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आरोपों से नेतागिरी खत्म नहीं होती!

तीसरी दुनिया के ज्यादातर देशों की तरह भारत में भी भ्रष्टाचार के आरोपों से किसी नेता का करियर खत्म नहीं होता है। भ्रष्टाचार के आरोपों का किसी नेता की जीत हार पर कोई असर नहीं होता है। बिहार में लालू प्रसाद इसकी मिसाल हैं। उनको चारा घोटाले से जुड़े एक मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने दोषी करार देकर सजा सुना दी। उनके चुनाव लड़ने पर रोक लग गया, लेकिन वे अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहे और उनकी पार्टी चुनाव जीत कर सत्ता में आ गई। 

तमिलनाडु की दिवंगत मुख्यमंत्री जयललिता को भी आय से अधिक संपत्ति के आरोप में सजा हुई थी। उनके खिलाफ दो दशक मुकदमा चला, लेकिन इस अवधि में उनका राजनीतिक वजूद कायम रहा और वे चुनाव जीत कर मुख्यमंत्री बनती रहीं। मुलायम सिंह यादव के पूरे परिवार के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला चल रहा है और मायावती के खिलाफ ताज कॉरीडोर घोटाले नब्बे के दशक में दर्ज हुआ और उसके बाद वे तीन बार राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। भ्रष्टाचार का मुकदमा दर्ज होने के बाद उत्तर प्रदेश के दोनों क्षत्रपों का राजनीतिक ग्राफ तेजी से ऊपर गया। झारखंड में शिबू सोरेन और उनकी पार्टी के कई सांसदों पर रिश्वत लेकर नरसिंह राव की सरकार बचाने का आरोप लगा। लेकिन इससे उनकी लोकप्रियता पर असर नहीं हुआ। उनकी पार्टी समय के साथ और मजबूत होती गई। 

ऐसा नहीं है कि सिर्फ प्रादेशिक क्षत्रपों पर यह नियम लागू होता है। कांग्रेस और भाजपा के नेताओं पर भी यह नियम लागू है। भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा को भ्रष्टाचार के आरोप में कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। अब भी उनके खिलाफ मुकदमे चल रहे हैं लेकिन पार्टी ने उनको प्रदेश की कमान सौंप दी है और वे अगले चुनाव में भाजपा का चेहरा होंगे। इसी तरह आदर्श घोटाले की वजह से मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने वाले कांग्रेस नेता अशोक चव्हाण सांसद हैं और महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष हैं।

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