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फेरबदल का चुनाव से क्या लेना?

फिजूल है यह चर्चा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2019 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रख कर मंत्रिमंडल फेरबदल कर रहे है। भला नरेंद्र मोदी के राज में मंत्रियों की क्या औकात जो चुनाव लड़वाएं? कभी वह वक्त हुआ करता था जब सरकार और पार्टी के हर चेहरे की सामूहिकता से राजनीति व चुनाव लड़ा जाता था। अब दोनों का पर्याय सिर्फ और सिर्फ दो चेहरे नरेंद्र मोदी और अमित शाह है। इसमें भी मतलब सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी का इसलिए है क्योंकि उनसे अमित शाह है। दिखाने के लिए अमित शाह भले संघ के पदाधिकारियों से बात करें, मंत्रियों को बुला कर इस्तीफा ले या शपथ के लिए नेताओं को फोन करें, या प्रधानमंत्री से विचार-विमर्श करें पर वह सब ‘साहब’ की प्रतिछाया में है। 

सो आज का केबिनेट फेरबदल ताश के पत्तों वाला महत्व भी लिए हुए नहीं है। ताश का पत्ता तो फिर भी पहचान व खेल में एक रोल लिए हुए होता है। अब तो पेड पर लटके सूखे पत्तों वाली वह दास्तां है जिसमें जो डाली से गिरेगे वे गुमनामी में खो जाएगें और जो लटके रहेंगे वे यह खैर मनाते हुए 2019 तक सांस लेंगें कि गनीमत जो 2019 तक लटके रहने की कृपा हुई। 

इसलिए इन पत्तों से 2019 का चुनाव नहीं लड़ा जाना है। प्रहलाद जोशी बने या प्रहलाद पटेल, प्रकाश जावडेकर रक्षा मंत्री बने या नितिन गडकरी भले रेल मंत्री क्यों न बने सर्जीकल स्ट्राइक भी नरेंद्र मोदी करेंगे तो बुलैट ट्रैन भी नरेंद्र मोदी दौडाएंगे। भगवानजी एक थे है और रहेंगे और बाकि सब प्रभु की घंटियां बजाने वाले। 

सो इन घंटियों से 2019 का चुनाव नहीं लड़ा जाना है! उलटे अपना मानना है कि आज के केबिनेट फेरदबल से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बिगुल की गूंज और गूंजेगी। उनकी एकछत्रता को चार चांद लगेंगे। आज से भाजपा के कथित नेताओं, मुख्यमंत्रियों को यह मैसेज ज्यादा मिलेगा कि विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव सबकुछ वाया अमित शाह के प्रधानमंत्री निवास-दफ्तर से लड़ा जाएगा। वे चुनाव लड़वाएंगे न कि मुख्यमंत्री। विधानसभा के उम्मीदवार हो या लोकसभा के अगले चुनाव के सभी उम्मीदवारों का फैसला वैसे ही होगा जैसे  केबिनेट का अभी हुआ है या यूपी के, दिल्ली के एमसीडी चुनाव में जैसे हुआ था। 

सोचे कि यूपी या दिल्ली के चुनाव में किस दूसरे नेता का क्या मतलब था? यों पार्टी सगंठन था, नेताओं की भीड़ थी लेकिन फैसले सब नरेंद्र मोदी-अमित शाह के थे। कोई गलतफहमी न रखे कि योगी आदित्यनाथ अपने से है। वे भी इन्ही की बदौलत है। 

सो आज की केबिनेट फेरबदल का मैसेज यही बनेगा कि जो है वह नरेंद्र मोदी की बदौलत है, उनकी सोच, उनके रोडमैप का यह मिशन स्टेंटमेंट लिए हुए है कि सब मेरे से है। 

मैं इस बात को पहले भी कई बार लिख चुका हूं कि सौ टका गुजरात पैटर्न है। मुख्यमंत्री बनने के बाद वहां पुराने तमाम नेता जैसे सूख पत्ते बन भाजपा से छिंटकते गए और संघ परिवार अकेले मोदी के वटवृक्ष में जैसे कनवर्ट हुआ वही 2014 के बाद अखिल भारतीय स्तर पर है। 2019 के चुनाव के बाद वहीं स्थिति बनेगी जो 2002 के चुनाव के बाद गुजरात में बनी थी। एक और सिर्फ एक चेहरा नरेंद्र मोदी और उनकी सोच, आदेशों की पालना कराते हुए उनके गृहराज्य मंत्री अमित शाह। तभी जब गुजरात से नरेंद्र मोदी ने विदा ली थी तो उनके पास ले दे कर बिना पैंदे की आनंदीबेन पटेल थी और आज विजय रूपाणी है। दोनों निराकार और सौ टका नरेंद्र मोदी पर निर्भर। गुजरात में विजय रूपाणी चुनाव नही लड़ाने वाले है। नरेंद्र मोदी ही गुजरात में चुनाव लड़ेगे और प्रमाणित करेंगे कि वे है तभी वहां भाजपा की चुनावी जीत है। 

कई मायनों में यह म़ॉडल आजाद भारत का अनहोना मुकाम है। किसी एक नेता पर पूरी सत्ता, पूरी राजनीति, पूरी विचारधारा की ऐसी निर्भरता पहले कभी नहीं रही। नेहरू और इंदिरा गांधी के चक्रवर्ती राज में भी चेहरों की भीड़ हुआ करती थी। अब चेहरे नहीं है सिर्फ मास्क है। एक चेहरा है बाकि सब उनका मास्क, उसका मुखौटा लिए हुए। गुजरात का चुनाव या 2019 का लोकसभा चुनाव केवल नरेंद्र मोदी का चेहरा लिए हुए होगा बाकि पूरी पार्टी उस चेहरे का मास्क बांधे चुनाव लडेगी। इसलिए फालतू बात है कि 2019 की चुनावी जरूरत के अनुसार आज फेरबदल है। 

हकीकत में यह फेरबदल नहीं बल्कि कुछ नय चेहरों पर मास्क लगाने और कुछ के मास्क छीन लेने का मामला है। इसलिए फेरबदल पर ज्यादा विचार की जरूरत नहीं है!

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