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उमा नाकाबिल व निर्मला काबिल!

यों हम-आप व जनता के लिए जांचना फालतू है कि कौन मंत्री काबिल है व कौन नाकाबिल! फिर मैं तो यह थीसिस भी लिए हुए हूं कि नरेंद्र मोदी जब भगवान का अवतार (यह बात उमा भारती ने भी कही हुई है) तो बाकी सब तो आरती उतारने वाले ही हुए। घंटे बजाने, दरबार में यस सर में भला काबिल, नाकाबिल से क्या अर्थ। आपको क्या याद है कि लालू यादव के बिहार मंत्रिमंडल में कौन मंत्री थे? नहीं याद होगा। इसलिए कि जो थे वे अकेले लालू थे। पंद्रह साल लालू ने सामाजिक न्याय के मसीहा, गरीब-गुरबों के भगवान के रूप सत्ता भोगी, आरती उतरवाई तो जनता के लिए भला रघुवंश बाबू, कांति सिंह, कबाब सप्लाई छाप मंत्री, पीकदान उठाने वाले मुख्य सचिव तो बेमतलब के, निराकार थे। भगवान अकेले लालू यादव थे। सामाजिक न्याय के नाम पर वोट दिलवाने वाला लालू यादव अकेला था। उन्होने उतने ही वैभव, ठसके और अंहकार में राज किया था जैसे आज हिंदू राष्ट्रवादियों, गरीब-गुरबों के वोट के नाम पर नरेंद्र मोदी कर रहे हैं। जब ऐसा है तब मतलब क्या जो सोचे कि मोदी केबिनेट में कौन काबिल है या कौन नाकाबिल!

बावजूद इसके मैं विचार कर रहा हूं तो इसलिए कि उमा भारती व निर्मला सीतारमण दो ऐसे कंट्रास्ट हैं जिसने नई थीसिस बनाई है कि 40 साल में दिल्ली में केबिनेट गठन, मंत्रिमंडल फेरबदल के इतिहास में ऐसा अतार्किक, बुद्दीहीन, विचारधारा विरोधी फेरबदल पहले कभी नहीं देखा जैसा नरेंद्र मोदी, अमित शाह ने 2 सितंबर को किया है। केंद्र के केबिनेट का पूरी तरह लालूलीकरण है। बता दूं सब चेहरे मेरे परिचित हंै। अधिकांश के इन-आउट जानता हूं। बहुतों की उनके संकट काल में नैतिक हौसलाबुंलदी भी की है। 

पर इन दिनों इन मंत्रियों के बौने चरित्र, लालूलीकरण के दरबारी बनने से इनके प्रति जुगुप्सा भी पैदा हुई पड़ी है। मैं उमा भारती से साढ़े तीन साल में एक बार नहीं मिला। इसलिए कि मुझमे उनके मुंह से 2014 में सुना यह वाक्य जुगुप्सा पैदा कर गया कि नरेंद्र मोदी ईश्वर अवतार हंै। जो नरेंद्र मोदी का पोर-पोर जानती है। वह यदि एक चुनावी जीत पर ऐसी विवेकहीन बात करें तो क्या जंचेगा? बावजूद इसके जब गंगा सफाई मंत्रालय उन्हे मिला तो यह सोच अच्छा लगा कि गंगा के लिए उन जैसा समर्पित भला दूसरा कौन? उन्होने अन्न छोड़ गंगा की सफाई के लिए ऐसा अनशन किया था कि उनका शरीर ढ़हने के कगार पर था। पर वे डटी रहीं। मैंने तब उनकी चिंता की और जो किया वे जानती हंै। 

बहरहाल मैं बतौर मंत्री उनके काम की खबर रखे हुए था। इसलिए जो हुआ है वह मोदी राज की राजकाज शैली का नंबर एक प्रमाण है। मोदी के प्रधानमंत्री दफ्तर ने उमा भारती को महानिकम्मा प्रमाणित किया। हालांकि कई महीने गंगा मंत्रालय का कायदे से पुर्नगठन नहीं हुआ। पर्यावरण, जल संसाधन के झमेले में पीएमओ खुद पंच बना रहा। सब भटका रहा। फिर प्लान, एजेंडा, अथोरिटी बनी तो चेयरमैन नरेंद्र मोदी और उपाध्यक्ष उमा भारती। जब गंगा सफाई के लिए योजना, पैसा आवंटित हुआ तो वह अटका ही रहा। मैंने नहीं पढ़ा और आपने भी कहीं पढ़ा हो तो याद करें कि साढ़े तीन साल में गंगा सफाई के नाम पर हुआ क्या है? नरेंद्र मोदी को उमा भारती ने भगवान कहा लेकिन भगवानजी और उनका प्रबंधन संभालने वाला अफसरों का प्रधानमंत्री दफ्तर का रोल ऐसा रहा कि उमा भारती जैसी गंगा सफाई का संकल्प लिए जिद्दी, जूनूनी मंत्री भी कुछ नहीं कर पाईं। अपने को पता है कि उमा भारती अफसरों को नहीं गांठती। न ही वे मंत्रालय में रोजाना जा कर बैठती हंै। मतलब सरकारी बाबूओं को पटाना, उनसे काम निकलवाना फितरत नहीं है। अरबों रू बजट में रखे हैं पर संभव है कि उमा भारती ऐसे प्रस्ताव  या सुझाव से चिढ़ी हो कि गुजराती फर्मों ने साबरमती के किनारों को साफ किया है तो गंगा की सफाई के प्रोजेक्ट भी गुजराती कंपनियों को दे दिए जाएं। ऐसे सुन कर ही वे तुनक गई हों और तेवर दिखा कर बैठी रही हों। 

पर यह बात कुछ बेमतलब इसलिए है क्योंकि चेयरमैन, तमाम सचिव जब प्रधानमंत्री दफ्तर को रिपोर्ट करने वाले हो तो उमा भारती का इतना रोल भी कैसे काम रोके रख सकता है। बावजूद इसके तीन साल गंगा पर कुछ नहीं हुआ तो उमा भारती को साधू-संतों से निश्चित बहुत कुछ सुनना पड़ा होगा। सो वे तेंवर दिखाने लगी होगी कि कुछ करो! 

मगर पीएमओ ने हल्ला करा दिया कि वे नाकाबिल हैं। बीमार रहती हैं। इसलिए इस्तीफा हो। और उमा भारती निपट गईं। किसके हस्तक्षेप से और उनके कैसे तेवर दिखाने से वे केबिनेट में बनी रही हैं, यह अपने को पता नहीं है। सार्वजनिक तौर पर उनसे गंगा कायाकल्प मंत्रालय छीनना और बदले में पेयजल का दिखावे वाला प्रभार देना उन्हे नाकाबिल करार देने का तमगा है। जिस काम के लिए उन्होने अनशन किया। शरीर बिगाड़ा उसी में पीएमओ ने उन्हे निकम्मा, नाकारा ऐसे साबित किया कि उमा भारती का राजनैतिक जीवन अब लगभग समाप्त है। वह उमा भारती जो चुनाव लड़ती हैं जो भगवा, महिला, ओबीसी, लौध, सियासी मेहनत में जिद्दी, जुनूनी है उसका सियासी जीवन खत्म करने के लिए मोदी-अमित शाह ने यहां तक सोचा कि उनकी जगह उनके चेले लौध सांसद प्रहलाद पटेल को मंत्री बनाया जाए।  

ठीक विपरित अब कथित काबिल निर्मला सीतारमण पर विचार हो। इनका संघ, भाजपा, भगवा से नाता नहीं रहा। ये जेएनयू में पढ़ी। वहां वे लेफ्ट विरोधी रहीं बताते हंै। संघ के छात्र संगठन एबीवीपी से वे जुड़ी थी, इस बात की पुष्टी एबीवीपी के पदाधिकारी नहीं करते हंै। उन्हे 2006 में अरुण जेतली भाजपा में लाए। जेतली ने ही उनकी अंग्रेजी के कारण उन्हे गुजरात की योजनाओं पर रिपोर्ट बनाने का काम दिया। तब वे वहां नरेंद्र मोदी के संपर्क में आईं। पर मौटे तौर पर वे नोटपैड लिए जेतली के पीए, उनसे नोट, ब्रीफ लेने के रोल में थीं। राजनाथ सिंह जब अध्यक्ष थे तब जेतली ने उन्हे प्रवक्ता बनाने की कोशिश की। पर राजनाथ सिंह और बाकी पदाधिकारियों का विचार था कि जब कोई बेकग्राउंड नहीं है तब एकदम, सीधे राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाना भला कैसे संभव?  पर 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले आडवाणी की जरूरत और उदारमना नितिन गडकरी ने निर्मला सीतारमण को राष्ट्रीय प्रवक्ता का वह रोल दिया जिससे सबने जाना कि अच्छा ये भाजपा में हैं!  फिर 2014 में केबिनेट गठन का वक्त आया तो अरुण जेतली- नरेंद्र मोदी ने कुछ भी कर सकते हंै वाली ताकत दिखलाने के अंदाज में निर्मला सीतारमण और स्मृति ईरानी को सीधे केबिनेट मंत्री बना कर सुषमा स्वराज, सुमित्रा महाजन जैसी चुनावी राजनीति की कथित धुरंधरों को मैसेज दिया कि देखिए हमारी निगाह में ये है काबिल! 

उसके बाद जानकारों से कानाफूसी मिली कि निर्मला सीतारमण अब जेतली से आहत हैं। उन्होने नरेंद्र मोदी के आगे अपनी व्यथा बताई और वे जेतली खेमें के बजाय अब सीधे प्रधानमंत्री का भरोसा प्राप्त किए हुए हैं। नरेंद्र मोदी, अमित शाह की एक समस्या अंग्रेजी है। ये अंग्रेजीभाषी को बुद्दीमतत्तापूर्ण और काबिल (यह भाजपा-संघ में आम बीमारी है। आडवाणी-जेतली आदि का मूल आधार यही रहा।) मानते हैं। हकीकत में निर्मला सीतारमण ने बतौर वाणिज्य मंत्री तीन साल में भारत के विदेश व्यापार को भगवान भरोसे बनवाया है। भारत का न तो निर्यात बढ़ा बल्कि उलटे राष्ट्रवादी हिंदूओं के आंदोलन, स्वदेशी शोर से बावजूद चीन से आयात बढ़ने दे कर  व्यापार घाटा चलाए रखा।  

मगर उनकी इस नाकबलियत पर प्रधानमंत्री दफ्तर ने उन्हे ऐसा सर्टिफिकेट दिया कि नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा के पहले टर्म की सांसद, बिना वैचारिक या सामरिक-राजनैतिक समझ की लक्षणता के उन्हे भारत का  रक्षा मंत्री बना सुषमा स्वराज, राजनाथसिंह, जेतली सबको मैसेज दिया कि अब ये अहम केबिनेट कमेटियों में आप लोगों को समझाएंगी कि कैसे होते हैं सामरिक-विदेश- भूराजनैतिक पेंच!  

सोचे, क्योंकर नरेंद्र मोदी को निर्मला सीतारमण ही काबिल समझ आई? रक्षा मंत्रालय का मतलब बहुत भारी हुआ करता है। सियासी अर्थ लिए हुए होता है। क्या उस लायक न नितिन गडकरी, न रविशंकर प्रसाद, न अंनत कुमार, न डा हर्षवर्धन आदि में कोई नहीं था? ये सब भी अंग्रेजी बोलते हंै। रविशंकर प्रसाद संघ परिवार बेकग्राउंड, दशकों की तपस्या के बाद हिंदी-अंग्रेजी के मझे हुए भौंपू हैं क्या वे या और कोई 30-40 साल खंपा भाजपा नेता रक्षा मंत्री लायक नहीं है? 

पर नरेंद्र मोदी, अमित शाह को मैसेज देना था कि पार्टी के कथित पुरानों, तुम सब इसलिए बेमतलब हो क्योंकि तुम सब चेहरा, अपनी पहचान, आधार लिए हुए है जबकि हमें निराकार बौने चाहिए।  

सोचंे यह भाजपा का, केंद्रीय केबिनेट का लालूलीकरण नहीं है तो क्या है? तब क्या मतलब है काबिल बनाम नाकाबिल के सवाल का?

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