Loading... Please wait...

युद्ध की बातें भला क्यों?

सेना को हर किस्म की राजनीति से ऊपर रखा जाता है। भारत में कम से कम दो ऐसी संस्थाएं हैं – न्यायपालिका और सेना, जिसकी विश्वसनीयता आम लोगों के बीच बची हुई है। तभी जब सेना ने कहा कि उसने सर्जिकल स्ट्राइक की है और नियंत्रण रेखा पार करके आतंकवादी शिविरों को नष्ट किया है तो देश के लोगों ने आंख बंद करके उस पर भरोसा किया। लेकिन तब भी यह सवाल उठा था कि सेना ने क्यों प्रेस कांफ्रेंस करके इसका ब्योरा दिया? क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक मकसद था? आखिर सेना के उस खुलासे का फायदा किसको हुआ?

 ध्यान रहे सेना पहले भी कार्रवाई करती थी, लेकिन प्रेस कांफ्रेंस करके उसका ऐलान नहीं किया जाता था। तभी यह चर्चा होने लगी है कि सरकार सेना का भी राजनीतिक मकसद से इस्तेमाल कर रही है। तभी अब सेना के राजनीतिकरण की चर्चा भी होने लगी है। पिछले दिनों जब केंद्र सरकार ने जनरल दलवीर सिंह सुहाग के बाद जनरल बिपिन रावत को सेना प्रमुख नियुक्त किया तो बड़ा विवाद हुआ। वरिष्ठता क्रम का उल्लंघन करके जनरल रावत को प्रमुख बनाया गया। अब वे लगातार युद्ध की बात कर रहे हैं। इस साल जून में सिक्किम के डोकलाम में चीन के साथ गतिरोध शुरू हुआ तो उन्होंने कई बार ऐसे बयान दिए, जो सामरिक और कूटनीतिक नजरिए से ठीक नहीं थे। हालांकि उनके बयान राजनीतिक रूप से बहुत सही थे। उन्होंने कहा कि सेना एक साथ ढाई मोर्चों पर लड़ने के लिए तैयार है। ढाई मोर्चे से उनका मतलब चीन, पाकिस्तान और घरेलू नक्सलवादी व अलगाववादियों से था। सामरिक नजरिए से यह बड़बोलेपन के सिवा कुछ नहीं है। सेना प्रमुख की युद्ध की बातों ने सैनिकों का कितना मनोबल बढ़ाया नहीं कहा जा सकता है, लेकिन केंद्र सरकार और भाजपा को राजनीतिक फायदा जरूर पहुंचाया।

अब वायु सेना प्रमुख बीएस धनोआ ने कहा है कि वायु सेना एक साथ दो मोर्चों पर लड़ने के लिए तैयार है। उन्होंने नक्सलवादियों और अलगाववादियों को अपने मोर्चे से बाहर रखा। हालांकि उनके बयान के बाद सामरिक विशेषज्ञों ने जो जानकारी दी उससे पता चला कि चीन के मुकाबले भारतीय वायु सेना की लड़ाकू क्षमता आधी है। चीन और पाकिस्तान यानी धनोआ के दोनों मोर्चे भारतीय वायु सेना की ताकत से ढाई गुना ज्यादा ताकत रखते हैं। 

सो, सामरिक लिहाज से वायु सेना प्रमुख का बयान भी गैरजरूरी था। लेकिन ऐसा लग रहा है कि किसी खास मकसद से युद्धोन्माद पैदा किया जा रहा है। कहने की जरूरत नहीं है कि सीमित या पूर्ण युद्ध सरकारों को हमेशा फायदा पहुंचाता है। 1971 की लड़ाई ने इंदिरा गांधी को बड़ी जीत दिलाई थी तो 1999 के कारगिल युद्ध ने अटल बिहारी वाजपेयी को दोबारा सत्ता दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई थी।

Tags: , , , , , , , , , , , ,

161 Views

बताएं अपनी राय!

हिंदी-अंग्रेजी किसी में भी अपना विचार जरूर लिखे- हम हिंदी भाषियों का लिखने-विचारने का स्वभाव छूटता जा रहा है। इसलिए कोशिश करें। आग्रह है फेसबुकट, टिवट पर भी शेयर करें और LIKE करें।

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

आगे यह भी पढ़े

सर्वाधिक पढ़ी जा रही हालिया पोस्ट

मुख मैथुन से पुरुषों में यह गंभीर बीमारी

धूम्रपान करने और कई साथियों के साथ मुख और पढ़ें...

भारत ने नहीं हटाई सेना!

सिक्किम सेक्टर में भारत, चीन और भूटान और पढ़ें...

पाक सेना प्रमुख करेंगे जाधव पर फैसला!

पाकिस्तान की जेल में बंद भारतीय और पढ़ें...

बेटी को लेकर यमुना में कूदा पिता

उत्तर प्रदेश में हमीरपुर शहर के पत्नी और पढ़ें...

© 2016 nayaindia digital pvt.ltd.
Maintained by Netleon Technologies Pvt Ltd