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शिवसेना को कैसे समझाएगी भाजपा?

नीतीश कुमार के बाद भाजपा के गले की दूसरी सबसे बड़ी फांस उद्धव ठाकरे हैं। ध्यान रहे महाराष्ट्र में भाजपा शिवसेना के बगैर लड़ कर विधानसभा चुनाव जीत चुकी है। लेकिन बिहार में वह ऐसा नहीं कर पाई। नीतीश से अलग होकर वह विधानसभा चुनाव लड़ी तो उसकी सीटें 91 से घट कर 54 रह गईं। तभी बिहार के मुकाबले महाराष्ट्र को ज्यादा सुरक्षित माना जा रहा है। फिर भी भाजपा लोकसभा चुनाव में कोई जोखिम नहीं लेना चाहती है। 

ध्यान रहे दोनों पार्टियों ने 2014 का विधानसभा चुनाव अलग अलग लड़ा था पर आज तक पिछले 30 साल में दोनों ने कोई लोकसभा चुनाव अलग अलग नहीं लड़ा है। पिछले दिनों पालघर लोकसभा सीट के उपचुनाव में दोनों अलग लड़े थे और कांटे की टक्कर के बाद भाजपा का उम्मीदवार 29 हजार वोट से जीता। वह भी तब जबकि बहुजन विकास अघाड़ी नाम की एक स्थानीय पार्टी ने दो लाख से ज्यादा वोट काटे, कांग्रेस ने 43 हजार और कम्युनिस्ट पार्टी ने 71 हजार वोट काटे, तब शिवसेना का उम्मीदवार 29 हजार से हारा। अगर आमने सामने की लड़ाई होती तो भाजपा की हार दो लाख से ज्यादा वोट से होती। यह सीट जीतने के लिए भाजपा ने कांग्रेस के नेता राजेंद्र गवित को टिकट दिया था। इसके अलावा भंडारा गोंदिया की जिस दूसरी सीट पर उपचुनाव हुआ वहां भाजपा हार गई। 

उपचुनाव के नतीजों के बाद ही भाजपा के नेताओं ने शिवसेना को मनाने की भागदौड़ तेज कर दी है। भाजपा ने अपने पूर्व अध्यक्ष और प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री सुधीर मुंगटीवाकर को शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से संबंध सुधारने में लगाया था। पर उनको कामयाबी नहीं मिली। तब खुद पार्टी प्रमुख अमित शाह ने कमान संभाली। 

वैसे भाजपा ने जो पैबंद महाराष्ट्र में लगाए थे उनकी भी सिलाई खुल चुकी है। शेतकरी स्वाभिमान संगठन के नेता राजू शेट्टी एनडीए से अलग हो गए हैं। वे बड़े किसान नेता हैं और किसानों की परेशानी के मुद्दे पर वे एनडीए से अलग हुए। पिछली बार वे एनडीए के साथ मिल कर लड़े थे और इचलकरंजी सीट से चुनाव जीते थे। उससे पहले वे अपनी पार्टी की टिकट से इस सीट से जीतते थे। जब राजू शेट्टी से पूछा गया कि अगर अमित शाह उनसे मिलें और एनडीए में आने के लिए कहें तो वे क्या करेंगे? इस पर उन्होंने कहा कि वे लता मंगेशकर की तरह कह देंगे कि उनकी तबियत खराब है। गौरतलब है कि समर्थन के लिए संपर्क अभियान के तहत अमित शाह को मुंबई में लता मंगेशकर से भी मिलना था पर उन्होंने कहलवा दिया कि फूड प्वाइजनिंग के कारण उनकी तबियत खराब है। 

बहरहाल, भाजपा ने दलित नेता रामदास अठावले की पार्टी को अपने साथ बनाए रखने के लिए उनको राज्यसभा में लाकर केंद्र सरकार में मंत्री बनाया है। बताया जा रहा है कि उनकी पार्टी को दो सीटें मिलेंगी और पुराने फार्मूले के तहत 24 सीटों पर भाजपा और 22 लोकसभा सीटों पर शिवसेना लड़ेगी। पर असली संकट विधानसभा सीटों का है। माना जा रहा है कि महाराष्ट्र में दोनों चुनाव साथ होंगे। राज्य की 288 विधानसभा सीटों में से भाजपा 122 पर जीती है। शिवसेना अकेले लड़ कर 62 सीटों पर जीती है। अगर लोकसभा में पुराना फार्मूला लागू हुआ तो वह विधानसभा में भी पुराने फार्मूले के हिसाब से अपने लिए ज्यादा सीटों की मांग करेगी। विधानसभा सीटों का फार्मूला भाजपा के लिए बड़ी उलझन है। अगर यह नहीं सुलझी गठबंधन संकट में पड़ेगा। 

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