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तथ्यों की अनदेखी और खिलवाड़ !

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के पहले अभिभाषण पर अपनी सरकार की ओर से पेश धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई दो दिन की चर्चा के जवाब में तथ्यों की कई गलतियां कीं। इसमें कुछ गलतियां तो अनजाने में हुईं और  कुछ जान बूझकर गलत बताया गया। ज्यादा बोलने पर अनजाने में कई गलतियां होती हैं, जैसे मोदी ने अपने भाषण में कह दिया कि पाकिस्तान के साथ शिमला समझौता इंदिरा गांधी और बेनजीर भुट्टो के बीच हुआ था। असल में यह समझौता इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच हुआ था। 1972 में हुए इस समझौते के समय बेनजीर भुट्टो की उम्र कोई 18-19 साल की थी। वे अपने पिता के साथ भारत आई थीं। इंदिरा गांधी के निधन के चार साल बाद 1988 में बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनी थीं। जुबान फिसलने की ऐसी गलती प्रधानमंत्री मोदी के की भाषणों में पहले भी हुई है और उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भाषणों में भी खूब होती है। 

इसी तरह देश के विभाजन के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराने और कश्मीर समस्या की जिम्मेदारी अकेले पंडित नेहरू पर डालना भी एक किस्म की वैचारिक बेईमानी का संकेत है। यह तथ्य है कि मोहम्मद अली जिन्ना और अल्लामा इकबाल से बहुत पहले विनायक दामोदर सावरकर ने दो राष्ट्र का सिद्धांत प्रतिपादित किया था। 1947 में देश के विभाजन पर अगर नेहरू सहमत हुए थे तो सरदार पटेल भी सहमत हुए थे। सरदार पटेल की जगह नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने का फैसला महात्मा गांधी का था, जैसे केशुभाई पटेल को हटा कर नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने का फैसला लालकृष्ण आडवाणी का थी। सो, नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने के लिए खुद नेहरू को दोष नहीं दिया जा सकता है। पर हैरानी की बात है कि प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार भी इसके लिए महात्मा गांधी को दोष नहीं दिया। इसी तरह कश्मीर समस्या भी अकेले नेहरू की देन नहीं है। यह तथ्य है कि सरदार पटेल हैदराबाद और जूनागढ़ को तो भारत में मिलाना चाहते थे पर कश्मीर को भारत में मिलाने के मुद्दे पर ज्यादा उत्साहित नहीं थे। वह तो अपनी जन्मभूमि होने के नाम पर नेहरू ने जिद की और लार्ड माउंटबेटन पर दबाव डाल कर उनको कश्मीर के राजा हरि सिंह के पास भेजा और इस राज्य के भारत में विलय की बात चलवाई। 

बहरहाल, अनजाने में की गई गलतबयानी या वैचारिक बेईमानी की वजह से बोले गए अर्धसत्य के अलावा कुछ तथ्य ऐसे थे, जो जान बूझकर सही नहीं पेश किए गए। प्रधानमंत्री ने रेल लाइन बिछाने, सड़क बनाने, ऑप्टिकल फाइबर केबल बिछाने आदि के कई आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि उनकी सरकार ने कितना पूंजीगत व्यय किया है। पूंजीगत व्यय का मतलब होता है ऐसे असेट का निर्माण करना, जिससे भविष्य में आर्थिक विकास की रफ्तार तेज हो सके। पर हकीकत यह है कि पिछले दो साल से इसमें लगातार गिरावट आ रही है। ग्रास फिक्स्ट कैपिटल फार्मेशन, जीएफसीएफ में दिसंबर 2015 से लेकर मार्च 2017 तक लगातार पांच तिमाही में गिरावट आई है। नई परियोजनाएं शुरू होने और पुरानी परियोजनाओं के पूरा होने की दर में लगभग आधे की गिरावट आ गई है। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने खुद माना है कि नोटबंदी और जीएसटी की वजह से भारत ने वह फायदा गंवा दिया, जो अंतरराष्ट्रीय आर्थिकी में सुधार की वजह से भारत को हो सकता था। 

प्रधानमंत्री ने जन धन योजना में खोले गए खातों और उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन बांटने के आंकड़े भी बताए। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि इन योजनाओं से लोगों की आर्थिक स्थिति में कोई सुधार हुआ है या नहीं। जन धन खाता खोलने वाले कितने लोगों की स्थायी आमदनी सुनिश्चित हुई है यह आंकड़ा सामने आए तो इसका फायदा पता चले, लेकिन वह आंकड़ा नहीं दिया जा रहा है। चूंकि रोजगार की स्थिति में सुधार नहीं हुआ इसलिए समावेशी विकास के आंकड़े अधूरे हैं। रिजर्व बैंक ने अपने एक सर्वेक्षण के आधार पर बताया है कि नौकरी के मामले में लोगों की निराशा बढ़ी है और सर्वेक्षण में शामिल करीब 47 फीसदी लोगों ने निराशाजनक तस्वीर बताई है। सो, कुल मिला कर आर्थिकी के आंकड़ों के जरिए उन्होंने जितना बताया, उससे ज्यादा छिपाया है।  

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