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भ्रष्टाचार पर सिर्फ सियासी रोटी!

बिहार में भ्रष्टाचार के बहाने जो राजनीति है उससे कई सवाल उठते है। भारत में क्या नेता और पार्टी के लिए भ्रष्टाचार से लड़ना प्रतिबद्धता का मुद्दा है?  जो पार्टी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चुनाव लड़ कर सत्ता में आती है वह क्या सचमुच राजनीति से अपराध और भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए काम करती है? इन दोनों सवालों का जवाब नकारात्मक है। भारत में कोई भी पार्टी निष्ठा या प्रतिबद्धता के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं लड़ती है। उनके लिए यह सिर्फ एक राजनीतिक मुद्दा है, जिससे चुनावी रणनीति बनानी है, दुश्मन को निपटाना है और झूठी हवा बना कर वोट पाना है। 

कार्नेगी इंडोवमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के सीनियर फेलो मिलन वैष्णव ने भारत की राजनीति में अपराध और भ्रष्टाचार को लेकर एक किताब लिखी है। इसी साल आई किताब का नाम है– ‘व्हेन क्राइम पेजःमनी एंड मसल इन इंडियन पोलिटिक्स’ है। इसमें उन्होंने विस्तार से भारतीय राजनीति की इस प्रवृत्ति के बारे में लिखा है। भारत में हर पार्टी चुनाव प्रचार के समय भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाती है और सरकार में आने के बाद उसे भूल जाती है। अगर किसी सरकार को याद रहता है तो उसकी कार्रवाई सिर्फ विपक्षी पार्टियों के नेताओं के ऊपर होती है। हर पार्टी के लिए अपने नेता हमेशा पवित्र होते हैं। हर पार्टी अपने नेता के ऊपर लगे आरोपों का बचाव इस एक लाइन से करती है – आरोप और कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित हैं।

याद करें नरेंद्र मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर चुनाव लड़ते वक्त क्या वादा किया था? उनका पहला नंबर एक वायदा था कि वे भारतीय राजनीति की साफ सफाई करेंगे।  प्रधानमंत्री ने राजस्थान की एक चुनावी सभा में कहा था – इन दिनों बहुत चर्चा हो रही है कि अपराधियों को राजनीति में आने से कैसे रोका जाए। मेरे पास इसका उपाय है। मैंने राजनीति को स्वच्छ बनाने का संकल्प किया है। उन्होंने अपनी योजना बताते हुए कहा कि वे सत्ता में आते ही फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाएंगे और मौजूदा नेताओं के सारे मामलों की फटाफट सुनवाई करा कर कार्रवाई कराएंगे। उन्होंने कहा – मुझे भरोसा है कि हमारी पांच साल की सत्ता के बाद देश की राजनीति पूरी तरह से स्वच्छ हो जाएगी और सारे अपराधी जेल की सलाखों के पीछे होंगे। बाद में मोदी ने अपना यह भाषण दोहराते हुए उन्होंने उत्तर प्रदेश के एटा और हरदोई में कहा कि वे भारतीय संसद को अपराधियों से मुक्त करके रहेंगे। 

नरेंद्र मोदी जिस समय यह भाषण दे रहे थे, उस समय भाजपा ने ही बड़ी संख्या में अपराधी छवि वाले लोगों को टिकट दिए थे। भाजपा की टिकट पर जीतने वाले 282 सांसदों में से 35 फीसदी के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। उनकी ओर से चुनाव आयोग में दिए गए हलफनामे से पता चलता है कि 22 फीसदी के खिलाफ गंभीर अपराध के आरोप हैं। केंद्र सरकार के तीन साल पूरे होने के बाद भी संसद और विधानसभाओं में बैठे अपराधी छवि वाले सांसदों और विधायकों के मामले सुलझाने के लिए एक भी फास्ट ट्रैक अदालत नहीं बनी है। जितने नेताओं के खिलाफ गंभीर आरोप थे, उनमें से लगभग सभी जेल से बाहर हैं और जिनके खिलाफ कार्रवाई हो रही है, वे सब विपक्षी पार्टी के नेता हैं। भाजपा के विधायकों, सांसदों और केंद्र या राज्य सरकार के किसी मंत्री के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई है। 

इस मामले में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दम पर सत्ता में आए अरविंद केजरीवाल भी अपवाद नहीं हैं। वे इंडिया अगेंस्ट करप्शन का झंडा लेकर मैदान में उतरे थे और अन्ना हजारे के आंदोलन ने उनको नेता बनाया। लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्होंने इसे खत्म करने या रोकने के लिए कोई प्रयास नहीं किया। उनकी सरकार के कई मंत्री और विधायक भ्रष्टाचार के आरोप में फंसे हैं। उनके एक मंत्री के खिलाफ तो सीबीआई छापा मार चुकी है। उनकी अपनी पार्टी से निकाले गए एक पूर्व मंत्री ने खुद केजरीवाल के ऊपर पैसे लेने का आरोप लगाया। 

नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल, इन्हीं दो नेताओं के नाम का जिक्र इसलिए है क्योंकि ये दोनों भ्रष्टाचार के खिलाफ बने अखिल भारतीय माहौल को भुना कर सत्ता में पहुंचे हैं और इन दोनों से देश के लोगों को बड़ी उम्मीद थी। दूसरे, बोफोर्स प्रकरण के करीब तीन दशक बाद देश भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आंदोलित हुआ था, जिसका फायदा इन दोनों नेताओं को हुआ। लेकिन इनके सत्ता संभालने के बाद फिर सब उसी ढर्रे पर चल निकला। 

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