दक्षिण भारत के राज्यों में क्या?

देश की राजनीति जितनी ज्यादा उत्तर भारत केंद्रित होती जा रही है दक्षिण भारत के राज्यों में उतना ज्यादा अलगाव बढ़ रहा है। कम से कम भाजपा की लगातार दो सरकारों में दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व नगण्य है। इक्का दुक्का चेहरों को छोड़ दें तो दक्षिण भारत के नेता केंद्र सरकार से नदारद हैं। इससे उनके यहां यह भावना प्रबल हो रही है कि उनका काम दिल्ली के बगैर भी चल सकता है। दक्षिण भारत के राज्यों का राजनीतिक अलगाव अगर भावनात्मक अलगाव में तब्दील हुआ तो देश के लिए अच्छा नहीं होगा।

पिछले कुछ दिनों में कम से कम दो मुद्दे ऐसे हुए हैं, जिन्होंने दक्षिण के राज्यों के लोगों का अलगाव बढ़ाया है। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने परोक्ष रूप से हिंदी अनिवार्य करने की पहल की। सरकार के कामकाज से लेकर नई शिक्षा नीति के मसौदा दस्तावेज में इस बात के संकेत दिए गए। पर दक्षिण भारत में और कुछ दूसरे राज्यों में इसके खिलाफ जैसी प्रतिक्रिया हुई उसने सरकार को पीछे हटने के लिए मजबूर किया। दूसरा मुद्दा 15वें वित्त आयोग की शर्तों को लेकर उठा था। ध्यान रहे दक्षिण भारत के राज आर्थिक रूप से समृद्ध है। उनके यहां उद्योग धंधे भी हैं और कारोबार भी हैं और आबादी भी नियंत्रण में है। तभी जब 15वें वित्त आयोग की शर्तों में यह कहा गया कि ज्यादा आबादी वाले और विकास की दौड़ में पिछड़े राज्यों को तरजीह दी जाएगी तो दक्षिण के राज्यों ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि जो राज्य अपने कारणों से पिछड़े रह गए उनको दूसरे विकसित राज्यों के दम पर मदद देना अच्छा नहीं है। इसे लेकर चार दक्षिणी राज्यों के वित्त मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों ने कई बार बैठक की और वित्त आयोग की शर्तों को बदलने के लिए दबाव बनाया।

भाषा, संस्कृति, आर्थिक स्थिति आदि का अलगाव राजनीति में भी दिखता है। ध्यान रहे दक्षिण भारत के सबसे बड़े राज्य तमिलनाडु में हिंदू आबादी करीब 90 फीसदी है पर हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा का वहां एक भी विधायक नहीं है। जाहिर है हिंदुत्व की राजनीति दक्षिण भारत में असर नहीं कर पाती है। कम से कम अभी तक कोई असर नहीं हुआ है। कर्नाटक इसका अपवाद है पर उसका भी कारण धार्मिक से ज्यादा जातीय है। कर्नाटक में भाजपा की सत्ता उसकी हिंदुवादी राजनीति से ज्यादा बीएस येदियुरप्पा की लिंगायत राजनीति की वजह है। पर संभव है कि नए दशक में दक्षिण की राजनीति में कुछ बुनियादी बदलाव हों।

अब तक हैदराबाद तक सीमित रहे असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया एमआईएम का विस्तार पूरे देश में हो रही है। इस पार्टी की राजनीति पूरी तरह से सांप्रदायिक है, धार्मिक विभाजन पर आधारित है। उसका उभार आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल आदि राज्यों में भाजपा के फलने-फूलने की जमीन दे सकता है। ओवैसी की पार्टी का असर अखिल भारतीय राजनीति पर भी होना है। सावरकर को मानने वाले लोग दो राष्ट्र के जिस सिद्धांत को बढ़ावा दे रहे हैं उसमें एक धुरी ओवैसी बन सकते हैं।

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