क्षत्रपों की राजनीति मुगालतों की

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी हों या आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी हों या तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव हों सबको मौजूदा राजनीति की हकीकत को समझना होगा। सब अपने अपने खोल में दुबके हैं। तीनों नेता मुख्यमंत्री हैं और इस सोच में हैं कि राजनीति उनके नियंत्रण में है। पर ऐसा है नहीं। तीनों ही राज्यों में भाजपा जिस तरह की राजनीति कर रही है वह अंततः इन प्रादेशिक क्षत्रपों की राजनीति को नुकसान पहुंचा सकती है।

तेलंगाना में भाजपा की राजनीति ऑल इंडिया एमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी की वजह से फल फूल रही है। केंद्र सरकार के लागू किए नागरिकता कानून के विरोध की कमान ओवैसी उनकी पार्टी ने संभाली है। ध्यान रहे पिछले साढ़े पांच साल में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के राष्ट्रीय परिदृश्य पर मजबूत होते जाने की एक अनिवार्य नतीजा यह हुआ है कि मुस्लिम अपना खुद का नेता खोज रहा है और ओवैसी में उसको अपना नेता दिख रहा है। यह स्थिति भाजपा के बहुत अनुकूल होगी कि मुस्लिम ओवैसी को नेता मान कर उनके साथ जुड़ें और उनकी पार्टी का दायरा हैदराबाद से निकल कर समूचे प्रदेश में फैले। इससे तेलंगाना में कांग्रेस खत्म होगी और चंद्रशेखर राव की पार्टी को भी नुकसान होगा। जब मुस्लिम ध्रुवीकरण एक तरफ होगा तो बहुसंख्यक हिंदू मतदाताओं की पसंद भाजपा बनेगी।

तेलंगाना की इस राजनीति का असर आंध्र प्रदेश में भी होगा। वहां भाजपा ने दो दिन पहले ही मशहूर तेलुगू सितारे पवन कल्याण की पार्टी जन सेना के साथ तालमेल किया है। ध्यान रहे पवन कल्याण मशहूर फिल्म अभिनेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री चिरंजीवी के भाई हैं। ये दोनों भाई कापू समुदाय से आते हैं, जिसका आंध्र प्रदेश के एक बड़े हिस्से में असर है। दूसरी ओर चंद्रबाबू नायडू के साथ भी भाजपा की करीबी बन रही है, जो कम्मा समुदाय के सबसे बड़े नेता हैं। कापू और कम्मा कभी साथ नहीं आते हैं, जैसे कर्नाटक में लिंगायत और वोक्कालिगा नहीं आते हैं। पर भाजपा कापू और कम्मा दोनों को साथ लाने की राजनीति कर रही है। जगन मोहन रेड्डी की ईसाई और मुस्लिम राजनीति दोनों को साथ ला सकती है।

ऐसे ही पश्चिम बंगाल में भाजपा ने लोकसभा चुनाव में अपनी ताकत दिखा दी है। उसने तृणमूल कांग्रेस की जीती हुई सीटें उससे छीनी और राज्य की 42 में से 18 सीटों पर जीत दर्ज की। प्रदेश में 29 फीसदी मुस्लिम आबादी है। कांग्रेस, लेफ्ट व तृणमूल के 73 साल के शासन को लेकर धीरे धीरे वहां यह धारणा बनी है कि ये तीनों पार्टियां मुस्लिमपरस्ती की राजनीति करती हैं। नागरिकता कानून ने इस फॉल्टलाइन को और चौड़ा कर दिया है। ममता बनर्जी इसे बांग्लाभाषियों की अस्मिता का मामला बना कर विरोध कर रही हैं पर अंततः नागरिकता का मामला कम से कम बंगाल में हिंदू-मुस्लिम का ही रहना है। वहां कांग्रेस और लेफ्ट भी यहीं राजनीति कर रहे हैं। तभी अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए आदर्श स्थितियां दिख रही हैं। सो, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल के तीनो प्रादेशिक क्षत्रपों को मौजूदा राजनीतिक हकीकत को समझते हुए काम करना होगा।

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