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पीएम पद का विपक्षी झंझट खत्म 

विपक्ष का प्रधानमंत्री पद का दावेदार पेश करने का विवाद लगभग सुलझ गया है। ध्यान रहे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कर्नाटक के चुनाव प्रचार के समय सवाल-जवाब में अपनी दावेदारी की बात करके देश भर के क्षत्रपों की धड़कन बढ़ाई थी। फिर कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में राहुल की दावेदारी की चर्चा करके पार्टी ने क्षत्रपों की परीक्षा लेने का दांव चला। पर इस दांव पर एचडी देवगौड़ा को छोड़ कर किसी की सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली। यहां तक की राजद के तेजस्वी यादव ने भी कहा कि विपक्ष में प्रधानमंत्री पद के अकेले योग्य नेता राहुल गांधी ही नहीं हैं। 

इसके बाद कांग्रेस ने दूसरा दांव चला। उसने राहुल की दावेदारी छोड़ कर क्षत्रपों को आपस में भिड़ा दिया। कांग्रेस ने कहा कि ममता बनर्जी या मायावती में से कोई भी प्रधानमंत्री बने कांग्रेस को दिक्कत नहीं है। कांग्रेस के इस रुख से प्रादेशिक पार्टियों में होड़ मच गई। तृणमूल के नेता कहने लगे कि ममता स्वाभाविक दावेदार हैं। तो बसपा के नेता भी मायावती को स्वाभाविक दावेदार बताने लगे। क्षत्रपों की आपस में बढ़ी इस दावेदारी का नतीजा यह हुआ कि अब सब कहने लगे हैं कि प्रधानमंत्री पद का दावेदार कोई नहीं होगा। विपक्ष एकजुट होकर लड़ेगा और अगर सरकार बनाने की स्थिति बनती है तो उस समय प्रधानमंत्री चुना जाएगा। 

कांग्रेस भी यहीं चाहती है। सो, अब कांग्रेस के नेता खुश हैं कि उनकी रणनीति कामयाब हो गई। उनका दांव चल गया। कांग्रेस को पता है कि इस समय कोई भी क्षत्रप ऐसा नहीं है, जिसका चेहरा आगे करके विपक्ष नरेंद्र मोदी को चुनौती दे सके। जैसे ही विपक्ष की ओर से कोई चेहरा आगे किया जाएगा वैसे ही मोदी की बढ़त हो जाएगी। ममता बनर्जी हों या मायावती, राहुल गांधी हों या शरद पवार, एचडी देवगौड़ा हों या चंद्रबाबू नायडू या कोई और किसी के चेहरे से मोदी को चुनौती नहीं दी जा सकती है। कोई भी चेहरा आगे किया गया तो फिर मोदी के पांच साल के कामकाज की बजाय दो चेहरों पर फोकस होगा, जिसमें प्रचार से लेकर विश्वसनीयता तक हर मामले में मोदी भारी पड़ेंगे।  

तभी एकजुट विपक्ष बिना चेहरा आगे किए लड़ने की तैयारी कर रहा है। विपक्षी पार्टियों के बीच तालमेल भी राष्ट्रीय स्तर की बजाय राज्यों की जरूरत के मुताबिक होगा। कांग्रेस के जानकार सूत्रों का कहना है कि अगले चुनाव की रणनीति बहुत आसान नहीं है और न चुनाव बहुत सीधा सादा होने जा रहा है। उनका मानना है कि इस बार कांग्रेस के पीछे रहने की रणनीति ही कामयाब होगी। 

कांग्रेस के एक जानकार नेता के मुताबिक समूचा विपक्ष एकजुट हो जाए तब भी भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी बनने से नहीं रोका जा सकता है। हर हाल में भाजपा को सबसे ज्यादा सीटें मिलेंगी। कांग्रेस को यह भी लग रहा है कि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होगी तो उसे रोकने के लिए कांग्रेस को कर्नाटक की तरह का दांव चलना होगा। पर केंद्रीय स्तर पर कर्नाटक के प्रयोग में भाजपा को 50-50 के चांस लग रहे हैं। उनका कहना है कि सबसे बड़ी पार्टी बनी तो भाजपा को रोकना मुश्किल होगा। तभी यह भी लग रहा है कि विपक्षी पार्टी समानांतर रूप से भाजपा की बजाय नरेंद्र मोदी को रोकने की रणनीति पर भी काम कर रही हैं। 

संसद के चालू सत्र के दौरान टीडीपी के एक वरिष्ठ सांसद ने मीडिया के सामने इस बात का जवाब नहीं दिया कि उनकी पार्टी अगले चुनाव के बाद भाजपा का समर्थन करेगी या नहीं। वे बार बार यह कहते रहे कि मोदी को रोकना है। उनसे पूछा जा रहा था कि वे चुनाव के बाद भाजपा का समर्थन करेंगे या नहीं तो उनका जवाब होता था मोदी को रोकना है। जाहिर है कि कई पार्टियां ऐसी हैं, जो भाजपा से ज्यादा बड़ा खतरा कांग्रेस को मानती हैं और माइनस मोदी उनको दोनों पार्टियों में से चुनना हो तो वे भाजपा को चुनेंगी।

अगर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनती है तो कई प्रादेशिक क्षत्रप हैं, जो उसको सरकार बनाने के लिए समर्थन दे सकते हैं। पर उनकी शर्त होगा कि प्रधानमंत्री किसी और को बनाया जाए। अगर भाजपा सरकार बनाने के लिए प्रधानमंत्री बदलने को राजी हो जाए तो टीडीपी से लेकर बीजू जनता दल और डीएमके तक को उसकी सरकार बनवाने में कोई दिक्कत नहीं होगी। लेकिन अगर पूर्ण बहुमत नहीं मिला, भाजपा सबसे बड़ी पार्टी रही और नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने पर अड़ी तो नीतीश कुमार जैसे समर्थक भी साथ छोड़ेंगे। तब कांग्रेस का दांव चलेगा। तब वह 1996 की तरह किसी प्रादेशिक क्षत्रप को आगे करके सरकार बनवाएगी। 

सो, कांग्रेस की तीन रणनीति है। पहली, अगर भाजपा को बहुमत नहीं मिलता है और वह सबसे बड़ी पार्टी बनती है और किसी नए चेहरे को प्रधानमंत्री बनाने के लिए राजी हो जाती है तो कांग्रेस इसमें ज्यादा अडंगा नहीं डालेगी क्योंकि उसे पता है कि कई क्षत्रप उसकी बजाय भाजपा के साथ ज्यादा सहज हैं। दूसरी, अगर भाजपा मोदी के नाम पर अड़ती है तो कांग्रेस किसी क्षत्रप को आगे करेगी। तब उसे सारे प्रादेशिक क्षत्रपों का समर्थन मिलेगा। तीसरी, अगर खुदा न खास्ते 2004 जैसा नतीजा आ जाए तो कांग्रेस राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की दावेदारी करेगी। लेकिन तब यह होगा कि जो खेल कांग्रेस करना चाहती है वह भाजपा करेगी। वह कांग्रेस को रोकने के लिए किसी प्रादेशिक क्षत्रप को आगे करेगी और उसे समर्थन देकर सरकार बनवाएगी।  

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