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नतीजों के बाद क्या?

हरि शंकर व्यास

तो नोट करें देश की राजनीति, देश के विमर्श में भारी टकराव! मोदी सरकार बनाम विपक्ष में वह घमासान शुरू होगा जो 2019 के लोकसभा चुनाव को भाजपा बनाम गैर-भाजपा की लड़ाई को कांटेदार बना देगा। गुजरात में नतीजा कुछ भी आए मतलब नरेंद्र मोदी की आंधी निकले या उनका जादू पंचर हो या जैसे-तैसे भाजपा की गुजरात में सरकार बने, सभी स्थितियों में 2018 में टकराव भयावह होगा। इसलिए कि गुजरात चुनाव ने 2019 के चुनाव की जमीन बनवा दी है। यदि कांग्रेस हारती है तो वह विपक्ष के लिए वैसी ही स्थिति होगी जैसी 1975 में इमरजेंसी से पहले की थी। सरकार आक्रामक तो विपक्ष हताश, बिखरा और संघर्ष के लिए मजबूर। इससे लोकतंत्र, राजनीति और चुनाव प्रक्रिया पर अविश्वास में मायावती हो या अखिलेश या राहुल गांधी या शरद पवार, ममता बनर्जी सभी तब समान चिंता में लोकसभा चुनाव में एलायंस की सोचेगें! अपने को याद है इमरजेंसी के दौरान या उससे पहले कोई कल्पना नहीं कर सकता था कि कभी विरोधी पार्टियां तालमेल कर एलायंस में चुनाव लडेगी। मगर इंदिरा गांधी ने चुनाव की घोषणा की नहीं कि सारे विपक्षी दल एकजुट चुनाव में उतर पडे। यहीं स्थिति 2018 के टकराव के बाद 2019 में चुनाव तारीख की घोषणा के साथ बनेगी। 

इसलिए गुजरात में कांग्रेस बुरी तरह हारती है तो उससे पैदा निराशा, हताशा से विपक्ष में एलायंस की जरूरत पुख्ता होगी। यह मैं लिख चुका है कि गुजरात में कांग्रेस जीती तो विपक्ष में बिखराव का खटका बनेगा। कांग्रेस फूल कर कुप्पा होगी। राहुल गांधी जीत से हवा में उड़ने लगेगें। कांग्रेसी नेता अपनी शर्तों पर तब एलायंस की सोचेगें और क्षेत्रिय दल बिदकेगें, भाजपा को इन्हंे बिखरने का मौका मिलेगा। 

सो कांग्रेस के लिए गुजरात नतीजों में आदर्श स्थिति बराबर की टक्कर से सम्मानजनक सीटे ले कर हारना है। इससे कांग्रेस की मूल याकि बूथ और कार्यकर्ता लेवल की जो कमी है, फारवर्ड जातियों और हिंदूओं के विश्वास का जो संकट है उस पर राहुल गांधी ज्यादा ध्यान देने को मजबूर होंगे। तब 2019 में लोकसभा चुनाव की विपक्षी तैयारियां, कांग्रेस की तैयारियां, एलायंस की राजनीति जमीन पर रहते हुए, उसकी हकीकत में होगी। 

भाजपा की आंधी या छप्पर फाड़ जीत की सूरत में मोदी सरकार अपनी तासीर में और उग्र बनेगी। कांग्रेस और विपक्ष के नेताओं से राजनीति को मुक्त करने की मुहिम आगे बढ़ेगी। मीडिया, बहस, राजनैतिक विमर्श को इकरंगी बनाने की जिद्द उग्र होगी। प्रदेश के भाजपा मुख्यमंत्री हो या नेता, मंत्री सब गौण होंगे और राजनीति, चुनाव सबमें मोदी-अमित शाह पर निर्भरता बढ़ेगी।

इसलिए किसी भी कोण से सोचे 2018 भारत राष्ट्र-राज्य के लिए सियासी तौर पर बहुत मारक होगा। गर्वनेश, शासन में सहजता नहीं होनी है। पूरे साल चुनावी मोड में सरकार और मोदी-शाह रहेंगे। हर विधानसभा चुनाव जीतने की जिद्द में सत्तापक्ष बनाम विपक्ष की एक-दूसरे के खिलाफ उग्रता, आर-पार की लड़ाई का वह धमाल होगा कि 2019 के लोकसभा चुनाव तक क्या होगा, यह सोचना ही कंपकंपा देने वाला है। गुजरात चुनाव के बाद राजनीति और आर्थिकी दोनों के झंझट ऐसे विकट बनने है कि कोई भी इन्हें सहज-सामान्य दिनों में नहीं लौटा सकता। चुनाव और राजनीति के खातिर ऐसे प्रयोग या दुस्साहस होंगे जिससे समाज और राजनीति में चखचख बढ़ेगी तो टूटन भी बनेगी। 

बहरहाल कल नतीजे आ जाए तो राजनीति पर फिर विस्तार से लिखना ही लिखना हैं।

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