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गुजरात के सवाल कायम

हरि शंकर व्यास

कोई माने या न माने, विजय रूपानी को गुजरात का फिर मुख्यमंत्री बनाना मोदी-शाह की भारी चूक है। इस फैसले से दोनों ने फिर संघ पदाधिकारियों याकि प्रवीण तोगडिया आदि तमाम लोगों को मैसेज दिया है कि ये करेंगे मन की। इसका एक तात्कालिक नतीजा तो यह बना कि पटेलों में फिर मैसेज गया कि मोदी-शाह उनकी परवाह नहीं करने वाले। तभी मामूली बात नहीं जो नितिन पटेल ने आंखे दिखाई और उन्हें मनाने के लिए नरेंद्र मोदी-अमित शाह दोनों को दम लगाना पड़ा। झुकना पड़ा। 

इसका असर भाजपा के दूसरे राज्यों में भी होगा। अब संभव नहीं कि मोदी-शाह बताएं कि चुनाव ऐसे लड़ना है और येदियुरप्पा, वसुंधरा राजे, शिवराजसिंह चौहान और रमनसिंह आदि उनकी उम्मीदवार लिस्ट भी मान ले। यदि गुजरात में भाजपा 150 प्लस या 125 सीटे भी जीतती तो ये तमाम नेता और मुख्यमंत्री मानते कि मोदी-शाह उन्हें भी जीतवाने की गारंटी है। भाजपा की सरकारों के खिलाफ बनी एंटी इनकंबेसी की काट में नरेंद्र मोदी का जादू है। अब उलटा है। अब कर्नाटक में येदियुरप्पा अपने लिंगायत वोटों के आधार पर अपने मनमर्जी उम्मीदवार खड़े करवाएंगे तो मध्यप्रदेश, राजस्थान और छतीसगढ़ के चुनावों में मुख्यमंत्रियों पर आरएसएस का हाथ होगा और ये मुख्यमंत्री संघ मशीनरी के साथ मिल कर अपने हिसाब से चुनाव लड़ेगे। 

इन सबका तर्क बन गया है कि जनता अब केंद्र सरकार को लेकर अधिक बाते कर रही है। जनता की समस्याओं, काम धंधे, बेरोजगारी, किसान समस्या, आदि के लिए मोदी सरकार की नीतियों के ज्यादा चर्चे है। प्रदेश सरकार के खिलाफ कम एंटी इनकंबेसी है और नरेंद्र मोदी-अमित शाह को ले कर ज्यादा किस्से है, एंटी इनकंबेसी है। सोशल मीडिया मुख्यमंत्री और उनकी सरकार को ले कर नहीं भरा हुआ है बल्कि मोदी और उनकी सरकार के  किस्सों, अनुभवों से भरपूर है। 

यह बात भी जान ले कि पिछले एक-दो पखवाड़े में यह धारणा घटी है कि लोकसभा चुनाव के साथ ही सितंबर के राजस्थान, मध्यप्रदेश, छतीसगढ़ चुनाव होंगे। तकनीकी तौर पर फिलहाल इसमें कई दिक्कते हैं। दूसरे प्रधाननंत्री मोदी किसी सूरत में अपने कार्यकाल को दो –चार महीने कम नहीं होने देंगे।

सो 2018 में विधानसभाओं की तयशुदा समय सीमा में चुनाव तय माने जाने चाहिए। अभी जो मुख्यमंत्री है वे ही चुनाव लड़वाएगें। कोई मुख्यमंत्री नहीं बदला जाएगा। हां, इन राज्यों में संगठन की जो दिक्कते है जैसे मध्यप्रदेश में प्रदेश अध्यक्ष या संगठन मंत्री में नहीं बन रही है तो उसे संघ दुरूस्त कराएगा। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से नहीं बल्कि संघ पदाधिकारियों से प्रदेशों में ऐसे फैसले होंगे, यह अपने आपमें बडी बात है। इसलिए संभव है कि 2018 में संघ खुद अपनी तह भाजपा संगठन में चेंज कराने के फैसले ले।

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