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जंग में है राष्ट्र!

हां, यही आज के भारत की हकीकत है और सालों तक बनी रहेगी। भारत के सवा सौ करोड़ लोग दैनंदिनी वाले सामान्य वक्त, राजनीति, हुकूमत में नहीं जी रहे हैं बल्कि उस जंग के बीच है, गवाह है उस दौर के जिसमें कश्मीर से केरल तक गुजरात से अरुणांचल तक एकछत्र हुकूमत बनाने का युद्ध छिड़ा हुआ है। इस जंग का मकसद है उन लोगों का दिमाग ठीक कर देना जो जयचंद है, विधर्मी और राष्ट्रद्रोही है। सो पाकिस्तान और चीन की बाह्य लड़ाई से गंभीर लड़ाई देश के भीतर में है। अब इसे गृहयुद्ध इसलिए नहीं कहेंगे क्योंकि जयचंद अधमरे है। वे बिना औजारों के दिख रहे हंै तो उनके समर्थक विधर्मी बिलों में दुबके हुए हंै। उनका दुबका होना भविष्य का खटका है। तभी जंग का सिनेरियों पंद्रह-बीस साल का दीर्घकालिक है। यह भी संभव है यही इतिहास का अकल्पनीय मोड़ हो।  

इस जंग में तात्कालिक लक्ष्य यह दिख रहा है कि लोकतंत्र ने जो जयचंद पैदा किए है, राष्ट्रद्रोही-इस्लामपरस्त ताकते जो पैदा की है उनका समूल खत्म हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी-भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भारत की समस्याओं की मूल जड़ बूझते हुए यह जतलाया हुआ है कि कांग्रेस मुक्त हुए बिना भारत सोने की चीड़ियां नहीं बनेगा। अब कांग्रेस का मतलब ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, लेफ्ट, लालू यादव, शरद पवार आदि सब इसलिए है क्योंकि सबके वोट आधार में मुसलमान है। इनका यह आधार ही यह थीसिस है कि पहली जरूरत जयचंदों के खिलाफ सतत जंग करके उन्हें खत्म करना है तभी तो गौरी की जमात को मौका नहीं मिलेगा। तभी हर दिन के भारत विमर्श, नैरेटिव में, टीवी चैनलों-मीडिया में बात सिर्फ और सिर्फ जयचंदों की पतित दास्तां लिए होती है। उनसे चिपटे वोटों के लिए एक इंच जगह न छूटने देने की है।

सो चाहे तो आप यह निष्कर्ष बना सकते है कि राष्ट्र को अंदर से भी बाहुबली बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने अपने अश्वमेघ यज्ञ का लक्ष्य सटीक सोचा है। विपक्ष खत्म होगा तभी हिंदू अपने जयचंदों से मुक्ति पाएंगे! तभी लोकसभा में, राज्यसभा में भाजपा का दो-तिहाई बहुमत बनेगा। संविधान को जयचंदी धाराओं से मुक्ती दिलाई जा सकेगी। मंदिर बन सकेगा। कॉमन सिविल कोड लाया जा सकेगा। कश्मीर से केरल तक विधर्मियों ने नाक में जो दम किया हुआ है उन्हंे खत्म किया जा सकेगा। 

सो जंग के मैदान में प्रत्यक्ष में सामने विपक्ष है और अप्रत्यक्ष में लोकतंत्र की आबोहवा में पैदा वे तमाम तत्व है जिन्हंे बुद्वीजीवि, स्वतंत्रचेता समाज, एनजीओं, मीडियाकर्मी, सेकुलरवादी या किस्म-किस्म के विरोधी कहा जा सकता है। मतलब यह भी कि हिंदूओं के ही आमने-सामने होने का मैदान-ए-जंग है। तभी शाम को जब आप टीवी चैनल देखते है तो उसमें विमर्श हिंदू जयचंदों के पापी होने का मिलता है। 

फिर जंग के इस मैदान में भारत के वे लोग भी है जिन्हंे ठोंक-ठोंक कर सुधारना इसलिए जरूरी है क्योंकि ये पैसा दबा कर बैठने वाले लोग है। टैक्स चोर है। भारत की संसद में ऑन रिकार्ड मोदी सरकार ने घोषित किया हुआ है कि ये जो लोग है वे कारे खरीदते हैं, विदेश घूमते हैं लेकिन टैक्स नहीं देते। सवा सौ करोड़ में से तीन करोड़ ही टैक्स देते है सो बाकि सबको ईमानदार बनाना, लाइन में लाना जंग का स्वभाविक दूसरा घोषित मकसद बना दिख रहा है! 

जाहिर है नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने भारी बीड़ा उठाया हुआ है। महाभारत रचा हुआ है। और मजेदार बात है कि भारत के हम लोग अनुभव करते हुए भी समझ नहीं रहे है कि हम जंग के बीच जी रहे है। 

अब इस बात को आप पोजिटिव ले या नेगेटिव, यह आपकी सोच पर निर्भर है। इतना समझ लेना चाहिए कि भारत राष्ट्र-राज्य और सवा सौ करोड़ लोगों का आज वक्त न सामान्य है और न अगले दस-बीस साल रहेगा। जिस जंग के मध्य में हम है वह बहुत लंबी चलेगी और उसका अंत क्या होगा यह सोचना सांप के बिलों में हाथ डालने माफिक है। 

फिलहाल इतना समझना चाहिए कि जब जंग है तो सब जायज है। जो होगा वह एक्सट्रीम ही होगा। नोटबंदी एक्स्ट्रीम थी तो सीबीआई, आईटी, ईडी की छापेमारी से ले कर राहुल गांधी की कार पर पत्थर फेंकने, मीडिया को गुलाम बनाने के तरीके उस सेना के लिए इसलिए सटीक है क्योंकि युद्ध में सब जायज है। 

यह तय हुआ पडा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और राष्ट्रवादी हिंदूओं को 2019 या 2024 तक विपक्ष मुक्त भारत बनाना है। अब जब जंग इतनी दो टूक है तो फिर हथियारों के उपयोग में शर्म क्यों हो? क्यों जंग को सामान्य लोकतांत्रिक तरीकों से लड़ा जाए? दुश्मन को, जयचंदो ंको तो बाई हुक, बाई क्रूक मारना है। तभी नरेंद्र मोदी को, अमित शाह को यह परवाह नहीं है कि तीन साल में उन्होने क्या इमेज प्राप्त की। वे विजेता युद्धवीर के गर्व में नहीं देख पा रहे है कि लोकतंत्र के आईने में उनका चेहरा, भाव-भंगिमा अब कैसी दिखाई देती है! भूल गए है कि 21 वी सदी राजाओं की नहीं है लोकतंत्र की है। लोकतंत्र का आईना ही इतिहास का आईना होगा। और यह आईना बिना जिंदा विपक्ष के आपका इतिहास क्या लिखेगा, इस पर वे सोचने की स्थिति में इसलिए नहीं है क्योंकि तलवार का नशा भयावह हुआ करता है। 

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