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चीन पर कूटनीति भी कहां?

कोई माने या न माने अपना मानना है कि भारत 1962 में चीन के हाथों मिली हार को भूला नहीं है। शर्मनाक बात यह है कि इस हार का हिसाब चुकाने के लिए पिछले 45 सालों में न तो कोई कूटनीति हुई है और न सामरिक नीति बनी है। इसी का नतीजा है जो चीन से मिली हार हर भारतीय और भारत की हर सरकार के मन में एक ग्रंथि की तरह बैठी है। दूसरी ओर भारत को हराने के बाद भी चीन ने भारत के खतरे को बूझा और दक्षिण एशिया में भारत को घेरे रहने की लगातार कूटनीति करता रहा। 

चीन को लेकर भारत के कूटनीति नहीं करने का नतीजा यह परिणाम है कि आज जब तीन हफ्ते से ज्यादा समय से सिक्किम सेक्टर में चीन के साथ गतिरोध बना है तो भारत के हाथ में कोई ऐसा कूटनीतिक हथियार नहीं है, जिससे चीन को घेरा जा सके। चीन को इसका पता है। इसलिए भी वह कभी लद्दाख में तो कभी अरुणाचल प्रदेश के तवांग में तो कभी सिक्किम में भारत तो ललकारता रहता है। 

अगर भारत ने कूटनीति की होती तो तस्वीर दूसरी होती। हकीकत है कि सिक्किम भारत का अभिन्न अंग है और वहां के लोगों के मन में भारत को लेकर कोई दुविधा या परेशानी नहीं है। फिर भी चीन वहां के लोगों को भड़काने की कोशिश कर रहा है। इसके उलट चीन ने जिस तिब्बत पर कब्जा कर रखा है, वहां के लोगों के मन में चीन के प्रति भारी नाराजगी है। लेकिन भारत उनकी इस नाराजगी को अपने एडवांटेज में नहीं बदल सका है। तिब्बत की निर्वासित सरकार भारत से चलती है। तिब्बतियों के सबसे बड़े धर्मगुरू दलाई लामा भारत में रहते हैं। लेकिन भारत तिब्बत की लड़ाई का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए नहीं कर पाया है। चीन वहां अपनी मुख्य धरती से लोगों को ला कर बसा रहा है और इस इलाके की जनसंख्या संरचना बदल रहा है, लेकिन भारत इस पर मुंह बंद करके बैठा है। 

इसी तरह चीन के कब्जे वाले हांगकांग में लोकतंत्र बहाली को लेकर आंदोलन चल रहा है। लेकिन क्या भारत के किसी शासक ने या अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और खुफियागिरी के लिए रखे गए विशेषज्ञों ने ऐसा कुछ किया है, जिससे यह लगे कि भारत इसका कूटनीतिक फायदा उठा सकता है? पिछले दिनों चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग हांगकांग की यात्रा पर गए थे और वहां उन्होंने लोकतंत्र समर्थकों को आगाह करते हुए कहा कि चीन इस तरह का कोई आंदोलन बरदाश्त नहीं करेगा। क्या भारत में दम है कि वह लोकतंत्र समर्थकों के साथ खड़े हो और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन को घेरने वाला कोई कदम उठाए?

इसी तरह चीन के पश्चिमी हिस्से में शिनझियांग प्रांत है, जहां के उइगर मुस्लिम लगातार अपनी स्वायत्तता और आजादी के लिए लड़ते रहते हैं। यहां की आबादी मुख्य रूप से मुस्लिम है और उनकी भाषा तुर्की है क्योंकि उनकी जड़ें तुर्की से जुड़ी हैं। जिस शिनझियांग प्रांत में उनकी आबादी है उसकी सीमा आठ देशों से लगती है। इनमें एक देश भारत भी है। लेकिन भारत के किसी शासक ने चीन पर दबाव रखने के लिए उइगर विद्रोह का इस्तेमाल नहीं किया। उइगर लोगों के आंदोलन को दबाने के लिए चीन ने जो बर्बरता की है, उसकी कहानियां कम ही बाहर आ पाती हैं। लेकिन जिस तरह से भारत में और खास कर जम्मू कश्मीर में आतंकवाद फैलाने वाले मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित होने से रोकने के लिए चीन बार बार वीटो का इस्तेमाल कर रहा है क्या उस तरह से भारत ने कभी उइगर प्रतिरोध को अंतरराष्ट्रीय मंच पर आवाज दी है?

कुल मिला कर चीन के प्रति भारत की नीति में बहुत झोल हैं। वह कई तरह के विवादों में उलझी है। तिब्बत से लेकर शिनझियांग के उइगर विद्रोह तक और हांगकांग से लेकर ताइवान तक अगर भारत चाहे तो उसे कई मोर्चे पर घेर सकता है या कम से कम उलझा सकता है। लेकिन अब तक भारत ने जो थोड़ी बहुत कूटनीति की है, वह तिब्बत पर की है और थोड़ी बहुत दक्षिण चीन सागर में, जहां और कई पूर्वी एशियाई देश चीन के साथ टकरा रहे हैं। 

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