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विपक्ष की अपनी मुश्किलें

सरकार दबाव में है और भाजपा के प्रवक्ताओं को सफाई देना भारी पड़ रही है। लेकिन सवाल है कि क्या विपक्ष इस स्थिति का फायदा लेने और सत्ता विरोधी माहौल बनाने में सक्षम है? हकीकत यह है कि विपक्ष ज्यादा मुश्किल में है। हालांकि यह हकीकत अपनी जगह है कि विपक्ष में रहते हुए भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियां भी इससे बेहतर स्थिति में नहीं थी। वह तो हालात ऐसे बने कि उनका अवसर बन गया। तभी ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां भी इस उम्मीद में बैठी हैं कि हालात ऐसे बनेंगे कि भाजपा खुद ब खुद पिटेगी।

असल में कांग्रेस सहित सभी विपक्षी पार्टियां अपनी मुश्किलों में फंसी हैं। कांग्रेस के लिए अपने अंदर की बगावत को संभालना भारी पड़ रहा है। बिहार में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी तेवर दिखा रहे हैं। उन्होंने कहा है कि पार्टी उनके बारे में जल्दी फैसला करे। माना जा रहा है कि वे एक दर्जन से ज्यादा विधायकों को लेकर पाला बदलने के लिए तैयार बैठे हैं। उधर गुजरात में ऐन चुनाव से पहले शंकर सिंह वाघेला पार्टी छोड़ कर चले गए हैं और जन विकल्प नाम से एक नया मोर्चा लेकर मैदान में उतर रहे हैं। उनका लक्ष्य कांग्रेस को हराने का है। महाराष्ट्र में नारायण राणे ने कांग्रेस छोड़ दी है और उसे हराने का संकल्प लेकर राजनीति करने वाले हैं। हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा और हिमाचल प्रदेश में वीरभद्र सिंह अलग तेवर दिखा रहे हैं। कांग्रेस अपनी इन अंदरूनी समस्याओं से उबरे तो सरकार के खिलाफ अभियान शुरू करे!

कमोबेश यहीं स्थिति सभी विपक्षी पार्टियों की है। भाजपा के खिलाफ सबसे मुखर रहने वाले लालू प्रसाद और उनका पूरा परिवार कानूनी पचड़ों में फंसा है। उनकी पत्नी राबड़ी देवी, बेटे तेजस्वी, बेटी मीसा भारती, दामाद शैलेश कुमार आदि सबके खिलाफ सीबीआई और ईडी की जांच चल रही है। महागठबंधन टूटने के बाद सत्ता से पैदल हुए लालू के लिए कानूनी संकटों से निकलना मुश्किल हो रहा है। 

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राजनीतिक और कानूनी दोनों तरह के संकट में हैं। रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में बसाने से लेकर मुहर्रम के दिन दुर्गा मूर्तियों का विसर्जन रूकवाने तक का उनकी सरकार का स्टैंड मुस्लिम तुष्टिकरण वाला है, जिससे हो सकता है कि उनको अपने राज्य में तो फायदा हो जाए, लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर यह भाजपा को बहुत मजबूत करने वाला राजनीतिक कदम है। ऊपर से उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी सहित आधा दर्जन से ज्यादा सांसद सारदा या रोजवैली चिटफंड घोटाले में फंसे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सीबीआई इन मामलों की जांच कर रही है। तीसरा संकट यह है कि प्रदेश में भाजपा की आक्रामक राजनीति के असर में पार्टी के कई सांसद पाला बदलने की तैयारी में हैं। 

मुलायम सिंह की पार्टी का संकट भी मामूली नहीं है। उनके भाई और किसी जमाने में पार्टी के दूसरे सबसे मजबूत नेता रहे शिवपाल यादव ने अलग मोर्चा बना लिया है। अगले कुछ दिनों में पार्टी में विभाजन तय माना जा रहा है। अगर शिवपाल यादव भाजपा का साथ देने का फैसला करते हैं तो सपा के कई विधायक पाला बदल सकते हैं। बसपा प्रमुख मायावती ने जरूर अपनी पार्टी की रैलियां और प्रदर्शन शुरू किए हैं, लेकिन भाजपा ने उनके दलित वोट बैंक में सेंध लगा दी है। माना जा रहा था कि उनकी पार्टी का सपा के साथ तालमेल होगा, लेकिन इसकी संभावना भी कम दिख रही है क्योंकि बसपा छोड़ने वाले नेताओं को सपा में जगह मिल रही है। बसपा छोड़ने वाले एक दर्जन से ज्यादा नेताओं ने पिछले दिनों सम्मेलन करके अपना अलग मोर्चा बनाने का फैसला किया है। 

विपक्ष की एकजुटता की धुरी बनने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां अलग मुश्किल में हैं। सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी सीपीएम में महासचिव सीताराम येचुरी और पूर्व महासचिव प्रकाश करात ऐसी खेमेबाजी में उलझे हैं, जैसी इससे पहले कभी देखने को नहीं मिली। चुनावी राजनीति से लेकर गठबंधन तक के हर मसले पर दोनों की अलग राय है। ओड़िशा में सत्तारूढ़ बीजू जनता दल में अंदरूनी संकट भी है और पार्टी के कई नेता कानूनी पचड़े में फंसे हैं। पार्टी के एक विधायक को चिटफंड घोटाले में पकड़ा गया है और कई सांसदों पर तलवार लटक रही है। अवैध खनन और चिटफंड घोटाले ने बीजद को परेशान कर रखा है। 

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