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चीन पर कहां है देशभक्ति?

अजब भी है और गजब भी! चीन आंखें दिखा रहा है। सिक्किम के भारत में विलय की बात को चीनी मीडिया उछाल रहा है। वहां की सरकार, सेना, पार्टी भारत को चेताने, धमकाने के लिए अपने मीडिया का भरपूर उपयोग कर रहे है मगर अपनी सरकार और मीडिया को लकवा ऐसे मारा है मानो देशभक्ति दिखाएगें तो लेने के देने पड़ेगे। मतलब पाकिस्तान बनाम चीन के प्रति प्रकट होती देशभक्ति का फर्क साफ दिखलाई दे रहा है। टीवी चैनलों ने पाकिस्तान को ठोकने के लिए अपने स्टूडियों को जैसे रणक्षेत्र बनाया था वैसा कुछ भी चीन को ठोकने के लिए नहीं दिख रहा है। न ही चीन को मजा चखा देंगे या तिब्बत को हम आजाद करा कर रहेंगे व 1962 में अपनी गंवाई जमीन को चीन से वापिस लेंगे जैसे देशभक्ति के तराने, सुर नेताओं, पार्टियों और सरकार की तरफ से सुनाई दे रहे हैं। 

भला क्यों? चीन के सामने हमारी देशभक्ति क्यों हवा हवाई हुई पड़ी है? क्यों नहीं राष्ट्रीय स्तर पर यह आंदोलन, हल्ला चला है कि चीन की बनाई चीजों का बहिष्कार हो? चीन से व्यापार बंद हो? हिसाब से जब सिक्किम के भारत में विलय पर सवाल की चीनी मीडिया से खबर आई तब भारत को भी तिब्बत के मुद्दे  को तुल देना चाहिए था? क्यों नहीं जी-20 की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विश्व नेताओं से आंतक के साथ यह भी अपील कर देते कि कब तक दुनिया तिब्बत के लोगों की पीड़ा की अनदेखी किए रहेगी? क्या तिब्बत के दलाई लामा और उनके साथ भटक रहे तिब्बतियों को उनका घर नहीं मिलना चाहिए? क्यों न भारत दलाई लामा के लिए  अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटवाने का नई दिल्ली में वैश्विक सम्मेलन कराए?  

पर न सोशल मीडिया में ऐसी सोच, खदबदाहट है और न पाकिस्तान को चौबीसों घंटे ठोकने वाले टीवी चैनलों पर चीन को औकात दिखा देने, चीन के आगे देशभक्ति के तराने गाने का नैरेटिव बना है। 

हिसाब से चीन के आगे मनोवैज्ञानिक तौर पर उठ खड़े होने, बराबर के साथ आंखे मिलाने का वक्त है। इस अखबार में गुरुवार, शुक्रवार को शंकर शरण ने चीन के प्रति रीति-नीति की जो थीसिस दी है उस पर सचमुच अमल होना चाहिए। पर यह तब संभव है जब सार्वजनिक विमर्श में ही सही हम गरजे तो सही! चीन पंगा कर रहा है तो हमें पंगा बढ़ाने, जैसे को तैसे में बढ़ कर बातें करनी  चाहिए क्योंकि तभी हम 1962 में चीन से हारने, शर्म में जीने की मनोगत ग्रंथी से बाहर निकल सकेंगे। उस नाते विवाद से पहले थल सेना प्रमुख रावत ने ढाई मोर्चे पर एक साथ लड़ सकने की भारतीय सेना की सक्षमतता की जो बात कही, रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने जो कहा कि भारत अब 1962 वाला नहीं है तो उसी पिच पर भारत में देशभक्ति का भभका बन जाना चाहिए था कि चीन को देख लेंगे। बहस होनी चाहिए कि चीन को फंला-फंला तरीके से ठोकना चाहिए। उसमें क्या दम है जो वह हमसे लड़ेगा!

पर चीनी प्रवक्ताओं ने भारत के 1962 जैसे न होने के बयान पर अपने भी ताकत में 1962 जैसे न रहने की बात कहीं नहीं कि भारत सरकार मौन धार गई। उधर चीनी मीडिया की बाते बढ़ी तो अपने मीडिया से प्रतिकार नहीं है। इजराइल यात्रा के दौरान मीडिया ने विदेश सचिव जयंशकर से चीन को ले कर सवाल किया तो उन्होने दो टूक शब्दों में कहा कि सिर्फ इजराइल यात्रा पर पूछे मैं और किसी पर नहीं बोलूगा। ऐसे ही जर्मनी में मुलाकात को ले कर चीन ने पहले अपनी तरफ से कहा कि सीमा विवाद के लिए अलग मुलाकात नहीं होगी तो वह अपने मीडिया की इस फिजूल कयासबाजी से था कि मोदी- शी जिन मिल रहे है तो मामला सुलट जाएगा। हम क्यों मुलाकात से समाधान चाहते है? जब हम सही है तो चीन पीछे हटे। मोदी क्यों शी जिन को समझाएं कि आप पीछे हटो! और क्या शी जिन मान लेंगे? 

चीन झगड़े पर अड़ा है। उसकी दो टूक शर्त है कि भारत की सेनाएं पीछे हटे। वह पुराने नक्शे, संधि के हवाले भारत को झूठा, खलनायक अधिकारिक तौर पर बता रहा है। दिल्ली में उसके राजदूत ने इस अंदाज में बात की जो कूटनैतिक कायदे में उझड़पना था। पर विदेश मंत्रालय ने उसे बुला कर हड़काया नहीं। उसकी बात को आई-गई होने दिया। 

जाहिर है सरकार झगड़े को जैसे भी है खत्म कराने के मूड में है। चीन को जैसे के तैसे में जवाब देने की सोच नहीं है। यदि होती तो मीडिया से यह माहौल जरूर बनता कि मोदीजी आगे बढ़ों, चीन पर भी एक सर्जिकल स्ट्राइक करों और दुनिया को बता दो कि भारत अब 1962 जैसा नहीं है। वह चीन और पाकिस्तान दोनों से झगड़ा साथ-साथ करने, बढ़ाने का माद्दा रखता है!

क्या ऐसी देशभक्ति कहीं दिखलाई दे रही है?

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