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मोदी-शाह को चाहिए अब बुढ़े नेता!

मामूली बात नहीं जो 74 साल के प्रेम कुमार धुमल को अमित शाह ने हिमाचल में भाजपा का सीएम उम्मीदवार घोषित किया। उस पर फिर तुरंत प्रधानमंत्री मोदी का टिवट भी हुआ कि वाह प्रेमकुमार धूमल! मैं पहले भी लिख चुका हूं कि हिमाचल प्रदेश में भाजपा मजे से, दबाकर जीतनी चाहिए। मगर प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करने का अर्थ है कि हिमाचल में मुख्यमंत्री वीरभद्रसिंह ने लड़ाई बनवा दी। नरेंद्र मोदी-अमित शाह को अपने जादू का भरोसा नहीं रहा। तभी वोट के लिए और खासकर राजपूत वोटों के लिए प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करना पड़ा। अरूण जेतली पहले से ही धूमल समर्थक है। उनका बस चलता तो बहुत पहले धूमल के बेटे अनुराग को दिल्ली में केबिनेट मंत्री बनवा देते। उनके पिता को महिनों पहले हिमाचल चुनाव की कमान संभलवा देते। उस नाते इसे अरूण जेतली का असर भी मान सकते है।

संकेत नरेंद्र मोदी और अमित शाह के हिमाचल प्रदेश में जेपी नड्डा के सोचे होने के थे। वे इनकी तयशुदा कसौटियों में फिट थे। प्रदेश में मैसेज गया हुआ था। नड्डा ने उस अनुसार हिमाचल में मेहनत भी की। प्रधानमंत्री मोदी की बिलासपुर सभा से माहौल जो उठा उसमें नड्डा टीम का काफी हाथ था। 

अपना मानना है कि कांग्रेस के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने अकेले अपने बूते कांग्रेस का प्रचार जैसे उठाया वह भाजपा में चिंता पैदा करने वाला था। ध्यान रहे प्रदेश में कांग्रेस नही बल्कि अकेले वीरभद्र सिंह चुनाव लड़ रहे हैं। उनके प्रति राजपूतों में सहानुभूति है। प्रदेश में राजपूत व ब्राहमण वोटों का प्रतिशत 26 व 16 प्रतिशत बताया जाता है। वीरभद्रसिंह को भाजपा ने, सीबीआई ने जैसे तंग किया उससे राजपूतों में उनके प्रति सहानुभूति बनी हुई बताते हंै। अब राजपूतों में उनकी काट के लिए भाजपा में प्रेमकुमार धूमल अकेले  हैं। सो उन्हे अंततः सीएम के रूप में प्रोजेक्ट करने का फैसला हुआ। 

इससे ब्राह्यण वोटों, जेपी नड्डा, शांताकुमार आदि पर क्या असर होगा, यह अनुमान का विषय है। मोटे तौर पर चुनाव में वीरभद्रसिंह के टिके रहने की हकीकत ने मोदी-शाह को सोचने को मजबूर किया है। सारा खेल मतदान से दस-बारह दिन पहले बदला तो साफ है कि हवा का रूख टेढ़ा हुआ पड़ा है। भारी एंटीइनकंबेसी के बावजूद वीरभद्र सिंह कांग्रेस का मोर्चा जोरदार तरीके से संभाले हुए हंै। नरेंद्र मोदी-अमित शाह को समझ आया होगा कि मई 2014 वाला वह माहौल नहीं है जिसमें राजपूत-ब्राह्ण सबने झूमते हुए मोदी, मोदी हर-हर मोदी का नारा लगाया था।  

जो हो हिमाचल प्रदेश में अब राजपूतों के दो बुर्जग नेताओं के बीच मुकाबला है। भाजपा जीतेगी मगर श्रेय के हकदार अब प्रेमकुमार धुमल और उनके बेटे अनुराग ठाकुर होंगे। 

उस नाते 74 वर्षीय प्रेमकुमार को हिमाचल में और कर्नाटक में बुजुर्ग येदियुरप्पा को कमान देने का सीधा अर्थ है कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह को प्रदेशों में पुराने क्षत्रपों की जरूरत पड़ गई है। यह विश्वास खत्म हुआ है कि वोट सिर्फ नरेंद्र मोदी के नाम पर पड़ते हंै। सो 2018 के सभी विधानसभा चुनावों में भाजपा के मुख्यमंत्रियों और प्रदेश क्षत्रपों के बूते चुनाव लड़ा जाएगा। शिवराजसिंह चौहान, रमनसिंह और वसंधुरा राजे पर अब मोदी-शाह निर्भर होंगे न कि इनकी मेहरबानी पर ये मुख्यमंत्री होंगे। 

कई मायनों में गुजरात में लड़ाई बनने के पीछे के संकट में भी वहां प्रदेश क्षत्रप नहीं होना है। यदि आनंदीबेन पटेल मुख्यमंत्री रही होती तो पटेलों को हैंडल करने का चेहरा मोदी-शाह के पास होता। गुजरात भाजपा में आज एक भी ऐसा चेहरा नहीं है जिससे अलग-अलग जातियों में मैसेज बने। तभी प्रधानमंत्री को अपने को प्रदेश क्षत्रप बन गुजरात में जुटना पड़ रहा है। भाजपा के कई नेताओं का मानना है कि प्रदेश-जिला स्तर के भाजपा-संघ कॉडर में यह माहौल बना है कि इन्होने बहुत दादागिरी की। न हमें सुना और न वक्त दिया तो इस दफा देखते हंै ये क्या कर सकते हैं। 

लगभग यही स्थिति बाकि प्रदेशों में भी हवा खराब होने या वक्त खराब होने के साथ बनती जानी है। लबोबुआब है कि हिमाचल और गुजरात के दो प्रदेश चुनावों से भाजपा के भीतर और संगठन के कई सवाल पैदा होते लगते हैं। 

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