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विपक्ष पर इतनी तल्खी क्यों?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विपक्ष के खिलाफ चुनावी सभाओं वाली तल्खी को संसद तक ले आए हैं। वे चुनावी सभा में कही जाने वाली बातें विदेशों में कहते रहे हैं और संसद में भी कहने लगे हैं। उन्होंने विपक्ष खास कर कांग्रेस के प्रति अपनी तल्खी पिछले हफ्ते संसद के दोनों सदनों में दिखाई। उन्होंने पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और राहुल गांधी तक को कोसा और उनकी कमियां बताईं। 

प्रधानमंत्री ने कहा कि देश में लोकतंत्र बहाल करने का श्रेय नेहरू को नहीं दिया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सरदार पटेल प्रधानमंत्री होते तो पूरा कश्मीर भारत का होता। नेहरू के प्रति इस तल्खी का जवाब सोशल मीडिया में लोगों ने कई तरह से दिया है। किसी ने पूछा – नेहरू कौन थे? जवाब था – देश के पहले प्रधानंमत्री थे जो देश के 18 वें प्रधानमंत्री को पिछले चार साल से काम नहीं करने दे रहे हैं! जब आप अपनी उपलब्धियां बताने की बजाय 70 साल पहले प्रधानमंत्री बने व्यक्ति को कोसेंगे तो ऐसे जवाब मिलेंगे। मोदी के जवाब में लोगों ने राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज के दो भाषण सोशल मीडिया में शेयर किए, जिसमें वे दोनों नेता उनकी जी खोल कर तारीफ कर रहे हैं और पिछले 70 साल की उपलब्धियां बता रहे हैं। 

इसी तरह प्रधानमंत्री ने देश को 21वीं सदी में ले जाने का श्रेय राजीव गांधी को दिए जाने का मजाक उड़ाया। उन्होंने कहा कि 21वीं सदी तो आ ही रही थी उसमें उन्होंने क्या किया? प्रधानमंत्री ने दिवंगत राजीव गांधी का मजाक उड़ाते हुए कहा कि एक युवा नेता, जिनको अपने नाना से भी ज्यादा सीटें मिली थीं! बाद में उनकी इस बात का प्रतिवाद तृणमूल कांग्रेस के सांसद दिनेश त्रिवेदी ने किया। उन्होंने कहा कि यह ध्यान रखना चाहिए कि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी दोनों शहीद हैं, देश के लिए जान गंवाई है। 

बहरहाल, जिस तरह राजीव गांधी 1984 में प्रधानमंत्री बनने के बाद कहते रहे थे कि देश को 21वीं सदी में ले जाना है उसी तरह नरेंद्र मोदी भी 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद लगातार कह रहे हैं कि 2022 में देश की आजादी के 75 साल होंगे और उसी साल महात्मा गांधी के जन्म के डेढ़ सौ सा होंगे। सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री बार बार नहीं कहेंगे तो देश की आजादी के 75 साल नहीं होंगे या गांधी की डेढ़ सौंवीं जयंती नहीं आएगी? वे इन तारीखों का बार बार ध्यान इसलिए दिलाते हैं ताकि उस समय तक कुछ बड़े लक्ष्य को हासिल किया जा सके। इसलिए ही राजीव गांधी भी बार बार 21वीं सदी की बात करते थे ताकि कुछ बड़े लक्ष्य पूरे किए जा सकें। आज उनके निधन के 34 साल बाद उनका मजाक उड़ाने की कोई जरूरत समझ नहीं आती है। 

प्रधानमंत्री मोदी को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनके प्रति कांग्रेस और दूसरी पार्टियों में जो तल्खी थी, जो नफरत का भाव था और उनको रोकने के जो साझा प्रयास थे उसकी का नतीजा था कि देश के लोग उनके साथ खड़े हुए और इतने बड़े बहुमत से प्रधानमंत्री चुना। कांग्रेस को उनके प्रति नफरत का भाव रखने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। अब कांग्रेस और उसके दिवंगत नेताओं के प्रति नफरत जाहिर करके मोदी वहीं गलती दोहरा रहे हैं, जो कांग्रेस ने की थी। 

नेहरू को नीचा दिखाने के लिए सरदार पटेल को बड़ा बनाना भी उस विमर्श का हिस्सा है, जो बिना पढ़े लिखे और इतिहास की जानकारी नहीं रखने वाले लोग के बीच चाय की दुकानों पर चलती है। नेहरू और पटेल के राजनीतिक मतभेद उसी तरह के थे, जैसे हर पार्टी के नेताओं के बीच होते थे। खुद मोदी के अपनी पार्टी के अनेक नेताओं के साथ मतभेद रहे हैं। जब उन्होंने बात निकाली तो नेहरू की तारीफ में लिखी पटेल की चिट्ठियां सोशल मीडिया के हर प्लेटफार्म पर शेयर की जाने लगीं। दोनों की दोस्ती के दस किस्से बताए गए। और यह झूठ तो पहले ही खुल चुका है कि पटेल के अंतिम संस्कार में नेहरू नहीं गए थे। 

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