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तो अब कैबिनेट फेरबदल?

हां, वक्त है। मगर क्या जरूरत है?  यह अलग मसला है। इसलिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अकेले ही पूरी तरह समर्थ है। उन्होंने सवा सौ करोड़ लोगों का वह गोवर्धन पर्वत खुद अपनी ऊंगली पर उठाया हुआ है जिस पर मंत्री, अफसर, नेता, पार्टी सहित पूरी जनता बैठी हुई है। इसलिए कैबिनेट को ले कर सोचने की जरूरत भला क्या बनती है?  वे ही जब काम कर रहे हैं और उन्हें ही करना है तो मंत्रिमंडल में खाली जगह या कायाकल्प जैसी जरूरत बनती नहीं है। बावजूद इसके वक्त इसलिए है क्योंकि फिर प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष दोनों को पूरी तरह गुजरात के चुनाव में जुटना है। सरकार के तीन साल हो गए है। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति अपने बन गए है। संसद का बजट, मानसून सत्र निपट गया है। जीएसटी वाला काम भी हो गया। पंद्रह अगस्त का लालकिले का भाषण परसो हो जाएगा। फिर त्योहारी मौसम, श्राद्व पक्ष, दशहरा-दीपावली का वक्त है। सो हिसाब से यह सप्ताह या अगस्त का महीना प्रधानमंत्री नरेंद्र-मोदी-अमित शाह के लिए यह विचार का मौका है  कि 2019 तक के विधानसभा चुनावों -लोकसभा चुनाव के नाते दिल्ली की सत्ता में ऐसे कैसे चेहरे बदले जाए जिससे सियासी मैसेज बने व पकड़ और पुख्ता बने। 

सो आगे के मुख्यमंत्री वाले कुछ चेहरे पदोन्नति पा सकते है। रक्षा- वित्त, गृह और विदेश में चेहरों की अदला बदली भी संभव है। हालांकि इन चार के मामले में अपना मानना है कि गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद अंतिम तौर पर तय होगा। इसलिए यदि कैबिनेट फेरबदल होती है तो स्वतंत्र प्रभाव वाले राज्य मंत्रियों और चार टॉप के बाद के मंत्रालयों में फेरदबल अधिक मुमकीन है। हिसाब से इस सप्ताह एआईडीएम की राजनीति भाजपा के साथ नत्थी होगी। जनता दल यू के नीतीश कुमार वैसे ही नत्थी हो गए है। सो यह कैबिनेट एनडीए के कुनबे के बढ़ने की हवा लिए हुए भी होगा। 

क्या फेरबदल में मंत्रियों के काम की समीक्षा जैसी कोई कसौटी होगी? मुश्किल है। उससे ज्यादा सियासी मैसेज, प्रदेशों की गणित और वफादारी की कसौटी में ही ताश के पत्ते फेंटे जाने है। 

संदेह नहीं कि मई 2014 में कैबिनेट गठन के बाद का यह सबसे बड़ा फेरबदल होगा। यह तर्क बनता है कि सरकार के आधे कार्यकाल और दिल्ली की सत्ता व देश की राजनीति पर पूरी पकड़ के बाद नरेंद्र मोदी-अमित शाह कैबिनेट को इस तरह खंगाल डाले कि मई 2019 तक फिर कुछ न हो। 

उस नाते गौरतलब बात यह होगी कि मई 2014 में अरुण जेटली ने कैबिनेट जैसे बनवाया था, उन्होने जिस निर्णायकता से अपनी टोली को मंत्री पद दिलवाए थे उनका वही जलवा फेरबदल में दिखेगा या नहीं? यों उनकी टोली में कईयों ने पाला बदल लिया है। रामनाथ कोविंद और वेंकैया नायडू का फैसला उनके संज्ञान में नहीं हुआ था। बावजूद इसके अरुण जेटली का मतलब गंभीर है। वे वीटो करने की स्थिति में है। उन्हंे न बदला जा सकता है और न हटाया जा सकता है। वे अनिवार्यता है पर अपनी टोली को भी अनिवार्य बनाए रखे रहे यह शायद संभव नहीं है। 

जो हो, सुषमा स्वराज, राजनाथसिंह, अरुण जेटली, पीयूष गोयल, अनंत कुमार, िनतिन गडकरी, धर्मेंद्र प्रधान, जेपी नड्डा वे नाम हैं जो फेरबदल में यदि प्रभावित हुए तो समझ आएगा कि आगे की तस्वीर क्या बन रही है? अमित शाह अनिवार्यतः कईयों का फैसला करवाएंगे। 

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