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आरएसएस में निचोड़-अहंकार!  

क्या‍ नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने आरके सिंह को मंत्री बनाने का फैसला आरएसएस से पूछ कर किया? अपने को नहीं लगता। अपने जितने सूत्र, जानकार हंै उनके अनुसार संघ का नरेंद्र मोदी-अमित शाह से मोहभंग है। केवल इतना भर है कि नरेंद्र मोदी को जब जरूरत होती है तो मोहन भागवत से बात करते हंै। संघ के कुछ पदाधिकारियों में चर्चा चली हुई है कि नरेंद्र मोदी ने उन्हे बताया कि मुझे सरकार चलाने में टालेंट की कमी से दिक्कत हो रही है। पार्टी में टालेंट की भारी कमी है इसलिए मुझे कुछ करना होगा। 

इससे ज्यादा कोई बात नहीं हुई। संघ में भाजपा के प्रभारी गोपाल कृष्ण का इस मामले में वही रोल रहा जो संगठन मंत्री रामलाल का है। मतलब जरूरी हुआ तो अमित शाह ने बता दिया कि फंला से बात कर लें। जैसे संभव है कि उमा भारती के मामले में कृष्णगोपाल, नितिन गडकरी को लगाया हो कि आप बात कर लीजिएगा। यह भी फर्जी और फैलाया झूठ है कि अमित शाह ने मथुरा की बैठक में जा कर विचार-विमर्श किया। संघ के एक जानकार ने तो इस बार यह भी बताया कि अमित शाह से भी संघ का मोहभंग हुआ है। इस बार बैठक में उन्हे आठवीं कतार में बैठाया गया! 

ऐसे ही यह फालतू बात थी कि राजनाथ सिंह के यहां सुषमा, जेतली, गडकरी ने जा कर केबिनेट की फेरबदल पर विचार किया और रक्षा मंत्री की खाली जगह के लिए अपने लिए आए प्रस्ताव पर सोचा। सब फालतू बाते हैं। निर्मला सीतारमण, आरके सिंह व अन्य अफसरों को मंत्री बनाने और पदोन्नति के फैसले में दो के अलावा तीसरे का और संघ का दूर-दूर तक मतलब नहीं था।  

नोट करके रखें कि चार आला मंत्रालयों के बीच निराकार निर्मला सीतारमण को बैठा, और सरकार-सगंठन के बीच भरोसे से तरह-तरह के प्रबंधन करने वाले अपने बच्चे माफिक धर्मेंद्र प्रधान, पीयूष गोयल का ऊंचा दर्जा बनवा कर मोदी-शाह ने मैसेज दे दिया है कि बस 2019 तक मर्यादा और सम्मान है। फिर तो न राजनाथसिंह होंगे, न ग़डकरी होंगे और न अनंत कुमार और न शिवराजसिंह चौहान या रमनसिंह। 

फिर लालूलीकरण की प्रक्रिया की पूर्णता वाला लालू का सौ टका दरबारी केबिनेट होगा! मतलब जैसे लालू के पांच साल के पहले टर्म से बाद दूसरे टर्म में जो हुआ था। 

मौटे तौर पर संघ में यह बात समझ आ रही है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि संघ में या संघ के पदाधिकारियों में अपनी सत्ता के प्रति मोह नहीं है। चेहरों से भले मोहभंग है पर सत्ता से यथावत मोह है। इसलिए जैसा चल रहा है वैसा चलेगा। मतलब रिश्तों का जो गुजरात मॉडल बना है वह चलता रहेगा। गुजरात में नरेंद्र मोदी जैसे प्रचारक सीएम रहते हुए भी संघ को अपने प्रचार में लगाए रहते थे, उससे अपनी सेवा करवाते थे और जो चाहते थे वह करते थे वही अब है और आगे रहेगा।

सवाल है और लाख टके का है कि मोहन भागवत, सुरेश भैय्याजी जोशी, दत्तात्रेय होंसबोले, कृष्ण गोपाल, सुरेश सोनी या संघ के बड़े संगठनों के आला पदाधिकारी किस भाव नरेंद्र मोदी को फिलहाल तौलते हंै? केबिनेट की ताजा फेरबदल को इन्होने किस भाव लिया होगा? वाह के भाव में, निराशा से या गुस्से के भाव में?  

हिसाब से निराकार भाव बन गया है। मतलब समझ लिया है कि नरेंद्र मोदी जैसे है वैसे रहेंगे। अंहकार वे छोड़ेगंे नहीं। अपने को बदल सकते नहीं। इसलिए जो होगा वह तय है तो वे जाने और अमित शाह जाने। अपने को तो अपना काम करना है!

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