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कुएं में ही भांग!

भारत में और खास कर भारत की राजनीति में भ्रष्टाचार का वैसे ही जुड़ाव हो गया है, जैसे नाखून और चमड़ी का होता है। दोनों का चोली दामन का साथ है। ऐसा लगता है कि पूरे कुएं में भांग पड़ी है। किसी पार्टी को इस बात की परवाह नहीं है कि उसके यहां आपराधिक छवि के भ्रष्टाचार के आरोपी नेताओं की भरमार है। उन्हें सिर्फ इस बात की परवाह है कि कौन चुनाव जीत सकता है। चूंकि आपराधिक छवि के, दागी और भ्रष्टाचार के आरोपी नेता अपने धन और बाहुबल के दम पर चुनाव जीत सकते हैं इसलिए सारी पार्टियां उनको टिकट देती हैं। 

राष्ट्रपति चुनाव से ठीक पहले इसके निर्वाचक मंडल के सदस्यों यानी देश के सांसदों और विधायकों के चुनावी हलफनामे का एक ब्योरा सामने आया है। द एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स एंड नेशनल इलेक्शन वाच ने देश के 4852 विधायकों और सांसदों के चुनावी हलफनामे का विश्लेषण किया है। इसके मुताबिक इनमें से 33 फीसदी यानी करीब 16 सौ विधायकों और सांसदों ने जानकारी दी है कि उनके ऊपर आपराधिक मामले चल रहे हैं। कुल विधायकों और सांसदों में से 20 फीसदी के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले हैं। इनमें सभी पार्टियों के नेता शामिल हैं। 

इस रिपोर्ट के मुताबिक लोकसभा के 543 सांसदों में से 184 और राज्यसभा के 231 सांसदों में से 44 के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 4,078 विधायकों में से 1353 विधायक ऐसे हैं, जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। 993 विधायकों और सांसदों ने बताया है कि उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले हैं। 

एक तरफ ऐसे नेताओं को पार्टी का संरक्षण मिलता है तो दूसरी ओर कानून की खामियों का भी फायदा इनको मिलता हैं। भारत में कानूनी प्रक्रिया इतनी लंबी चलती है कि तब तक नेता की उम्र बीत जाती है। अब इसमें कुछ सुधार की प्रक्रिया चल रही है। अदालत ने चुनाव आयोग से इस बारे में पूछा है। अगर सचमुच राजनीति की साफ सफाई करनी है कि जन प्रतिनिधित्व कानून के कुछ प्रावधानों में बदलाव करना जरूरी है।

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