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मोदी राजः साख सबकी खाक!

हरि शंकर व्यास
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और मेरे जैसे राष्ट्रवादी हिंदू के लिए यह डुब मरने वाली बात है। मैं हिंदू हूं और चार साल पहले मैंने डुगडुगी बजाई थी कि राष्ट्रवादियों को मौका मिलना चाहिए। नरेंद्र मोदी आएगें तो भारत की तस्वीर बदलेगी। और आज मैं शर्मसार हूं। इसलिए कि देश-दुनिया में आज प्रमाणित हो रहा है कि आधुनिक हिंदू विचार कुल मिलाकर झूठ, पाखंड और मूर्खता का पर्याय लिए हुए है! मैं पिछले सप्ताह दलित विमर्श में हिंदू समरसता खोज रहा  था। तभी पाखंड प्रकट हुआ कि बात स्वदेशी की करते है, मैक इन इंडिया की करते है और सौ फीसद विदेशी निवेश, खुदरा व्यापार में विदेशी कंपनियों के दरवाजे खोलते हैं। इस पर लिखता तभी शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने दुनिया को बताया कि सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस तो वैसी ही कठपुतली है जैसे रिजर्व बैंक का गर्वनर है। राष्ट्रपति भवन में बैठा राष्ट्रपति है या चुनाव आयुक्त के आयुक्त गण है या सीवीसी, सीएजी है, नीति आयोग है या मीडिया हाऊस में बैठे संपादक और मालिक हैं!

सोचें, पिछले चार सालों में भारत के लोकतंत्र में कौन सी संस्था बची है जिसकी साख का सत्यानाश नहीं हुआ हो? जून 2014 से ले कर जनवरी 2018 के आज के मुकाम तक एक-एक कर भारत की तमाम संस्थाओं की ऐसी बरबादी हुई है कि भविष्य बरबाद नतीजो वाला तय है तो हिंदू राजनैतिक विचार भी अपनी साख गंवा देने वाला है। और यह भी नोट कर ले कि इसमें सर्वाधिक गंवा रहा है आरएसएस और उसकी हिंदू विचारधारा! क्या मोहन भागवत, सुरेश सोनी ने नरेंद्र मोदी को इसलिए तय कराया था ताकि विदेशी पूंजी को सौ फीसद धंधे की छूट मिले? क्या संघ ने कभी सोचा कि योजना आयोग खत्म कर योजनाओं की व्यवस्था ही खत्म करा दी जाए? क्या संघ ने कल्पना की कि राष्ट्रपति हिंदूवादी बने लेकिन उसे पीएमओ का एक्सटेंसन बना पिंजरे में रखा जाएं? क्या संघ ने कभी सोचा कि नवाज शरीफ के यहां पकोड़े खा कर फिर बार-बार सर्जिकल स्ट्राइक से दुनिया को यह पोलापन जतलाया जाए कि पाकिस्तान को ठीक कर देने के हुंकारा है तो भारत के जवानों की मौत भी आए दिन है?  भला यह कैसी संघ की सोची विदेश नीति है जो बराक ओबामा को चाय पिलाएं लेकिन अमेरिकी निवेश जीरो हो और आसियान देशों के नेता भारत की 26 जनवरी की परेड में आए लेकिन सब शौशेबाजी हो, इवेंट हो और वे धंधा चीन से ही करें। उनसे एफटीए संधि भी न हो।

सो नीति, परिणाम और व्यवहार सबमें हम हिंदुओं की, संघ परिवार की साख इस धारणा में परिवर्तित है कि हम हिंदूओं को राज नहीं करना आता। मूर्ख बन कर हम अपने आपको भरमाते है कि देखों, देखों नरेंद्र मोदी ने कब्रिस्तान की जगह श्मशानों को ठीक करने की बात कहीं। तीन तलाक कानून ला कर मुसलमानों को ठीक कर दे रहे हैं और योगी सत्ता में आए है तो मुसलमान अब काबू में रहेंगे या यह कि विरोधी तो मुसलमान और पाकिस्तान की गोद में खेलते हैं।

तभी सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों के इस ब्रह्म वाक्य को नोट करके रखंे - यदि आज हम खुलकर नहीं बोलते तो भावी पीढ़ियां हमसे पूछतीं कि हमने अपनी आत्मा को क्यों बेच दिया?

हां, संकट भारत की, हम हिंदुओं की आत्मा का है। हम हिंदू अपनी संस्कृति, सभ्यता में अपने को वैसा बनाना चाहते हंै जैसे यहूदियों ने अपना इजराइल बनाया। वह इजराइल जिसमें एक भी प्रधानमंत्री यह नारा लिए हुए नही बना कि मैं ही हूं यहूदियों का रक्षक। लोकतंत्र और उसकी संस्थाएं मेरी गुलाम हुई तभी यहूदी राष्ट्र बनेगा। नहीं, इजराइल दुनिया का इसलिए सफल देश है, दमदार देश है क्योंकि वहां सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति से से ले कर सेंट्रल बैंक, सेना सब पेशेगत स्वतंत्र संस्थागत फौलाद लिए हुए हैं। नेता आते –जाते रहते हैं जबकि संस्थाओं से कौम, आबादी वह सब पाती जाती है जिससे विश्वास, आस्था और उर्जा प्राप्त हो।  

ठीक विपरीत चार साल की मोदीशाही में जो हुआ उसका लबोलुआब चार जजों से यह जाहिर हुआ है कि भारत की सर्वोच्च, स्वतंत्र संस्था सुप्रीम कोर्ट को भी मोदी सरकार ने ऐसा बनवा दिया जिसमें उसका चीफ जस्टिस वैसे ही फैसला करेगा जैसे राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति, रिर्जव बैंक में गर्वनर, मीडिया हाऊस में सरकार के पिठ्ठू संपादक करते हैं। 

सुप्रीम कोर्ट और उसके चीफ जस्टिस का आज का चित्र भारत राष्ट्र-राज्य के अधोपतन का इसलिए पैदा है क्योंकि यदि यह संस्था खोखला गई तो भविष्य में फिर न मोदी-अमित शाह ( इसलिए कि सत्ता से तो ये भी कभी बाहर होंगे) को न्याय मिलना है ( कांग्रेस राज में मिला था क्योंकि तब जज स्वतंत्र थे) और न संघ के लोगों को मिलेगा और न आम आदमी को। आखिर यदि संस्था एक बार गुलाम और बिकाऊ चरित्र पा गई तो उसकी मूल लोकतांत्रिक आत्मा लौट नहीं सकती। संस्थाओं को बनाने-बनने में पीढ़ीयां गुजर जाती है लेकिन बिगाड़ने में चार साल ही बहुत है। तभी तो जज चेता रहे है कि आत्मा मर रही है, लौकतंत्र मर रहा है। 

बहरहाल, अपन ने चार साल पहले कतई नहीं सोचा था कि हिंदू राष्ट्र के विचार में सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था, उसके चीफ जस्टीश वाला पद ऐसी सदगति को प्राप्त होंगे! क्या आपने सोचा था? 

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