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राफेल ले डूबेगा या बैंक घोटाला?

मोदी सरकार को गुजराती ले डुबेंगे! नीरव मोदी या मेहुल भाई या अदानी- अंबानी भाई की संगत में जो कुछ हुआ है या हो रहा है उससे मोदी सरकार का क्या बनेगा यह वक्त बताएगा लेकिन इतना तय है कि जैसे बैंकों को चूना लगाने वाले गुजराती डायमंड व्यापारियों का घोटाला घर-घर की कहानी बना है वैसे अनिल अंबानी की रिलायंस-ड़ॉसाल्ट वाला ऱॉफेल विमान सौदा और अदानी के बैंकों से बेइंतहा कर्ज का किस्सा भी मोदी राज की पहचान बनेगा। इस सप्ताह दो गंभीर, चौंकाने वाली बातंे सुनने को मिली। एक, डा सुब्रहमण्यम स्वामी ने अदानी के बैंकों से लिए कर्ज के एनपीए की बात करते हुए पीआईएल की जरूरत बताई तो कांग्रेस ने शुक्रवार को रॉफेल विमान बनाने वाली कंपनी डासाल्ट एविएशन की सालाना रपट में दूसरे देश बनाम भारत को बेचे गए विमानों की कीमत में अंतर और डासाल्ट व अनिल अंबानी की रिलायंस कंपनी की साझेदारी का जो ब्यौरा दिया है वह दिमाग को घूमा देने वाला है। तब तो बोफोर्स से लाख गुना बड़ा स्कैंडल पकने वाला है।  

उफ! पहली बात फ्रांसिसी कंपनी डासाल्ट की यह पुष्टि है कि इस सौदे को ले कर ऑफसेट कांट्रेक्ट अनिल अंबानी के रिलायंस ग्रुप के साथ हुआ है। डासाल्ट कंपनी की सालाना रपट में पेज 37 में लिखा है- भारत ने 2016 में 36 रॉफेल विमानों का आर्डर दिया। इसके खातिर कंपनी ने रिलायंस कंपनी के साथ एक साझा उद्यम बनाया है जो ‘मेक इन इंडिया’ की जरूरतों को पूरा करने, ऑफसेट कांट्रेक्ट को पूरा कराने के लिए है। सो यह कंफर्म हुआ कि कथित तौर पर सरकार से सरकार में हुए सौदे के समांनातर अनिंल अंबानी की कंपनी का रोल है और यह बाकायदा ऑफसेट कॉट्रेक्ट के तहत है। 

अब अपने लिए अनिल अंबानी और उनकी रिलायंस कंपनी की साख का मसला नंबर एक है। जिस कंपनी ने दिल्ली की एक मेट्रो लाईन कायदे से नहीं बनाई वह लडाकू विमान की सर्विसिंग या उसके पुर्जे जैसे काम कायदे से कर सकें और गड़बड़ियां न हो यह भला कैसे संभव है? टाटा हो, एलएंडटी हो या सरकारी हिंदुस्तान एयरोनोटिक्स कंपनी यदि साझेदारी कर रही होती तब भी भरोसा बनता लेकिन अनिल अंबानी और उनकी रिलायंस कंपनी मैक इन इंडिया के बहाने यदि रॉफेल सौदे में कूदी है तो फिर भगवान मालिक है!

और कांग्रेस ने डासाल्ट कंपनी की इसी सालाना रपट के हवाले यह भी पूछा है कि तब रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन ने क्यों यह झूठ बोला कि अभी ऑफसेट कॉट्रेक्ट पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है? दस्तखत नहीं हुए है जबकि फ्रांसिसी कंपनी की सालाना रपट साफ बता रही है कि ऐसा हुआ है तभी डासाल्ट और रिलायंस में साझा वैंचर बना है। 

यों रक्षा मंत्री और मोदी सरकार का तर्क है कि दो प्राइवेट कंपनियां चाहे जो करें उसमें रक्षा मंत्रालय या प्रधानमंत्री की अनुमति या रोल नहीं बनता लेकिन अनिल अंबानी और उसकी रिलायंस कंपनी यदि देश के सबसे मंहगे हथियार सौदे में खिलाड़ी बनी है तो आम आदमी इस पर क्या सोचेगा, उस पर क्या असर होगा, इसकी कल्पना कर सकते हैं। 

और तब जब सौदा  कीमत में भारी घोटाले का आरोप, शक लिए हुए है! कांग्रेस ने शुक्रवार को डासाल्ट कंपनी की ही सालाना रपट के हवाले मिस्र और कतर को बेचे विमान और भारत के सौदे की रेट का अंतर बतलाया है। विमान बेचने वाली डासाल्ट कंपनी ने खुद अपनी रपट में बताया कि 2015 में कंपनी ने मिस्र-कतर को 48 रॉफेल विमान 7.9 बिलियन में बेचे। वहीं भारत ने 23 सिंतबर 2016 को 36 विमान खरीदने का सौदा 7.5 बिलियन में किया।  

मतलब डासाल्ट ने मिस्र-कतर को 1319.80 करोड रू का एक विमान बेचा तो भारत के लिए प्रति विमान कीमत लगाई 1670.70 करोड रू। मतलब हर लड़ाकू विमान पर 350.90 करोड रू ज्यादा! सो भारत को 36 रॉफेल खरीदने में 12 हजार 632 करोड़ का ज्यादा पेमेंट करना है! 

ध्यान रहे रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन ने, सरकार ने यह नहीं बताया है कि प्रति विमान किस रेट पर रॉफेल खरीदा जा रहा है। कांग्रेस ने सवाल किया हुआ है कि क्या यह सही नहीं कि 12-12-2012 में यूपीए-कांग्रेस सरकार के वक्त जब बोली मंगाई गई तो रॉफेल ने 526 करोड रू प्रति विमान कीमत बताई थी जबकि मोदी सरकार अब 1670.70 करोड़ रू में उसी विमान को खरीद रही है?    

सो ऱॉफेल की तीन कीमते निकली हैं 2012 में 526 करोड़ रू , मिस्र-कतर को 2015 में बेचे गए 1319.80 करोड़ रू और भारत की कथित सहमति वाली 1670.70 करोड़ रू प्रति विमान कीमत। सरकार की तरफ से तर्क है कि लड़ाकू विमान के साथ मिसाइल याकि आयुध रक्षा प्रणाली आदि लगने से लागत बढ़ती है लेकिन मिस्र-कतर ने भी बिना रक्षा प्रणाली के विमान नहीं लिए होंगे या यूपीए-कांग्रेस सरकार के वक्त भी रॉफेल विमान का खौंका लेने या उसे यात्री विमान की तरह लेने की निविदाएं नहीं मंगाई गई थी। 

आश्चर्य की बात है जो कांग्रेस ने डासाल्ट की रपट पर प्रेस कांफ्रेस फ्रांस के राष्ट्रपति मेक्रोन की यात्रा से ठीक पहले की। मेक्रोन ने राहुल गांधी से मिलने का प्रोग्राम भी बनाया हुआ है। कांग्रेस ने जब पहली बार इस मुद्दे को उठाया था तो अनिल अंबानी-रिलायंस ने मानहानी पर कोर्ट जाने की धमकी दी थी। बावजूद इसके मामला नए-नए तथ्यों के साथ घोटाले की शक्ल ले रहा है और मिस्र-कतर बनाम भारत सौदे में अब यदि 12 हजार 632 करोड रू की कीमत के फर्क का आंकड़ा निकला है तो आने वाले दिनों में यह नीरव - मेहुल भाई का 12-13 हजार करोड़ रू बैंकों से ले भागने के किस्से से ज्यादा इसलिए चर्चित बनने वाला है क्योंकि इसके अंबानी भाई और उनकी रिलायंस कंपनी के परफोरमेंस के चर्चे तो वैसे भी कम नहीं है। वैसे संदेह नहीं कि इन दिनों अदानी भाई ज्यादा चर्चा में है और डा स्वामी ने उन पर टिवट करके जो संकेत दिए है तो लगता है कि यह पूरा साल गुजरात के अरबपति-खरबपति भाईयों का न हो जाए। वैसा हुआ तो अपने नरेंद्र भाई, अमित भाई किस दिशा में राजनीति को मोड़ेंगे इसका अनुमान आसान नहीं है।  

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