बिहार में बनाना होगा नया एलायंस

जिस तरह झारखंड में लोकसभा चुनाव में चार पार्टियां एक साथ लड़ीं और दो सीटों पर सिमट गईं उसी तरह बिहार में पांच पार्टियां एक साथ लड़ीं और 40 में से सिर्फ एक सीट जीत पाईं। तभी जिस तरह लोकसभा की करारी हार के बाद झारखंड में कांग्रेस और जेएमएम ने गठबंधन पर गंभीरता से विचार किया, उसे नया रूप दिया और नए तरह से चुनाव लड़ा उसी तरह बिहार में भी दो बड़ी पार्टियों राजद और कांग्रेस को साथ बैठ कर गंभीरता से एलायंस के बारे में विचार करना होगा। बिहार में साल के अंत में चुनाव होने हैं और यह जिम्मेदारी राजद की बनती है तो वह बड़ी पार्टी के नेता मजबूत गठबंधन की पहल करे।

पर हैरानी की बात है कि पिछले दिनों कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने नागरिकता मसले पर विचार के लिए विपक्ष की बैठक बुलाई तो राजद के नेता तेजस्वी यादव उसमें शामिल नहीं हुए। उन्होंने दिल्ली में रहने वाले अपने एक नेता को बैठक में भेज दिया। जबकि झारखंड मुक्ति मोर्चा से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद इस बैठक में शामिल होने पहुंचे। तेजस्वी को इस बात से सबक लेना चाहिए। चूंकि लालू प्रसाद यादव जेल में हैं और उनके ऊपर भाजपा से लेकर अदालत तक की नजर लगी है इसलिए यह तय मानें कि वे अपने गठबंधन की सरकार आ जाने के बावजूद बहुत राजनीतिक भूमिका नहीं निभा पाएंगे। ऐसे में राजनीति के रोजमर्रा के फैसले और कामकाज तेजस्वी को ही देखने होंगे। उन्हें कांग्रेस के साथ सद्भाव बनाना होगा और बहुत सावधानी से सहयोगी चुनने होंगे।

जिस तरह झारखंड में हेमंत सोरेन और कांग्रेस ने बिना हिचक के बाबूलाल मरांडी की पार्टी को एलायंस से बाहर कर दिया उसी तरह बिहार में भी राजद और कांग्रेस को करना होगा। उन्होंने अपना एलायंस बहुत बड़ा करने की बजाय ऐसी पार्टियों को साथ में रखना होगा, जिनका वोट बैंक स्वाभाविक रूप से एक साथ जुड़े। यानी स्वाभाविक सहयोगी चुनना होगा। सहयोगियों की संख्या इसलिए भी कम रखनी होगी ताकि सीटों बंटवारे को लेकर पार्टियों में खींचतान नहीं हो। ज्यादा सहयोगी होने पर सीटों का बंटवारा मुश्किल हो जाता है और बाद में सभी पार्टियों में बगावत हो जाती है।

पिछली बार बिहार में राजद और कांग्रेस के अलावा उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा और मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी का गठबंधन था। इनमें से दो नेता जीतन राम मांझी और मुकेश सहनी पहले भाजपा के साथ गठबंधन में थे और बुरी तरह से पिटे थे। इनसे भाजपा को कोई फायदा नहीं हुआ था। भाजपा ने 2015 के विधानसभा चुनाव में मांझी की पार्टी को 22 सीटें दी थीं पर वे अकेले अपनी सीट पर जीत पाए थे। इसके बावजूद राजद-कांग्रेस ने उनको गठबंधन में रख कर तीन सीटें दीं। कहने की जरूरत नहीं है कि तीनों सीटों पर उनकी पार्टी हारी और उनसे गठबंधन को वोट का भी कोई फायदा नहीं हुआ। यहीं हाल मुकेश सहनी की पार्टी का भी हुआ।

अगर ये दोनों अलग लड़े होते तो हो सकता था कि राजद-कांग्रेस एलायंस को ज्यादा रणनीतिक फायदा होता। इन दो के अलावा भी बिहार में कई नेता पार्टी बना कर राजनीति कर रहे हैं। सबको साथ लेकर, कोई रेनबो एलायंस बना कर, सबके कुछ कुछ सीटें देकर चुनाव लड़ने की रणनीति विधानसभा में नहीं चलने वाली है। भाजपा का जदयू और लोजपा से एलायंस है। इससे मुकाबले के लिए राजद, कांग्रेस और रालोसपा को मजबूत एलायंस बनाना होगा। राजद के पुराने मुस्लिम-यादव समीकरण में कुशवाहा और कुछ सवर्ण वोट अगर जुड़ जाता है तो यह एक मजबूत एलायंस होगा, जिसे झारखंड की तरह सरकार विरोधी वोट का फायदा मिलेगा।

बिहार में नीतीश कुमार 15 साल से सरकार में हैं और 15 साल में संभवतः पहली बार वे इतनी मुश्किल स्थिति झेल रहे हैं। उन्होंने अपने तीसरे कार्यकाल में बिहार में कामकाज ठप्प करके सिर्फ पाबंदियों की राजनीति की है। भाजपा छोड़ कर राजद-कांग्रेस के साथ जाने और फिर जीतने के बाद उनको छोड़ कर भाजपा के साथ चले जाने से उनकी छवि पर भी असर हुआ है। तभी बिहार में विपक्ष के पास झारखंड की तरह का मौका है। अगर तीन पार्टियां मजबूत एलायंस बना कर पहले से तैयारी शुरू करती हैं तो बिहार में चमत्कारिक नतीजे आ सकते हैं। ध्यान रहे 2015 के चुनाव में बिहार में भाजपा ने कई पार्टियों का गठबंधन बनाया था और दूसरी ओर राजद, जदयू और कांग्रेस यानी तीन पार्टियों का एलायंस था। और यहीं एलायंस चुनाव जीता। इसलिए जरूरी नहीं है कि हर बार बड़ा एलायंस चुनाव जीते। ठोस और स्वाभाविक गठबंधन के चुनाव जीतने की ज्यादा संभावना रहती है। इसके लिए तेजस्वी को पहल करनी होगी। उनका सीधा संपर्क राहुल गांधी से है। इसलिए वे सीधे कांग्रेस आलाकमान से बात करें और अभी से एलायंस और सीट बंटवारे की बात करें। उन्हें यह भी प्रयास करना होगा कि वे नागरिकता, राम मंदिर और अनुच्छेद 370 के जाल में फंसने से बचें। जदयू-भाजपा के 15 साल के राज की विफलताओं पर फोकस ज्यादा बेहतर नतीजे दिला सकता है।

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