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सरकार इच्छा में थिरका चुनाव आयोग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार कह रहे हैं कि देश के सारे चुनाव एक साथ होने चाहिए। राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति भी कह चुके हैं और सुप्रीम कोर्ट की ओर से भी यह बात कही जा चुकी है कि लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होने चाहिए। इस बारे में अब तक जो भी चर्चा हुई है, वह मोटे तौर पर राजनीतिक है। औपचारिक रूप से एक प्रस्ताव जरूर नीति आयोग ने तैयार किया है, लेकिन उसने कहा है कि 2024 में सारे चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं। पर नीति आयोग से भी एक कदम आगे बढ़ कर सरकार की इच्छा को सर्वोपरि मानते हुए चुनाव आयोग ने कहा कि वह अगले साल सितंबर के बाद कभी भी सारे चुनाव एक साथ कराने में सक्षम है। 

जब आयोग की तैयारियों और उसके संसाधनों पर सवाल उठे तो अधिकारियों ने माना की अभी उसकी तैयारी पूरी नहीं है। सवाल है कि जब तैयारी पूरी नहीं है तो सितंबर 2018 के बाद चुनाव कराने का बयान देने की क्या जरूरत थी? क्या इससे यह नहीं लग रहा है कि सरकार का कोई मकसद पूरा करने के काम में आयोग भागीदार बन रहा है? ध्यान रहे चुनाव आयोग को बड़ी मिन्नत और मशक्कत करने के बाद वीवीपैट मशीनें खरीदने के लिए केंद्र सरकार से पैसा मिला है। 

सुप्रीम कोर्ट ने पहले से आदेश दिया है कि अब आगे जो भी चुनाव हों, वो वीवीपैट मशीनों यानी कागज की परची निकालने वाली मशीनों से हों। इस लिहाज से 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए जितनी मशीनों की जरूरत है, उसके लिए सरकार ने फंड दिया है और आयोग ने मशीनों के आर्डर दे दिए हैं। अब सवाल है कि अगर 2018 के अंत में लोकसभा के साथ सारी विधानसभाओं के चुनाव हों तो उसके लिए वीवीपैट मशीनें कहां से आएंगी? जाहिर है इस बारे में सोचे बगैर ही आयोग की ओर एक बयान जारी कर दिया गया। 

असल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी चाहते हैं कि लोकसभा के साथ विधानसभाओं के भी चुनाव हों ताकि मोदी के करिश्मे और उनके नाम पर चुनाव लड़ा जा सके। भाजपा को उम्मीद है कि मोदी के नाम पर चुनाव हुए तो वह बाजी मारेगी। एक साथ चुनाव कराने का तर्क व्यावहारिक रूप से सही जान पड़ता है। इससे खर्च बचेगा और सरकार का कामकाज बाधित नहीं होगा। लेकिन उसका फैसला न तो केंद्र में बैठी सरकार को करना चाहिए और न चुनाव आयोग को। इसके बारे में सभी पार्टियों के साथ आम सहमति बनाने की जरूरत है क्योंकि कई राज्यों में भाजपा विरोधी पार्टियों की सरकारें हैं। इसलिए उनकी राय भी कम अहम नहीं है। 

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