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गठबंधन नहीं, गुपचुप रजामंदी!

हरि शंकर व्यास
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यों एक साल बाकी है पर त्रिपुरा के चुनाव ने विपक्षी नेताओं में आपातकाल एसओएस, अरजेंसी बनवा दी है।  2019 के लोकसभा चुनाव की विपक्षी बिसात बिछने लगी है। मामूली बात नहीं जो ममता बनर्जी ने कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी को राज्यसभा उम्मीदवार बनाया। मतलब ममता बनर्जी ने अब कुछ उसी अंदाज में महागठबंधन की राजनीति शुरू की है जैसी नीतीश कुमार – लालू यादव ने चुनाव में भाजपा को रोकने के लिए बिहार में की थी। पर फिर सवाल है कि तब बंगाल में लेफ्ट ने अपना राज्यसभा उम्मीदवार क्यों उतारा? क्यों वह इस कोशिश में अभी भी है कि तृणमूल और कांग्रेस से दूरी बताए?

ऐसी ही कुछ स्थिति उत्तरप्रदेश में भी दिखी है। समाजवादी पार्टी और बसपा में उपचुनाव का गठजोड़ हुआ लेकिन कांग्रेस ने अलग उम्मीदवार खड़ा किया तो अखिलेश यादव और मायावती ने खुल कर साझा उम्मीदवार के लिए समर्थकों को आव्हान नहीं किया। 

 

सो लगता है विपक्ष के नेता पुरानी ग्रंथियों के मारे हंै तो कुछ होशियारी भी झलका रहे हंै? इसमें सर्वाधिक हैरानी वाली मामला उत्तरप्रदेश का है। एक तरफ गोरखपुर और फूलपुर के प्रतिष्ठा वाले लोकसभा उपचुनाव में सपा और बसपा में सहमति बनी। सपा उम्मीदवारों को जीताने के लिए बसपा कार्यकर्ता लगे हुए हैं लेकिन अखिलेश- मायावती मौन रहे। न ही मायावती राज्यसभा उम्मीदवार बनी। यदि मायावती चाहती तो सपा उम्मीदवार को समर्थन के बदले यूपी राज्यसभा में सपा की पक्की नौवीं सीट पर उम्मीदवार बन सकती थीं। अखिलेश यादव मजे से जया बच्चन की बजाय उनके लिए तैयार होते। लेकिन मायावती ने ऐसा नही सोचा और दसवीं हारने वाली सीट पर बसपा उम्मीदवार उतारा। उसे सपा, कांग्रेस, अजितसिंह का उम्मीदवार वोट देता है तो उम्मीदवार भले हारे, आगे के लिए इन पार्टियों में मौन रजामंदी बनेगी।

सो बंगाल में लेफ्ट का दिखावे के लिए अलग रहना और यूपी में कांग्रेस का अलग रहना मतलब वाला है। विपक्षी नेता यह मैसेज नहीं बनने देंगे कि भाजपा को, नरेंद्र मोदी को हराने के लिए सब गोलबंद, एकजुट हो रहे हैं। विपक्ष अपने आपको बिखरा दिखाएगा तो राज्य की स्थिति अनुसार आपस मे लड़ने वाले मुख्य प्रतिस्पर्धी भाजपा विरोधी एलायंस बनाएंगे। बंगाल में तृणमूल और कांग्रेस का एलायंस अपने आपमें बहुत है तो ऐसे ही कुछ सीटों पर कांग्रेस, अजित सिंह से गुपचुप सहमति के साथ सपा-बसपा में एलांयस बने तो यूपी में कांटे की लड़ाई वाला चुनावी माहौल बनेगा ध्यान रहे ये दो ही राज्य 122 सीटे लिये हुए है। इन दो राज्यों में प्रमुख विपक्षी का तालमेल अपने आपमें बहुत बड़ी बात होगी।  

इन दो के बाद तीसरा उलझा राज्य केरल है जहां कांग्रेस और लेफ्ट में सहमति नहीं होगी और तिकोने मुकाबले में भाजपा के मजे होंगे। बाकि तमाम राज्यों में या तो भाजपा बनाम कांग्रेस के सीधे मुकाबले की तस्वीर बन रही है या भाजपा बनाम दो प्रमुख विपक्षी दलों के तालमेल से लड़ाई की बिसात बिछ ली लगती है। यही बंगाल और यूपी का संकेत है।

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