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पर बिहार जैसा महागठबंधन मुश्किल

पूर्वोत्तर में भाजपा के जीतने के बाद सभी पार्टियां अपने अपने स्तर पर गठबंधन के प्रयास में जुट गई हैं। बंगाल और यूपी के संकेत जाहिर है। बावजूद इसके यह भी समझ आ रहा है कि कुछ नेता दूसरा मोर्चा बनाने में लगे हैं तो कई पार्टियां तीसरे मोर्चे की तैयारी में हैं। संदेह नहीं कि अगर नरेंद्र मोदी की 2014 जैसी सुनामी का दोहराव विपक्ष को रोकना है तो सबसे ज्यादा उत्तर और पूर्वी भारत की पार्टियों को सोचना होगा। एक स्तर पर जरूरत बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल में बिहार जैसे महागठबंधन की है। जिन राज्यों में भाजपा का सीधा मुकाबला कांग्रेस के साथ है वहां लड़ाई अलग होगी। लेकिन जिन राज्यों में समय के साथ कांग्रेस हाशिए पर चली गई है और क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा है वहां सभी पार्टियों को अपने स्वार्थ छोड़ कर साथ आना होगा, जैसा बिहार में लालू प्रसाद और नीतीश कुमार ने किया था। 

बिहार में 2015 में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद दोनों ने दशकों पुरानी अपनी दुश्मनी छोड़ कर हाथ मिलाया था। दोनों ने अपने स्वार्थ छोड़े थे। पुरानी दुश्मनी भूल कर लालू प्रसाद ने नीतीश को नेता माना था। यह सही है कि वह गठबंधन दोनों प्रादेशिक क्षत्रपों की मजबूरी का नतीजा था। पर उस मजबूरी को दोनों पार्टियों ने वैचारिक और सामाजिक समीकरण के खांचे में ढाला था। दोनों ने एक स्तर की प्रतिबद्धता दिखाई थी और मजबूत सामाजिक समीकरण बनाया था। इस महागठबंधन में कांग्रेस भी थी लेकिन उसके होने न होने का ज्यादा जमीनी असर नहीं था। 

असली समीकरण दो धुर विरोधी पार्टियों राजद और जदयू के आने से बना था। 

सवाल है कि क्या अब बिहार में ऐसा गठबंधन बन सकता है? राजद और कांग्रेस एक साथ हैं और एनडीए छोड़ कर जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तान आवाम मोर्चा इस गठबंधन में शामिल हो गई है। एनडीए की कम से कम एक और पार्टी के अलग होने की चर्चा है। फिर भी अगर भाजपा और जदयू का तालमेल बना रहा तो उससे मुकाबला मुश्किल होगा। 

बिहार में दो विरोधी ध्रुवों का साथ आना मुश्किल है पर बिहार जैसा प्रयोग उत्तर प्रदेश में हो सकता है। भाजपा को रोकने के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी साथ आ सकते हैं। दो सीटों के उपचुनाव में बसपा ने सपा उम्मीदवारों को समर्थन दिया है। पर यह समर्थन रणनीतिक और लेनदेने वाला है। बसपा ने राज्यसभा की एक सीट के लिए सपा और कांग्रेस का समर्थन मांगा और बदले में उपचुनाव में समर्थन का वादा किया। यह गठबंधन राजनीतिक प्रतिबद्धता वाला नहीं है और न इसके पीछे कोई दीर्घकालिक रणनीति दिख रही है। इसलिए ज्यादा संभावना इस बात की है कि उपचुनाव में यह गठबंधन काम नहीं करेगा। अगर इस गठबंधन को काम करने लायक बनाना है तो दोनों पार्टियों के नेताओं को अपने स्वार्थ छोड़ने होंगे, दांव पेंच बंद करना होगा और ईमानदारी व प्रतिबद्धता के साथ तालमेल करना होगा ताकि निचले स्तर पर उनके कार्यकर्ताओं तक एकजुटता का मैसेज जाए। दोनों पार्टियां ऐसा करेंगी तभी इनका जातीय समीकरण काम करेगा और भाजपा से नाराज दूसरी जातियों के मतदाताओं को बदलाव का एक विकल्प दिखेगा। 

बिल्कुल ऐसे ही दो ध्रुवों की पार्टियों के गठबंधन की जरूरत झारखंड में भी है। वहां दो मजबूत आदिवासी पार्टियां हैं – झारखंड मुक्ति मोर्चा और झारखंड विकास पार्टी। ये दोनों पार्टियां भाजपा विरोधी हैं पर इनकी लड़ाई का फायदा भाजपा को होता है। तभी इन दोनों को साथ लाने का प्रयास हो रहा है। अगर हेमंत सोरेन की अध्यक्षता वाली जेएमएम और बाबूलाल मरांडी की जेवीएम एक साथ आएं तो झारखंड की तस्वीर बदल जाएगी। कांग्रेस और राजद इनके साथ हैं और उनको साथ रहने में कोई दिक्कत नहीं है। पर असली तालमेल सोरेन और मरांडी का है। अगर ये दोनों ईमानदारी से साथ आएं और बिल्कुल निचले स्तर पर तालमेल का मैसेज पहुंचाएं तो भाजपा को बहुत मुश्किल होगी। 

इन तीन राज्यों को मिला कर कुल 134 लोकसभा सीटें हैं, जिसमें भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों के पास 117 सीटें हैं। 2014 में भाजपा ने नरेंद्र मोदी की सुनामी में जो 282 सीटें जीती थीं, उसमें से 117 सीटें सिर्फ इन तीन राज्यों से आई थीं। इन तीनों राज्यों में भाजपा को इस बात का फायदा मिला था कि सारे बड़े प्रादेशिक क्षत्रप आपस में लड़े थे और भाजपा ने छोटी छोटी पार्टियों से तालमेल करके बड़ी जीत हासिल कर ली थी। भाजपा को क्षत्रपों के वोट में बिखराव का फायदा मिला था। झारखंड में अगर जेएमएम व जेवीएम और उत्तर प्रदेश में सपा व बसपा मिल जाते हैं तो भाजपा को बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है। पर यह तभी होगा, जब इन चारों पार्टियों के नेता अपना निजी स्वार्थ छोड़ेंगे। 

इसी तरह दो विरोधी ध्रुवों की राजनीति वाला चौथा राज्य पश्चिम बंगाल है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को फिलहाल कोई खतरा नहीं दिख रहा है। पर लंबी रणनीति के तहत वे चाहती हैं कि एक महागठबंधन बने। पर तृणमूल कांग्रेस और सीपीएम का साथ आना मुश्किल दिख रहा है। लेफ्ट के नेता मान रहे हैं कि इस तरह का गठबंधन बना तो भाजपा हमेशा के लिए पश्चिम बंगाल में दूसरी बड़ी ताकत बन जाएगी और तृणमूल के सामने लेफ्ट व कांग्रेस दोनों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। सो, अस्तित्व बचाए रखने की चिंता में लेफ्ट के नेता तृणमूल के साथ नहीं जाएंगे। तभी माना जा रहा है कि 42 लोकसभा सीटों वाले इस राज्य में भाजपा को बड़ी उम्मीद है। पिछली बार वह सिर्फ दो सीट जीत पाई थी। त्रिपुरा की जीत से उत्साहित भाजपा बंगाल में बड़ा जोर लगाएगी। त्रिकोणात्मक मुकाबला होने की स्थिति में भाजपा को फायदा मिलने की उम्मीद है। 

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