विरोध का शोर लेकिन विपक्ष बेदम!

ममता बनर्जी, सोनिया गांधी, राहुल, अखिलेश, डीएमके, लेफ्ट सभी इन दिनों नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ आंदोलन, प्रदर्शन को हवा देते हुए है। तभी हर कोई विरोध और विपक्षी आक्रामकता को महसूस कर रहा है। लग रहा है मानों मोदी सरकार का ग्राफ डाऊन जा रहा है। इस धारणा को विधानसभा चुनाव के नतीजों और महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस की सरकार के गठन ने बहुत बल दिया है। पर धारणा और हकीकत में बहुत फर्क है। सवाल है कि यदि लोकसभा चुनाव आने वाली मई में हो तो कांग्रेस, बसपा या तृणमूल आदि क्या साल भर पहले वाली स्थिति से अपने को बेहतर पाएगी? कतई नहीं! इसलिए क्योंकि लोकसभा चुनाव व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जनता की सोच के फैसले और विधानसभा के चुनाव में दिन-रात का अंतर बन गया है। अरविंद केजरीवाल और उनकी आप पार्टी भले दिल्ली विधानसभा चुनाव जीत जाए लेकिन लोकसभा चुनाव साथ हो रहे होते तो अभी भी एक लोकसभा सीट आप पार्टी जीतने की स्थिति में नहीं है। यह तब संभव है जब आप और कांग्रेस मिलकर भाजपा के खिलाफ साझा लोकसभा उम्मीदवार उतारे! नई दिल्ली की विधानसभा सीट अरविंद केजरीवाल वापिस जीत सकते है लेकिन नई दिल्ली की लोकसभा सीट नहीं। इस लोकसभा सीट पर केजरीवाल भी मुकाबले में तब आएगें जब आप और कांग्रेस में एलायंस हो!

इसलिए सीएए, एनपीए या एनआरसी के खिलाफ आंदोलन का शोर विपक्ष में दम लौटने का पर्याय नहीं है। उलटे लग रहा है कि मोदी-शाह विपक्ष को बांटने की चुपचाप नई बिसात बिछा रहे है। दिल्ली के आगामी चुनाव में विपक्ष का वोट कुछ ज्यादा बटेगा। मुस्लिम बहुल सीट पर मुसलमान के लिए आप बनाम कांग्रेस में से एक को चुनने की दुविधा बनेगी। उत्तर प्रदेश, बिहार में याकि उत्तर भारत की तिकोनी-चौकोनी लड़ाई वाली सीटों पर मुसलमानों के बीच कांग्रेस का ग्राफ बढ़ सकता है तो मायावती, अखिलेश, केजरीवाल, जैसे क्षत्रपों के लिए दिक्कत होगी। तभी मायावती बहुत आक्रमकता से कांग्रेस के खिलाफ वैसे बोलने लगी है जैसे भाजपा बोलती है।

इस सबको याकि नागरिकता के मसले में विपक्ष को मुस्लिम वोटों में फंसाने, मुस्लिम वोटों के बीच आपस में प्रतिस्पर्धा, एक-दूसरे को काटने वाला मोदी-शाह का जाल भी मान सकते हंै। कुछ क्षत्रपों को भाजपा चुपचाप शह दे रही है। इसी सप्ताह प्रधानमंत्री मोदी कोलकत्ता गए और नागरिकता मसले पर लगभग हर रोज प्रदर्शन और आंदोलन को हवा देने वाली ममता बनर्जी उनसे मिलने गई लेकिन इस मुद्दे पर सोनिया गांधी की बुलवाई विपक्षी पार्टियों की बैठक में वे नहीं गई। इसका अर्थ है कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल और भाजपा चुपचाप इस रजामंदी का खेल रचे हुए है कि ममता तमाम मुस्लिम-सेकलुर-जनवादियों की ताकत इकठ्ठी किए रहे तो दूसरी तरफ हिंदूओं, बाग्लां हिंदू शरणार्थियों का नेतृत्व भाजपा पाए। तभी इस मौन राजनीति में राज्यसभा में नवीन पटनायक की पार्टी की तरह का तृणमूल का भी मोदी सरकार को सहयोग होता है तो भाजपा ने उन मुकुल राय को अभी तक उनको उनके कद के माफिक पद या ममता बनर्जी के आगे उन्हे प्रोजेक्ट करने का फैसला नहीं लिया है क्योंकि ममता बनर्जी उनसे सर्वाधिक खुन्नस रखती है।

तय माने कि बंगाल के अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और लेफ्ट लगभग जीरो वाली स्थिति में होंगे। कांग्रेस और लेफ्ट एलायंस बना कर चुनाव लड़े तब भी और तृणमूल बनाम भाजपा के सीधे मुकाबले में भाजपा मजे से एक-तिहाई सीटे जीती हुई होगी। वह भी नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदेश में घनघोर विरोध के बावजूद! ऐसी ही मौन रणनीति यूपी में मायावती से बनी लग रही है। भीम सेना के चंद्रशेखर आजाद और मुस्लिम विरोध में अपने आपको वे जैसा बेगाना पा रही है तो आगे वे भाजपा की मदद में वोट काटने वाली एप्रोच लिए हुए होगी। पूरे उत्तर भारत में विपक्ष के वोट काटने में बसपा का स्थाई रोल बन रहा है तो औवेसी की मुस्लिम पार्टी का भी बना है।

इसलिए मोदी सरकार के खिलाफ हल्ला, विपक्ष की राजनीति बिना साझा सकंल्प के है, बिना एकजुटता के है और नौजवानों के मैदान में उतरने की नई हकीकत के बावजूद बिना दम के है। बिना धुरी, बिना लीडरशीप के है। आज भी वह सवाल जस का तस है कि नरेंद्र मोदी के आगे विपक्ष से कौन? क्या राहुल गांधी? क्या शरद पवार या ममता बनर्जी? कई लोग नौजवानों-छात्रों के विरोध में जेपी आंदोलन की झांकी बूझते है लेकिन यह ध्यान रहे कि जेपी का आंदोलन उत्तर भारत के प्रमुख विरोधी दलों के साझे से, नेताओं की सामूहिकता से, जन-जन के महंगाई- भ्रष्टाचार के मुद्दे में आंधी बना था जबकि फिलहाल नागरिकता का वह मसला है जिससे बहुसंख्यक आबादी और नौजवान अप्रभावित है। तभी दिल्ली में आप और कांग्रेस में विपक्ष के वोट बंटने या मुस्लिम वोट कांग्रेस की तरफ गोलबंद होने के कयास के बावजूद आप पार्टी के जीतने को अनुमान है। मतलब नागरिकता के मुद्दे से निरपेक्ष बहुसंख्यक वोटों का संभव रूझान। इसमें भाजपा फायदा उठाएगी तो आप भी हिंदू वोट पाएगी। इसलिए विरोध, आंदोलन का माहौल जेपी आंदोलन जैसी तासीर वाला कतई नहीं है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares