फीलगुड या फेंकू बजट?

अंतरिम बजट 2019 को आम चुनाव से पहले का मोदी सरकार का अंतिम ब्रहास्त्र माना जाना चाहिए! प्रयागराज में धर्मसंसद के साथ बजट का संदेश कुल मिला कर भाजपा का चुनावी बिगुल है। तभी सवाल है कि यह ब्रहास्त्र अगले 80 दिनों में फर्जी-फेंकू-फूका कारतूस साबित होगा या मोदी सरकार की वाह का माहौल बनाएगा? मौटे तौर पर फिलहाल माहौल है कि वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने खजाना खोला। किसान के लिए, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, मध्य वर्ग को खजाना लूटा दिया।

तो क्या अगले 80 दिनों में किसान, मजदूर, मध्यवर्ग की जेब में पैसा पहुंचा हुआ होगा? पहली बार सरकार ने पिछली तारीख से पैसा बांटने का ऐलान किया है। मतलब पांच एकड़ जमीन वाले छोटे-मझौले किसान को पांच सौ रुपए महीने की रेट पर मार्च में दिसंबर 2018 के बाद के चार महीनों के दो हजार रुपए बैंक में जमा करा सकती है। क्या यह संभव है? क्या सरकार के पास ऐसे अनुमानित 12 करोड किसानों के नाम-पते- बैंक खाते है जो यह पैसा मार्च तक ट्रांसफर हो? 

अपने को संभव नहीं लगता। और यदि ऐसा नहीं होता है तो क्या पूरा बजट फेंकू-फर्जी प्रमाणित नहीं होगा? यही लाख टके की बात है कि मोदी सरकार को मार्च में आचार संहिता की घोषणा या चुनाव प्रचार के बीच लोगों के बैंक खातों में पांच सौ, हजार-दो हजार रुपए जमा कराने है। यदि ऐसा नहीं होता है तो जैसे काले धन का 15 लाख रुपए जमा करने के वायदे का मजाक व धोखा बना था वैसा ही वोटिंग से ठीक पहले बजट में हुई घोषणाओं का मजाक लिए हुए होगा। 

अपना मानना है कि राम मदिंर और बजट मोदी सरकार और भाजपा की नीयत के सबसे बड़े है। ले दे कर बार-बार सवाल बनता है कि नरेंद्र मोदी पर भरोसा, विश्वास किया जाए या नहीं? कल तक नरेंद्र मोदी और सरकार का पूरा नैरेटिव इस बात पर था कि सबका साथ, सबका विकास है। अब नैरेटिव और प्रचार होगा कि हम गरीब किसान को पांच सौ रू महिने दे रहे है। फारवर्ड को आरक्षण दे रहे है। मध्यवर्ग की टैक्स देनदारी पांच लाख रुपए महीने बाद की बनेगी। गरीब का आयुष्मान से फ्री इलाज हो रहा है औ गरीब घरों में उज्जवला के फ्री- सस्ते सिलेंडरों से रोटी बन रही है।

जबकि अनुभव अलग है। सो हल्ले का अनुभव का गेप और बढ़ना है। हकीकत बताती रपटें है कि सिलेंडर मंहगे होने से कचरे में पड़े हुए है। आयुष्मान कार्ड लिए लोगों को अस्पतालों से लौटा दिया जा रहा है। फारवर्ड को दस प्रतिशत आरक्षण फूका कारतूस है तो पांच लाख रुपए तक इनकम टैक्स माफ और किसान को 6 हजार सालाना नकद मदद 24 घंटे के भीतर ही यह बहस लिए हुए है कि इससे ज्यादा तो तेलंगाना और ओडिशा किसानों को मदद दे रहे है।     

यही नहीं इनकम टैक्स में रियायत में भी यह झोल है कि टैक्स ब्रैकेट 2.50 लाख रुपए से 5 लाख रुपए नहीं हुआ है। टैक्स रीबेट मिलेगा 5 लाख रुपए की कुल आय वाले करदाता पर जो पहले 3.5 लाख रुपए की सीमा में बंधा हुआ था। 

सो मध्यवर्ग दिमाग खंपाए रहेगा कि उसे क्या मिला तो किसान में असली किसान, बटाईदार, खेतीहर मजदूर यह सोचते हुए ठगा महसूस करेगा कि जो सचमुच मरा हुआ है उसे कुछ नहीं। तभी 24 घंटे के भीतर ही उत्तर प्रदेश के किसान दिल्ली का मार्च करते हुए रूके नहीं और किसान संगठनों- कृषि विशेषज्ञों ने बजट में किसान संबंधी घोषणा को मजाक बताया। जले पर नमक छिड़कना कहां। कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी ने बहुत पते की बात लिखी कि 6 हजार रुपए के हिसाब से 72 हजार करोड़  रुपए बांटने की घोषणा किसान के उस 2 लाख 65 हजार करोड रुपए के नुकसान की भरपाई नहीं है जो कम खरीद दाम जैसे कारणों से किसान ने झेला है। नरेंद्र मोदी ने 2016 में किसानों की आय को दोगुना बनाने का वायदा किया था। मगर चार सालों में कृषि पैदावार की उपजों के दाम मुद्रीस्फीति की रेट से भी कम 3-4 प्रतिशत रेट से ही बढ़े। ऐसा देश की आजादी के बाद शायद तीसरी बार हुआ है। मतलब किसान को सचमुच पांच सालों में कमाई नहीं हुई वह कंगला, बरबाद हुआ है।  

जाहिर है छह हजार रुपए सालाना मदद की प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधी की घोषणा का जितना प्रचार होगा वह गांव- देहात में उलटे माहौल बनाएगा कि पैसा कहां आ रहा है या फलां किसान के खाते में दो हजार रुपए आए है तो कास्तकारों, खेतीहर मजदूदों, बंटाईदारों का यह रोना बढ़ेगा कि यह क्या तमाशा है। किसान की बदहाली को हाईलाइट करवा कर मोदी सरकार उलटे घाव गहराने वाला काम करने वाली है।  सो जिन मतदाताओं पर बजट में टारगेट किया गया है उन्हीं में विश्वास का संकट और बढ़ेगा। तभी एप्रोच खजाना लुटाने की नहीं होनी चाहिए थी बल्कि बजट में बताना था कि चार सालों में आपको कितना अमीर बना दिया गया। पर वह भी संभव नहीं था। किसान बरबाद हुआ, लोगों की जेबों से पैसा खत्म हुआ, बेरोजगारी, काम-धंधे-किसानी बरबाद  हुई तब फुलझडी-झुनझुनों से ही बहलाने का काम हो सकता था और वही हुआ। इसलिए मार्च में चुनाव घोषणा होगी तो इसी बात पर लड़ाई बनेगी कि नरेंद्र मोदी फेंकू है या सच्चे? 

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