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कर्नाटक से ज्यादा अहम कैराना!

चाहे तो यह भी सोच सकते है कि 2019 के लोकसभा चुनाव की तेल की धार बतलाने वाला असली उपचुनाव। इसलिए कि कैराना ही उत्तर प्रदेश का वह इलाका है जिसमें हिंदू-मुसलमान के दंगों की प्रयोगशाला में हिंदू जज्बा बना और 2014 में आंधी बन गई। याद करें तब सुनी गई हिंदू परिवारों के पलायन की खबरों को। जाटों, गुर्जर आदि हिंदूओं की गोलबंदी में महानायक बन कर उभरे हुकुम सिंह ने 2014 में छप्पर फाड़ वोटों से यह लोकसभा सीट जीती थी। सुरेश राणा हिंदूओं के नए नेता बन कर उभरे। अब हुकुमसिंह के निधन से खाली हुई सीट पर उनकी बेटी मृंगाका सिंह को भाजपा ने उम्मीदवार बनाया है। सुरेश राणा और योगी आदित्यनाथ उन्हे जीताने के लिए पूरा दम लगाएगें।

सो कैराना में भाजपा को हर सूरत मे जीतना है। ठिक विपरित अखिलेश यादव, मायावती, राहुल गांधी , अजित सिंह ने मौन सहमति के साथ भाजपा के खिलाफ मुसलमान उम्मीदवार मैदान में उतारा! लोकदल की उम्मीदवार तबस्सुम बेगम भाजपा को टक्कर देगी। 

जाहिर है विपक्ष ने कैराना को टेस्ट केस बनाया है। विपक्ष ने हिंदू-मुस्लिम राजनीति के धुव्रीकरण के नंबर एक अखाड़े कैराना में यदि मुस्लिम महिला को उम्मीदवार बनाया है तो हिसाब से यह बात मोदी-शाह-योगी के लिए फायदेमंद है। इन्हे कुछ नहीं करना। अपने आप सारा हिंदू एकजुट हो कर मृंगाका सिंह को वोट देगा। उन्हे जीता देगा। उस नाते भाजपा की जीत उस नाते तयशुदा मानी जाए। 

और वह भाजपा के यूपी में 51 प्रतिशत वोट लेने के प्रबंधों की शुरूआत होगी। 

हां, विपक्ष के पूरे साझे के बावजूद यदि भाजपा जीतती है तो 2019 के लोकसभा चुनाव में यूपी में भले पूरा  विपक्ष  एकजुट हो। मतलब मायावती-अखिलेश- राहुल-अजितसिंह चारों साथ मिलकर भी चुनाव लड़े तब भी बुरी तरह हारेंगे। फिर विपक्ष मुसलमान उम्मीदवार ख़ड़ा करने की भी कतई हिम्मत नहीं करेगा।  इसलिए कि कैराना मे मोदी-शाह-योगी इस उपचुनाव में जो करा देगें वह हिंदू मनौविज्ञान बनाम मुसलमान की आगे की गोलबंदी और 51 प्रतिशत वोटों के लक्ष्य का बीज मंत्र होगा। 

क्या यह संभव है? य़ही टेस्ट, परीक्षा है?  कैराना में देखने वाली बात होगी कि जाट, जाटव और मुसलमान झगडा भूला तीनों एक साथ साझे में वोट करते है या नहीं? अमित शाह ने 2014 और 2017 में जाटों को भावनात्मक तौर पर कहा था कि आप सोचिएगा उन्हे वोट दे कर किन्हे जीताएंगे, वाला फार्मूला फिर कैराना में टेस्ट होना है। सुरेश राणा ने कैराना मे प्रचार की कमान संभाल ली है। माइक्रों लेवल पर, यू ट्यूब आदि से हल्ला बनाया जाने लगा है। 28 मई को चुनाव है। 

चुनाव में मायावती, राहुल, अखिलेश शायद ही प्रचार करें। तीनों ने अजितसिंह के पुराने जाट बहुत इलाके में उन्हे आगे कर जाटों को मैसेज दिया है कि उनके नेता का सम्मान कर रहे है। और उसे साझेदार बना रहे है। उधर मायावती और दलित काड़र जाटव में यह जज्बा बनवाने की कोशिश में होगा कि बहिनजी का आदेश है। अपने को लग रहा है कि यूपी का दलित (सिर्फ जाटव नहीं) अब भाजपा विरोध में वैसा ही निश्चय लिए हुए है जैसे मुसलमान लिए हुए है। कैराना के लगभग 17 लाख वोटों में तीन लाख मुसलमान वोट और डेढ़ लाख जाटव-दलितों के वोट बताए जाते है। चार लाख जाट, गुर्जर, सैनी, कश्यप, प्रजापति आदि पिछड़ों में जाटों की संख्या भी अच्छी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में हिंदू-मुस्लिम फसाद की हवा में भाजपा के हुकुम सिंह को 5.65 लाख वोट, सपा को 3.29 और बसपा को 1.60 लाख वोट मिले थे। बाद के विधानसभा चुनाव में लोकसभा की पांचों विधानसभा सीटों पर बसपा-सपा-कांग्रेस के उम्मीदवारों को मिले वोट 4.98 लाख थे तो भाजपा उम्मीदवारों के 4.32 लाख।

इसलिए कैराना का उपचुनाव गोरखपुर, फूलपुर में भाजपा की हार के बाद अमित शाह के उस हुंकारे की परीक्षा है कि अब हम यूपी में 50 प्रतिशत ज्यादा वोट ले कर विपक्ष को उठने नहीं देगें। 

यदि भाजपा जीती तो 2019 का अर्थ होगा कि सपा, बसपा, लोकदल, कांग्रेस को चुनाव में मुस्लिम चेहरा उतारने की रत्ती भर जोखिम नहीं लेनी चाहिए। यदि भाजपा हारी तो अर्थ होगा कि उत्तरप्रदेश में राजनीति सामान्य होने की तरफ है। हिंदूओं में मोदी-शाह की हिंदू जुमलेबाजी और दिखावा अब उलटी प्रतिक्रिया पैदा करने लगी है। तब मोदी-शाह-योगी 2019 आते –आते प्रदेश में क्या करेगें इसकी कल्पना मे जितना भी सोचा जाए वह कम होगा। 

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