलों का बीमा कंपनी पेमेंट करे। मैं मान रहा था कि कार्ड ले कर यदि गरीब अस्पताल गया तो उसे एडमिट करना ही होगा। पांच लाख रुपए की सीमा तक पूरा ईलाज करना होगा और बिल का पेमेंट बीमा कंपनी या सरकार द्वारा तयशुदा एजेंसी से हाथोहाथ अस्पताल को मिलेगा! किंतु-परंतु और जांच करने, इन्कार का बीमा कंपनी को कोई अधिकार नहीं होगा।  ऐसा कुछ नहीं होने वाला है। बीमा कंपनी बॉस रहेगी। तब क्या यह 50 करोड़ लोगों को मूर्ख बनाने का ऐलान नहीं है? संभव है ही नहीं कि अगले छह महीने में कार्ड बन कर एक-दो करोड़ लोग भी ईलाज की कतार में लगे और बजट में आबंटित हुए दो हजार करोड़ रुपए के प्रीमियम पेमेंट पर बीमा कंपनियां दस लाख लोगों का भी पांच लाख रुपए के हिसाब से ईलाज करवा दे!

सो पाठक-माईबाप आप ही सोचे, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट के साथ दुनिया की कथित सबसे बडी स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के लिए कैसा –क्या हिसाब लगाया? क्या मेकेनिज्म बनाया? 

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